Saturday, February 8, 2014

खामोशियाँ

खामोशियों को आवाज़ दो

गूँजेगी वो दिल के हर ओर

टकरा के पूछेगी दिल से

गुमशुम खामोश क्यों हो तुम

जन्नत यही है मेरे यार

जहाँ खड़े हो तुम बन मेरे सरताज

फिर किस उलझन में

यूँ खामोश उदास हो मेरे यार

हर जबाब है इन खामोशियों के पास

तलाशते फिर रहे हो फिर क्यों कही ओर

पुकारोगे जो दिल से

चहक चहक बोल उठेगी खामोशियाँ हर ओर

8 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (09-02-2014) को "तुमसे प्यार है... " (चर्चा मंच-1518) पर भी होगी!
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. रचना संकलन के धन्यवाद्

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  2. सुन्दर रचना

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  3. कोमल भावो की और मर्मस्पर्शी.. अभिवयक्ति .

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    1. प्रोत्साहन के धन्यवाद्

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  4. सुन्दर प्रस्तुति...!

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