Monday, May 25, 2020

ईद

इस ईद बस एक फरियाद हैं मेरी
खुदा नज़रें इनयाते कर दे थोड़ी

चाँद नज़र आ जाए मेरी भी सर जमीं 
नमाज़ ईद की अदा कर दूँ उसकी सर जमीं

अज़ान बन गूँज उठे हर इबादत मेरी
निहारु जब आसमां दुआ कबूल हो मेरी 

रस्म निभाऊ गले मिल उस चाँद की हथेली
दस्तूर रिवाज बन जाए हबीबी की ईदी

सजदा उस आफताब का महकता रहे
सरके जो हिजाब तो महताब निखरता रहे

बस वो छुपा चाँद जो नजर आ जाए
हर रोज़ नमाज़ अदा कर दूँ उस ईद की खुशी 

Saturday, May 16, 2020

प्रेम कहानी

किश्तों में कैसे तुमसे मैं प्यार करूँ 
दिल पे तेरे दस्तखतों का ज़िक्र कैसे सरे आम करूँ 

इजहारे अंदाज़ ने रंग शमा का बदल दिया 
हर मौसम को रुमानियत रिवाज़ बना दिया 

फ़साना तरन्नुम ने भी खूब कहा 
तारुफ़ में दिल आशिकाना मुस्करा गया 

अनबुझ पहेली ज़िक्र रात सयानी 
बन प्रेयसी चाँद उतारे नजर तुम्हारी

ओझल ना हो पलकों से ए प्रेम कहानी 
तितली पंखुरियों सजी रहे ए बात सुहानी 

दीवानी मीरा ह्रदय रचे रास बिहारी 
कुँज गलियों गूँजे अपनी भी प्रेम कहानी 

Friday, May 15, 2020

पतझड़

पतझड़ सा खामोश हैं मन l
पर कटे परिंदो सा विचलित हैं तन ll

स्याह अंधेरों में गुम हो गया वक़्त l
चिनारों के दरख़्तों पर अब नहीं कोई सहर ll

बंजारा हो फिर रहा हूँ दर बदर l
कैसे पिघले पत्थर रहा ना कोई हमसफ़र ll

कड़वाहट घुली मौसम मिजाज ऐसी l  
दूरियाँ थाम ली रिश्तों मिजाज वैसी ll

महज इतेफाक कहूँ या आत्म संजोग l
अपरिचित से लगने लगे हैं खुद के नयन ll

बदल गए हैं अब सपनों के भी पल l
टूट गए साहिल ढह गए रेतों के महल ll

नवयौवन नवरंग फूलों खिला नहीं l
बदरा इस सावन खिलखिला हँसा नहीं ll

बदल गयी तस्वीर चिनारों की पुरानी l  
वसंत दरख्तों पर फिर कभी लौटा नहीं ll

सुहानी शामें ठंडी आहों सी सिसक गयी l
कारवाँ पतझड़ का अब तलक गुजरा नहीं ll 

Sunday, May 10, 2020

दर्द

दर्द आँखों से जब उतरता हैं
अश्कों का दरिया बन छलकता हैं

दर्द से ही धड़कनों की पहचान हैं
वर्ना तो जिंदगी पूरी गुमनाम हैं

उखड़ती साँसे क्यों इतनी बईमान हैं
दर्द की गहराई में छुपा कोई राज हैं

दर्द दिलरुबा आँखों की
पल प्रतिपल भाव बदलती हैं

गुस्ताखियाँ दर्द की कैद आँखों के अंदर
थामे हुए एक गहरा समंदर दिल के भीतर

रूह का कितना हसीं धोखा हैं
दर्द आँखों में चेहरे पे गुलसिताँ हैं

इस गफलत में जी रहा ज़माना हैं 
फिसल गया दर्द मिला जब कोई बेदर्द फ़साना हैं

बिन दर्द के अब चैन नहीं
दर्द नहीं तो यह जीना भी बेस्वादा हैं

दर्द का अब दर्द रहा नहीं
डर नहीं यह जख्म कोई पुराना हैं 

नयना

आँख मिचौली खेल रहे तेरे मेरे नयना l
सपनों में तुम जब आना बंद रखना अपने नयना ll

मिले जो नयन तो छलक पड़ेगें रैना l
पहेली बन फलक पर छाये रहे नयना ll

झुके पलकें जब तेरी शरमा जाए नयना l
सुरमई आँखों में आबाद रहे यह सुन्दर दुनिया ll

उठे तो उठे नजरें तेरे ही नयनों के जाम से l
बस नशा इन नयनों का बेपर्दा होने ना पाय ll

मैं पीता रहूँ तेरे नयनों के ख्यालातों से l
प्यास इन शुष्क लबों की बूझने कभी ना पाय ll

फरियाद करे रहे रोग लगे यह नयना l
मियाद खत्म होने ना पाए लुका छिपी मुलाकातों की ll

मौहलत थोड़ी और दे दे ए नयना l
ताउम्र ताबीर करूँगा उसके सुन्दर नयना की ll

बन गए गुलाम मेरे खोये खोये नयना l
नज़र मिलायी तुमने और बदनाम हो गए मेरे नयना ll

आँख मिचौली खेल रहे तेरे मेरे नयना l
आँख मिचौली खेल रहे तेरे मेरे नयना ll

Thursday, May 7, 2020

मधुशाला बदनाम

कायनात कुदरत की सारी झूठी झूठी सी l
एक बस मधुशाला ही सच्ची सच्ची सी ll

फेहरिस्त थोड़ी लम्बी इसके कद्रदानों की l
खुदा भी झुक गया देख रौनक मधुशाला की ll

क्या पंडित क्या मुल्ला क्या पादरी l
चौखट सभी इसकी चूमे बन इसके जायरीन ll

मधुशाला यारी महफ़िल कुँवारी ll
झूम रहे सभी एक रंग रंगे भूल मजहब तास्कीन ll

मशहूर काफिले मधुशाला नाम के l
नित सजा रहे कारवाँ नए मधुशाला जाम के ll

बह रही उलटी गंगा मधुशाला प्याले अंदर l
इबादत नयी लिख रही प्रेरणा मधुशाला समंदर ll

हर घूँट कह रहा अनसुना सा इतिहास l
बिन मधुशाल शतरंज की भी ना कोई बिसात ll

अमृत से बढ़कर इसका लग रहा अवदान l
मशहूर तभी जग में मधुशाल के कद्रदान ll

यहीं नाजनीन यहीं स्वर्ग का आभास l
तर दे रस फिर भी मधुशाला ही बदनाम ll

Wednesday, May 6, 2020

रिश्तों की चाबी

खट्टास जंग की परत ऐसी जमी जिंदगानी पर l
चाबी रिश्तों की अलग हो गयी गुच्छे की पहरेदारी पर ll

बड़ी सिद्धत से सँवारा सहेजा जिस रिश्ते को l
हिफाज़त ही गुनाह बन गयी उसकी नजाकत को ll

सहज बेबाक पतंगों से उड़ते रहते थे जो रिश्ते l
डोर उसकी ही उलझ कट गयी अपने ही माँझे से ll

लाख जतन की मिट्टी महकती रहे इसकी की कोमल राहों की l
फूलों से सजी रहे पगडण्डी इसकी राहोँ की ll 

खुदा भी ख़ौफ़ज़दा हो गया इसके चिंतन क्रोध के आगे l
तल्खी में चादर नकाब की बैरी बन जब इसने ओढ़ ली ll

गुरुर था जिस रिश्ते को नफ़ासत अंदाज़ से जीने का l
मगरूर बन बिफर गया आसमां उसके कोने कोने का ll

हिसाब अधूरा रह गया कुछ खोने और पाने का l
सवाल अटक गया बेहिसाब जज्बातों का ll

प्रायश्चित करूँ कैसे अनवरत बह रहे अश्कों का l
निरुत्तर वो मौन है सजदा रिश्तों के रखवालों का ll

प्रायश्चित करूँ कैसे अनवरत बह रहे अश्कों का l
निरुत्तर वो मौन है सजदा रिश्तों के रखवालों का ll

Sunday, May 3, 2020

आवाज़

नफरतों के बाजार में मिला ना कोई कद्रदान l
खरीद सके जो इस तन्हा दिल के पैगाम ll

ख्वाईश हैं सौदागर मिले कोई ऐसा नायाब l
मेहताब बन निखर आये दिलों के अरमान ll

हालात ने पहरे लगाये हुए संवादों पर आय l
ताले पड़ जड़ गए जुबाँ के प्यालों पर आय ll

बिन कड़वाहट रिश्तों में दूरियाँ ऐसी बन आयी l
परछाई अपनी भी दस क़दम दूर खड़ी नज़र आयी ll

प्रतिलिपि फिर खोजी आफ़ताब के पास l
रहनुमा बन रूह उतर आये इसकी आवाज़ ll

महरूम ना हो कभी रिश्तें भी दूरियों के दरम्यां l
महफ़िल ओर मुखर आये बेक़रार धड़कनों के पास ll

ढलती साँझ नकाब के पीछे छुपी मुस्कान l
क़त्ल कर दिल का खरीद लिए सारे पैगाम ll

वो काफिर था या रहगुजर बेचैन थे नयनों के तार l
जल गयी चिंगारी बुझ गए जुल्मों सितम के तार ll

आँधियों के मेले में साये को मिल गया आकार l
हमसफ़र बन मिल गया दिल को जैसे कोई परवरदिगार ll