Tuesday, September 8, 2015

पराया दिल

मुझे ए मालूम था

दिल अपना पराया था

फिर भी इश्क़ इससे लगाया था

खबर ना  हो किसीको

साँसों को इसलिए

हमराज बनाया था

धड़कनें जो तब गुनगुनाती थी

खाब्ब हसीन उनकों भी दिखलाया था 

मुझे ए मालूम था

दिल अपना पराया था

फ़िर भी खुद को ए समझाया था

जीना बिन इसके गँवारा ना था

रिश्ता मोहब्बत का

इससे कुछ ऐसा बनाया था

जब मुझे ए मालूम था

दिल अपना पराया था

फिर भी इश्क़ इससे लगाया था

Wednesday, September 2, 2015

अंदाज़

बदल जाती है फ़िज़ाओं की राग

शायराना होता हैं जब अंदाज़

व्यार जो फ़िर  बहती हैं

निखार इंद्रधनुषी घटा सा लिए आती हैं

हर एक कलमा जैसे संग अपने

रंगों की ताबीर लिए आती हैं

जैसे बिन सुर बिन ताल ही

सप्त सुरों की रागिनी

मधुर तान लिए आती हैं

ओर फिर

बदल जाती है फ़िज़ाओं की राग

शायराना होता हैं जब अंदाज़

गीत

उमड़ घुमड़ घटा सुना रही

सावन के गीत

दामन में भर अपने नीर

उड़ चला गगन

बरसाने मेघों के तीर

स्वागत करने बदरी को

छटा बिखेर रही किरणें

बना इंद्रधनुषी तोरण धीर

उमड़ घुमड़ घटा सुना रही

सावन के गीत

Saturday, August 29, 2015

एकांत

पलट कर जब देखता हूँ

तुझे ए जिंदगी

कुछ मीठे कुछ खट्टे

अहसास की यादें फिर से

तरोताजा हो जाती हैं

कभी फ़लक के आसमाँ की

कभी काँटो भरी राहों की 

वो किस्से कहानियाँ

बरबस ही दिल को छू जाती हैं

उम्र के उस मोड़ पर

बदलते सफ़र के मोड़ पर

हवाएँ भी रुख बदल जाती थी

बदलाव की यह वयार

दिल को बेबजह बदनाम कर जाती थी

ओर आलम उस पल कुछ ऐसा होता था

जिंदगी जीने के सिवा

पास कुछ ओर ना होता था

मगर सफ़र के इस मुक़ाम को

जिंदगी मेरा भी

प्यार भरा सलाम था

अब तो बस ठंडी आहें

गुजरी यादें लिए आती हैं

एकांत में

जिंदगी जब तू मुझसे मिलने आती हैं

एकांत में

जिंदगी जब तू मुझसे मिलने आती हैं

Wednesday, August 5, 2015

तपिश

वो सावन की बहार थी

मेघों की बारात थी

घटाओं  की वयार थी

तक़दीर कुछ इस तरह मेहरबाँ थी

मानों हर तरफ रिमझिम सी सौगात थी

नजरों की दुनिया भी कुछ इस तरह इनायत थी

हर ओर बारिसों की फ़ुहार थी

मानों इस पल ही जिंदगी गुलज़ार थी

वरना तो रेगिस्तान की तपिश थी

वरना तो रेगिस्तान की तपिश थी