Sunday, October 11, 2026

निशान

किस्से उस पनघट के लुका छिपी करे बरगद की बदरी पार l

रंग गयी कागज स्याही दरिया पानी लहरों पतवार के साथ ll


मिट्टी को छू उस चुनर का श्रृंगार बन गया साँझ का गुलाब l

अँगीठी की राख लिख रही कच्चे घड़े उस चाँद का ही नाम ll


मोरनी सी पायलों की झंकार बज रही उड़ते पतंगों के साथ l

गुल गुलमोहर दरख्तों कर रही आसमाँ चाँदनी की ही बात ll


खिलौने मन की सिरहन नाच रही चूडियों खनखनाहट साथ l

लबों छूती बाँसुरी थिरका रही दिल बहते अल्फाजों के राज ll


खुद से फुसफुसाते कर्णफूलों बेनजीर माथे बिंदी का गुलाल l

आँगन ठहरे पदचिन्हों के हिना लाली करतल करते निशान ll

2 comments:

  1. सुन्दर पंक्तियाँ !

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  2. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर सोमवार 12 अक्टूबर 2026 को लिंक की गयी है....

    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!


    !

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