Monday, May 1, 2023

आलाप

सुन सावन के पतझड़ की रागिनी आलाप l

ख़त लिख भेजे बारिश की बूँदों ने दिल के साथ ll


उलझे उलझे केशे भीगे भीगे आँचल की करताल l

मानों दो अलग अलग राहें ढ़लने एक साँचे तैयार ll


ग़ज़ल जुगलबंदी के साज झांझर भी थिरके नाच l

अर्ध चाँद और भी निखर आया सुन बारिश की ताल ll


ताबीज बनी थी जो आयतें उस शरद पूनम की रात l

कर अधर अंश मौन महका गयी अश्वगंधा बयार ll


शरारतों की बगावत थी वो रूमानी साँझ l

शहनाई धुन घुल गयी चूडियों की बारात ll


काश थम जाती वो करवटें बदलती साँस l

मिल जाती दो लहरें एक संगम तट समाय ll


रूह से रूह का था यह रूहानी अहसास l

मौसीक़ी से जुदा ना था बारिश का अंदाज ll


सुन सावन के पतझड़ की रागिनी आलाप l

ख़त लिख भेजे बारिश की बूँदों ने दिल के साथ ll