तालीम सावन नयी सीखा गयी नीलामी मुनादी सौदागरी को l
रात परछाई बारिश बूँदें बेच आयी रोते खारे आँसू पानी को ll
बादलों अमिट छाप थी उसके अर्ध चाँद हुनरमंद कलाकारी को l
मोल समझ ना पायी जुल्फें इसकी पलकों रिसते खारे पानी को ll
बिन रूह जिस्म को भा गयी तंग गलियाँ इसके आँगन को l
दागों अनगिनत पैबंद कढ़ी इसके एकांकी एकांत साये को ll
किनारा कर आसमाँ आँचल बाँध दिया रोती बारिश यादों तन्हाई को l
टकरा काँच दीवारों से थम गया शोर इसका उफनते बारिश पानी को ll
नजरबंद थी तमाशबीन रोती आँसू आँखें सावन की परछाई को l
चाँद शांत हृदय भीगता रहा ताउम्र अपने ही खुदगर्ज फ़साने को ll
मार्मिक भावाभिव्यक्ति ।
ReplyDeleteआदरणीया मीना दीदी जी
Deleteआपका तहे दिल से शुक्रिया
रचना में उचित जगह अर्ध विराम लगायें, अभी समझने में दिक्क्त हो रही है
ReplyDeleteआदरणीया अनीता दीदी जी
Deleteत्रुटि और ध्यान आकर्षण करने के लिए आपका धन्यवाद, आगे से कोशिश होगी ऐसी गलती वापसी ना हो
बेहतरीन
ReplyDeleteआदरणीय हरीश भाई साब
Deleteसुंदर शब्दों से हौशला अफ़ज़ाई के लिए तहे दिल से धन्यवाद
बहुत सुन्दर भावपूर्ण सृजन ।
ReplyDeleteआदरणीया सुधा दीदी जी
Deleteआशीर्वाद की पुँजी के लिए तहे दिल से नमन
आदरणीया सुधा दीदी जी
ReplyDeleteआशीर्वाद की पुँजी के लिए तहे दिल से नमन