खो गयी परछाईं उस अलख जगाते अर्ध चाँद की l
पतंग मांझे डोरी उलझ चटकी चरखी पायदान की ll
कमसिन बुनियाद कच्चे धागे पिरोई साँझी रात की l
आसमाँ धुन्ध ढाँक गयी उसे काले आँचल छाँव की ll
स्थिल हो चली करवटें सिरहाने अस्तित्व साँस की l
टूटा स्पर्श इस सूने झरोखे आँगन उतरे मझधार की ll
टूटी निंद्रा केशों वेणी गुँथी मन बावरे नादान की l
फिसली धड़कन लकीरें उस मोक्ष संगम चाह की ll
मिटा गयी तारीख उस गुलाबी सर्द काग़ज़ फूलों साँझ की l
डस गयी जिसे ग्रहण रेखा एक अंतिम आलिंगन पुकार की ll