Tuesday, June 9, 2020

मैं

यूँ तो अक्सर खुद से मिला करता हूँ l
सवाल पर वहीं आकर ठहर जाता हैं ll

कौन हूँ मैं प्रतिबिंब हूँ या कोई परछाई हूँ l
या दर्पण में नज़र आये वो सच्चाई हूँ ll

क्यों रातों को कभी जुगनू सा चमकता हूँ l
क्यों कभी अपनी चमक से डरता हूँ मैं ll

मशवरा दिया पल पल के इम्तिहानों ने l
तलाशों उतर मयकदे के द्वारों पे ll

बदल रहमत अँगार शहद से ऐसे महकेंगें l
जाम के हर सुरूर में सिर्फ मैं ही मैं छलकेंगें ll

खुदा नाचीज़ होगा ठहरा हुआ पल होगा l
हर प्यालों के घूँट में गुजरा हुआ पल होगा ll

हो फासलों से रूबरू आवेग जो चला l
खुद की पहचान में खुद से दूर हो चला ll

लूट गया इन राहों पे मैं काफ़िर बन के l
निगल गया मशवरा मुसाफ़िर बन के ll   

8 comments:

  1. बहुत सुंदर रचना। मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।
    iwillrocknow.com

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    1. आदरणीय नीतीश जी
      आपका शुक्रिया
      आभार
      मनोज

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  2. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 11.6.2020 को चर्चा मंच पर चर्चा - 3729 में दिया जाएगा। आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी।
    धन्यवाद
    दिलबागसिंह विर्क

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    1. आदरणीय दिलबाग जी
      मेरी रचना को अपना मंच प्रदान करने के लिए आपका शुक्रिया
      आभार
      मनोज

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज गुरुवार (11-06-2020) को     "बाँटो कुछ उपहार"      पर भी है।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    --
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. आदरणीय शास्त्री जी
      मेरी रचना को अपना मंच प्रदान करने के लिए आपका शुक्रिया
      आभार
      मनोज

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  4. लूट गया इन राहों पे मैं काफ़िर बन के l
    निगल गया मशवरा मुसाफ़िर बन के

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    1. आपका शुक्रिया
      आभार
      मनोज

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