Tuesday, November 1, 2022

मौन

मौन ही वह सबसे सुंदर अहसास था l

पल जो उसके लबों से होकर गुजरा था ll


उफनता सागर भी वो ठहर गया था l

खुशबु को इसकी जब मैंने छुआ था ll


स्पर्श हृदय मन ने किया था जिस मौन को l

अल्फाज़ आहटें बिखर गयी थी उस पल को ll


मौन वाणी पल्लवित सुगंध महका अंबर को l

आतुर कर गयी थीं छुने उन उड़ते परिंदों को l


समेटा इन मौन अक्षरों को सदियों बाद फिर l

प्रेम कपोल प्रस्फुटित हो गया एक बार फिर ll


धूप छाँव सी दस्तक देती  किंवदंतियों इन मौनौ की l

शब्द सार नक्काशी तराशती फिर उन्हीं अहसासों की ll


अधूरी रह गयी थी चेतना जिन अल्फाजों की l

मौन उसकी लिख गयी नयी इबादत जज़्बातों की ll


मौन उसकी लिख गयी नयी इबादत जज़्बातों की ll

मौन उसकी लिख गयी नयी इबादत जज़्बातों की ll

Monday, October 24, 2022

दीपावली

दीपावली दीपोत्सव सारांश संक्षेप में l

आहुति आभा से रोशन तम का मंडल ll


भोग चौदह वर्षों का कठिन वनवास l

काल मृत्युंजय रावण का कर संहार ll


सुन रघुवर अपनों की आराधना पुकार l

अवतारी चले आये थामे माता का हाथ ll


प्रीत किरण पुंज से चमकते धूमकेतु से l

शिरोधार्य इस मंगल बेला जन कल्याण ll


पिरो लडिया सुन्दर जगमग करते दीपों सी l

उत्सर्ग कर रहा संसार वैमनस्य अंधेरों की ll

Monday, October 10, 2022

वैतरणी

टाँक दिया रूह को उस पीपल की शाखों पर l

दर्द कभी रिस्ता था जिसकी कोमल डालों से ll


सावन में भी पतझड़ बातों से मुरझा गया पीपल l 

सूना हो गया चौराहा उजड़ गया पीपल राहों से ll


फिर भी समझा ना सका दिल वैतरणी को l

गुलाब वो बना था किसी और के आँगन को ll 


गवाह थी दरिया किनारे बरगद की वो लटें l

गुजरी थी कई शामें जिसके हिंडोले मोजों में ll


बदले बदले रूप वो चाँद नजर क्यूँ आ जाता हैं l  

पुराने खतों नूर उसका ही नजर क्यूँ आ जाता हैं ll


संग इसके बीते थे जो कभी हसीन अतरंगी पल l

टिसन देते आज भी याद आते जब कभी वो पल ll

Thursday, October 6, 2022

आकृति

आकृति मेरी प्रतिलिपि की जी रही किसी और के साये सी l

मगर खुदगर्ज़ी सी वो पहेली मानो नचा रही इसे तांडव सी ll


धोखा था उसकी उस साँझ का ख्वाब महका था जिसके छांव तले l

गुलजार पनघट सा वो नज़र आता था जिस महताब की डगर तले ll 


अक्सर उस जगह जहाँ मैं भूल आता था पता अपना ही l

फ़िज़ाओं की उन लिफाफों के करवटों सलवटों साये तले ll


कभी रूबरू खुद को करा ना पाया उनके अंतरंगी पलों से l

आधे अधूरे खत के उन लिफाफों के बिखरते सप्तरंगी रंगों से ll


कुछ कदम का फासला था प्रतिबिंब की उस परछाई से l

दबी थी रूह मेरी आकृति की जिस साये की परछाईं से ll

Thursday, September 22, 2022

दिलचस्प

दर्द कुछ सहमी फ़िज़ाओं की आगोश में था l

कुछ कुछ तेरी पनाहों की सरगोशियों में था ll


आफताब उस सहर का भी खोया खोया था l

निगाहों में तेरी जिस तस्वीर का घर टूटा था ll


ख़्यालातों मंजर अश्कों का दरिया सैलाब बन जो गुजरा था l

मुख़्तलिफ़ फिर भी हुई नहीं बंदिशें रंजिशें इनकी राहों से तेरी ll


एक सौदा सा था मेरी रूहानियत और तन्हाइयों के बीच l

निकाह तेरी निगहबानी का मुक़र्रर हुआ था जिस दिन ll


दिलचस्प थी इस रूमानियत जुदाई आलम की वो हर घड़ी l

किश्तों में सिमटी किस्सों में उलझी थी इसकी वो मासूम कड़ी ll


दफन थी यादें सारी कही जैसे मय्यत कफन लिबास में खोई खोई l

शरीक ना हुई वो इनायतें भी इसके जनाजे अंजुमन सफर साथ भी ll

Saturday, September 17, 2022

मिथ्या

कुछ अनकही बातों दरिया का जिक्र फिर कभी हो ना पाया l

मौन मकबरे सा कभी खुद से भी यह गुफ़्तगू कर ना पाया ll


तारतम्य पिरो ना पाया अपनी मोजों और किनारों में l

सामंजस्य अधूरा रह गया था इसके बहते संवादों में ll


आवारा साँझ सी बहती इन मझधार लहरों तरंगों पर l

अस्त होती लालिमा नाच रही जैसे व्यथित सी होकर ll


आवाज दूँ कैसे आलिंगन करूँ कैसे उस मौन को l

अहसास जिसका जुदा हो ना पाया इस वज़ूद से ll


आहिस्ते आहिस्ते टूटती इन बेज़ान दरख्तों में l

एक कंपकंपी सी थी उन मौन स्तब्ध पलों में ll


मिथ्या थी वो अनजानी सी आधी अधूरी मेरी मुलाकातें l

कह के भी कह ना पायी जो अपने मौन जज्बातों की बातें ll


दस्तक देता रह गया इसकी भूली सरहद आवाजों को l

खोई हुई जैसे किसी मौन शून्य में पसरी आहटों को ll

Thursday, September 8, 2022

गुस्ताखी

एक उम्र दहलीज का फासला था मेरी इश्क गुस्ताखी में l

जब कभी आईना पूछता हौले से परदा कर लेता उससे ll


वो सफ़ेदी तलाशती फिरती मेरे रुखे बिखरे बालों में l

भूला दुनिया सुकून से मैं सो जाता उसकी बाहों में ll


तबस्सुम उसकी ढ़क जाती झुर्रियां मेरे उम्र चेहरे की l

मोहलत मिल जाती जैसे साँसों को और धड़कने की ll


उस हिजाब वाली अंतरंगी के हम तो थे ऐसे मासूम कायल l

खुदग़र्ज़ी थी खिताबों से रंगे थे फिर भी खिजाबों में आकर l


दुआएँ आखरी फिजां इश्क के उन ताउम्र फासलों की l

मय्यत जनाजे भी सहारा मिले उसके ही कांधों का आकर ll

Tuesday, August 2, 2022

निःशब्द

कहाँ से चला था कौन सी डगर का मुकाम था वो l

राहों की अधीर पगडण्डियाँ का सैलाब सा था जो ll


टूटे खंडहरों का आशियाँ था शायद जैसे कोई l

बिखरे ख्वाबों की लूटी अस्मत थी जैसे कोई ll


झंझोर था एक रुकी हुई दबी सी हल्की आहट का कहीं l

दस्तक दे रही जो निःशब्द अहसासों को कभी कभी ll


व्याकुल पपहिया छुपे पैगाम भेज रहा था जैसे कोई l

शब्द फिर भी पास ना थे उन सूखे हुए लबों के कहीं ll


बैचैन सावन की पुरवाई का रुख जुदा था खुद से कहीं कहीं l

रौनक ऐ महफिल का चाँद तन्हा खोया हुआ था और कहीं ll


इतनी भर साँसे अब तलक भी जो थी जिंदा बची खुची l

एक संदेशे इंतजार में धड़का जाती थी यह दिल कभी कभी ll

Friday, July 1, 2022

साँझा दर्द

छिपाने अश्कों याराना बारिशों से मैंने कर ली l
मेघों की बिखरती बूँदों से दर्द भी साँझा कर ली ll


शिकवा रहे ना खुद से किसी बेरुखी का l
काले बादलों में हबीबी की नूर तराश ली ll


हौले से अधूरे ख्वाब बेच जाती नींद पलकों में l
कोलाहल सागर मल्हारों यही थी जो छुपा लाती ll


रुखसत होने इस अश्रु व्यंग परिहास ज़ख्मों से l
बूँदों की फुसफुसाहट ताबीर इसकी बना डाली ll


फिदा बारिशों के इस संगम मनुहार पर l
धारा अश्कों मेहरान घटायें सिमट आती ll

Friday, June 10, 2022

ll सरल प्रेम ll

सरल थी वो ओस की उन अनछुई शबनमी बूँदों सी l
इतराती अठखेलियाँ विलुप्त हो जाती पवन वेगों सी ll


चिंतन मनन जब जब करता उसे अल्फाजों पिरो सीने की l
लब मौन तब तब सिल जाते उसके गुलाब पराग कणों सी ll


नाम जिनका उकेरा था सागर सी मचलती जल तरंगों पर l
दरिया बन समा गयी वो मेरे अधूरे क्षितिज अश्रु बूँदों पर ll


संजोग तारतम्य अक्षरों चयन बीच कभी हुए नहीं l
संदेशों में भी बैरंग खत कभी हमसे अता हुए नहीं ll


खुमारी इसकी मीठी मीठी आबो हवा बारिश बारातों की l
मुक्तक पतंग उड़ा रही परिंदों सी रंगे दिल आसमानों की ll


उतरी जब यह नायाब चित्रकारी दर्पणों के सूने आगोश में l
विस्मित चकित खुदा भी ढल खो गया इसके प्रेम आगोश में ll

Tuesday, June 7, 2022

रंजिश

सदियों बाद भी रंजिशें कम ना थी इश्क खुमारी बीच l
दरिया तेजाब का बहता रहा हर दफा शुष्क आँखों बीच ll

उलझता रहा अपने ही इश्क के रंगीन हसीन ख्यालों बीच l
मोहलत कभी माँग लाता साँसों की अधजली फ़िज़ाओं बीच ll

कहानियाँ इस दहलीज की लफ्जों में मुकम्मल थी नहीं l
दस्तूर इस अंजुमन की रातें बिन चाँद गवाह अधूरी थी ll

ख्वाइशों की गुजारिशों में तल्ख़ थी बंदिश रिवाज़ों की l
लकीरों के कोहराम में हथेली सूनी थी मेहँदी हाथों की ll

कोई सरहद ना थी इन भींगे भींगे मौन अल्फ़ाज़ों बीच l
पहचान खुद की गुमनाम थी आइनों के इन अक्सों बीच ll

पहचान खुद की गुमनाम थी आइनों के इन अक्सों बीच l
पहचान खुद की गुमनाम थी आइनों के इन अक्सों बीच ll

Wednesday, June 1, 2022

हवा

सुन उसके पैरों की आहट हवाओं से मैं बात करते चला l
छाँव के साये महफ़ूज़ उसे रखने बदरा तुम संग लेते आना ll

तपिश की चुभन छाले ना पड़े उनके कदमों में l
उनके पैरों निशाँ पर तुम बारिश बन छा जाना ll

सरगम उसके पायलों की मिल रेत कणों से l
बासंती मृदंग रंग घोल रही उसके कर्णफूलों से ll

आना तुम भी मिलने मुझसा पागल दीवाना बनके l
आँचल आँधियों का पहना रूह मेरी बन ठहर जाना ll

सगुन की रंगों भरी इन मुलाकात बरसातों में l
मेहरम मेरी बन धड़कनें उनकी बन रच जाना ll

ए हवा मेहरबां बन तू मेरी इस सफर के हमसफर l
मिलन इस पहर आलिंगन खुशबु बनके छा जाना ll

Monday, May 23, 2022

ll ज्ञान व्यापी शिव ll

शिवालय तू मेरे ध्यानमग्न महताब का l
कंठ विष सा नीला इसके आसमान का ll

उलझी बिखरी केश लट जटाएं समेटी l
अनगिनत सी अश्रुधारा सागर वेग का ll

तांडव सा रौद्र रूप दमक रहा इसका l
नाच रहा क्षितिज मन महाकाल का ll

मस्तक तिलक त्रिशूल तेज बना इसने l
श्रृंगार रचा रखा हिमालय ताज का ll

भस्म धूनी रमाये जलती आधी साँझ का l
बज रहा डमरू इसके ही शिव जाप का ll

बज रहा डमरू इसके ही शिव जाप का l
बज रहा डमरू इसके ही शिव जाप का ll

Thursday, May 19, 2022

ज़ख्म

इन तन्हाइयों की अब कोई सहर नहीं l
साँझ सी डूबती धड़कनों में ख्वाब नहीं ll

काफिर की अनसुनी फ़रियाद थी जो कभी l
विलीन हो गयी पत्थरों के बीच आज कही ll

रूमानी थी जो शामें उसके नूर की गली गली l
मशहूर हैं वो आज सुरा की बदनाम गली गली ll

महरूम ख़ामोशियों ने तराशा था जो मंजर l
उस मोड़ पर तन्हा अधूरा खड़ा था बचपन ll

मशगूल थी मौजे अम्बर आस पास में l 
प्यासी थी फिर भी बूंदे अपने आप में ll

जुदा होना चाहा था ख़ुद ने जिस रुसवाई से l
लिपटा हुआ खड़ा था उसकी ही परछाई में ll

सौदा जिस रूह से इस तन का कभी हुआ था l
ज़ख्म उसका इस सीने से कभी जुदा हुआ नहीं ll

Thursday, May 12, 2022

बहाना

सोचा दफ़न कर आता हूँ यादों की उन बंदिशों को l
बिन बुलाएँ चलती आती जो कुरेदने ख्यालों को ll

बटोरी चुपके से यादें उन पुरानी किताबों के अंदर से l 
महफूज बेखबर सो रही थी जो खतों के लिहाफ अंदर ll 

उम्र दहलीज छू ना पायी थी उन यादों को अब तलक l
दुओं के ताबीज़ में लिपटी सिमटी थी इनकी रहगुजर ll

बेईमान सी कशमकश थी एक मन के अंदर ही अंदर l
क्यों ना मकबरा बना दूँ इसके दीदार के गुजरे सफर ll

फैसला होता कैसे दिलों की कशिश के बहते समंदर l
यादें ही तो एक बहाना थी छूने मधुशाला के समंदर ll

Monday, May 2, 2022

रूह

मजहब रंग एक था मेरी मोहब्बत का l
रोजा वो रखती इसकी सलामती का ll

इफ्तारी मैं करता उसके चाँद दीदार से l
कबूल हो जाती मन्नतें कई एक साथ में ll

होली मेरी जलती जैसे दिवाली रोशन आस में l
रंगों सराबोर होती उसकी कंचन काया साथ में ll

मीरा थी वो मेरे दिल रास रचे इस मधुवन की l
सहज भाव झुक जाती देख साया मंदिर की  ll

नफासत इतनी भरी थी दोनों दिलों जान में l
दुआएं छलकती इनसे जैसे तारों आसमान से ll

सरका हिजाब मुस्काती जब वो कनखियों नाज से l
बाँसुरी सी धुन घुल जाती मेरी रुकी रुकी सांस में ll

मीठी मीठी नज्म थी वो इस दिल गालियां चौबारों की शान से l
ना मंदिर ना मस्जिद की रूह थी वो गीता कुरान की एक साथ मे ll

Wednesday, April 20, 2022

कल्पनाशील

उलझी उलझी थी मोहब्बत मेरी उसके दिल की गली गली l
संगेमरमर सी ताज महल बन गयी वो यादों की गली गली ll

खुशनुमा हो जाते थे तरन्नुम के वो कुछ खास से पल l
छत पर जब नजर आ आती थी उसकी एक झलक ll

कसीदें उसके तारूफ में भेजा करते जब आसमाँ साथ में l
मेघों की लड़ियों भी सज जाती उसकी कर्णफूलें शान में ll

कलाई से बंधे धागों सी कोई कशिश थी इन चाहतों के बीच l
हथेलियों पर लिखी कोई इबादत थी जैसे इन लकीरों के बीच ll

करवटों की लिहाफ़ से हो जाती थी करारी तकरार सी l
चाँद जब जब उतर आता था मेरे झरोखे दालान भी ll

बड़ा मीठा सा रूमानी था कल्पनाशील का वो आशिकी मिजाज़ भी l
निभाने दस्तूर ख्यालों से निकल वो चले आते थे ख़्वाबों पास भी ll

अवदान उनकी उस मुस्कान का ही था मेरी उड़ानों के बीच l
जिक्र सिर्फ जिनकी आँखों का ही था मेरी किताबों के बीच ll

Sunday, April 3, 2022

तसव्वुर

संग पानी के रेत दरियाँ की लिपटी क़दमों से ऐसे l
मृगतृष्णा सी हिना सज गयी रेगिस्तान में जैसे ll

आसमाँ भी उतर आया सुन इसके झांझर की झंकार l
मुद्दतों बाद कोई सौगात ले आयी रंगों नूर की बारात ll

कुरेदा था जिसे कभी हथेलियों पर आयतों की तरह l
खुशफहमियाँ उन मौजों की मिल रही खुदा की तरह ll

आतुर कश्ती भी डोली थी कभी छूने इसके साहिल को l
सिमट गयी थी खोई खोई संकुचित लहरें अपने पानी को ll

बेबाक सी कह गयी थी दीवारें उस अंजुमन मजार की l
रुखसत होते ही तेरे हिज्रे बेनकाब हो गयी हिजाब की ll  

तसव्वुर उस चाँद का ओझल हुआ नहीं दिल के बीच l
खाब्बों के दरमियाँ अकेला रह गया इसके सजदे बीच ll

Tuesday, March 8, 2022

मल्हार

माना की वहम थी वो सांवली सी काया इन आँखों की l
पर अर्ध चाँद सी अधूरी ताबीर थी इस नूर ए अंदाज की ll

मौसम भी ऐसा बे रुत बदला इसके अंजुमन साज में l
मेघ मल्हार सज गया जैसे किसी प्यासे  रेगिस्तान में ll

छांव सलोनी सी खाब्बों की ढलती रात मुलाक़ातों की l
खलिस इस रहगुज़र की मौन करवटें बदलती रातों की ll

महकी थी फिजां हीना की कभी कभी उस दालान आस पास भी l
अहसास जब कभी सिमट आये इनके रुखसार दरमियाँ पास भी ll

किस्सा ए बयां थी उन बेईमान धड़कनों किस्तों का l
अनजानी अजनबी उन मचलती आरजू अंतरंगों का ll

एक सदी सी गुजर गयी रंगते रंगते रूह जिस कायनात की l
तस्वीर फिर भी अधूरी रह गयी उस सांवली काया साज की ll

Tuesday, February 22, 2022

मोड़

उन अनछुए लावण्य लम्हों का जिक्र जब जब चला l
साँसे अनजानी थी धड़कनों से भ्रम सत्य हो चला ll

गुलदस्ते एक किनारे पे बैठा था पल सिरहाने से l
पतझड़ सा मौसम दस्तक दे रहा जैसे सावन में ll

धागे बिन अधूरी थी पर मोतियों की वो माला l
पिरो गुँथी नहीं जिसमें इसकी शबनमी काया ll

खोई स्मृतियों झाँक रही घूंघट के उन दौरों से l
पानी नहीं था जब बादलों की उफनती मौजों में ll

प्यासे प्यासे रुंधे कंठ आतुर थे तर जाने को l
मदिरालय दूर खड़ी बुला रही पास आने को ll

लकीरें खिंची थी दोनों ने दहलीज के दोनों छोरों पर l
हौले बिसरा गया मिलन साँसों का धड़कन मोड़ पर ll

हौले बिसरा गया मिलन साँसों का धड़कन मोड़ पर l
हौले बिसरा गया मिलन साँसों का धड़कन मोड़ पर ll

Thursday, February 17, 2022

एक चाँद

हर रात खुली आँखों में जग जग के सोया करता हूँ l
एक चाँद के दीदार को पलकें खुली रखा करता हूँ ll

परिणय था पुतलियों का आसमाँ के जिस डगर से l
नयनों के तीर से घायल था ऐ परिंदा उस पनघट पर ll

तराशा जिस तरकश को हसीन ख्वाबों नजारों में l
परिणति हुई उसकी ढलती स्याह आधी रातों में ll

दृष्टि को लग गया मानो चंद्र ग्रहण सा कोई l
सृष्टि में जैसे दूसरा कमल और ना हो कहीं ll

मुस्तकबिल मेरा वाकिफ था इसकी भँवर गहराई से ll
तलाशता फिरा मुकाम फिर भी इसकी अँधेरी सच्चाई में l

परिचय जब हुआ पलकों का आँखों की उचटती नींदों से l
परिचित तब ही हुआ इसके दर्द भरे गुमनाम ठिकानों से ll

सम्भाल रखा हैं अहसान इन हसीं ख्यालातों के l
एहसास ताकि जिंदा रहे इन पलकों मुलाकातों के ll

Saturday, February 12, 2022

तस्दीक

जिंदगी ने भी कल तोहमत लगाई थी l
संभाली नहीं आरज़ुएँ मुद्दतों से मैंने कई ll

गिनी थी कल इसने मेरे साँसों की माला l
बड़ी बदरंग सी थी इनमे कुछ की काया ll

कुछ रोज पहले रंग भरे दिल की गहराइयों ने l
रंगी थी तस्वीर जिस इश्कों नूर ए चाँद की ll

धड़कनों में डूबी अपनी जिस कूची परछाई से l
पर कल रात वो क्यों नज़र आयी अर्ध चाँद सी ll

थम गयी रफ़्तार शायद मेरे अरमानों की l
राख हो गयी धुंआ मेरे जलते अंगारों की ll

तस्दीक यही हैं मेरी खुद से रुस्वाई का l
हमराज़ कोई बना नहीं मेरी परछाईं का ll

हमराज़ कोई बना नहीं मेरी परछाईं का l
हमराज़ कोई बना नहीं मेरी परछाईं का ll

Sunday, February 6, 2022

अकेली रात

कल की वो रात बड़ी अकेली थी l
अक्स भी वो गुमशुदा लापता था ll

दीदार में जिसके ठहरी हुई रातें भी l
खामोशी से ढ़ल सी जाया करती थी ll

अक्सर ख्वाब बन जो आया करता था l
मंजर कल की रात का वो अधूरा सा था ll

आवाज दे पुकारूँ उसे इस आलम में कैसे l
दर्द में डूबे अल्फाजों से कशिश वो दूर थी ll

काश यह रात मुझे भी अपने में समा जाती l
तन्हा करवटों में थोड़ी सी नींद पिरो जाती ll

मगर बारिश की वो करुण भीगी भीगी रुन्दन l
मेघों की वो भयभीत कांपती सी थरथराहट ll

डरा रही थी अधखुली पलकों को ऐसे l
नाता ना जोड़ों इन परायी नींदों से ऐसे ll 

चाँद वो जो अक्सर संग मेरे जगा करता था l
कल रात वो भी बिन सुलायें खो गया था ll

इस बैरंग आसमाँ में रंग जिसके भरा करते थे l
वो गुमनाम अक्स कल रात से गुमशुदा सा था ll

Wednesday, February 2, 2022

दिलकशी

अहसास उन मीठी मीठी यादों लम्हों का l 
श्रृंगार में रचे ढले हसीन सुरीले तरानों का ll

काफ़िला ले आया संग अपने एक बार फिर ये l
रंगने कारवाँ यादों की मौशिकी महफ़िलों का ये ll 

नज़र उतारू हर एक उन याद पायदानों की l
मरुधर संगम होता इनका जिस चिलमन पर ll

परछाइयाँ रूह सायों में लिपटी बेजुबान सी l
हर कदम जुदा यादों से होती जिस एक मोड़ पर ll 

अविस्मरणीय स्मृति ग्रंथ पल पल छलके l
इनके कण कण से अमृत सागर बूँदों सी ll

संकोच कुछ ऐसा यादों की इन तालीम में l
पलकें झुका कहती सिर्फ आँखों पुतलियों से ll 

मीठे दर्द सा फरमान इन अकेली तन्हा यादों में l 
फेहरिस्त लिखता जैसे अर्ध चाँद ढलती रातों में ll

जब जब आयी यादें बरसती सी मरुधर अंजुमन में l
साँसों को साँसों से जोड़ आयी इसके पहलू दामन से ll

डुबों इस मरुधर को मीठी यादों की सौगात बना l 
ताबूतों को भी दिलकशी में जीना सीखा आयी ये ll 

Wednesday, January 19, 2022

गुलदस्तां

गुलदस्तां हैं तू उन शबनमी गुलाबों का l
इश्क़ महके जिसके चुभते काँटों से भी ll

नाजुक कोमल पँखुड़ियों सा तेरा मासूम स्पर्श l 
छू रही मधुर चाँदनी जैसे कोई रसीला यौवन ll

महक रही पुरबाई बयार तेरी साँसों से ऐसे l
सुगंध तेरी मिल गयी इन धड़कनों से जैसे ll

कायनात तू इन रूमानी जज्बातों की l
जिस्म आफ़ताब रूहानी अंदाज़ों की ll

फरिश्ता तू उन मीठी चिलमन रातों की l 
डूबी रही सहर जिनके बंद गुलज़ारों की ll

सिमटी रहे सपनों सी इस निन्दियाँ गोद में l 
कैद करलूँ इन लम्हों को पलकों आगोश में ll 

Saturday, January 15, 2022

नया आयाम

अधरों पर अल्फाज़ मेरे थे पर ज़ज्बात तेरे थे l
अश्कों के दरिया में पर नयन दोनों के साथ थे ll

विरल थी तेरी वो अर्ध चाँद सी मासूम हँसी l
प्रेम ग्रहण लगा गयी जो इस नादाँ दिल को ll

महक रहा गुलाब सा यौवन गुल गुलशन सारा l
तेरे केशों साज में सजा जैसे वेणी गजरा सारा ll

ओढ़ ली जब आफताब ने चादर तेरे इश्क नाम की l
मुलाकातों के सायों में हमकदम भी एक साथ हो ll

मधुमास अंगार में जलती इसकी विरह चेतना l
रंग फूलों का गुलाब के इत्र सा महका रही जो ll

ख़ामोश सुर्ख लबों पर इश्क फ़साना लिख l
इबादत का नया आयाम दे गयी इस दिल को ll

Thursday, January 6, 2022

सोहबत

सोहबत में उस अजनबी के ऐसे रंगे हम l
तोहमत उसके गुनहा की हमको डस गयी ll 

पिंजर से इस परिंदे का रुख कैसे अब रुखसत हो l 
जब महताब के दाग में उसके गालों का तिल हो ll  

कायल थे जब हिजाब के पीछे छुपी उस नजाकत के l 
नफासत भरे पैगाम से इश्क़ लाजमी फिर कैसे ना हो ll

जादुई स्पर्श सा था उसकी मीठी मीठी बातों में l
सुध बुध भुला खो जाये साँसे जिन मुलाकातों में ll  

बेकरार उनकी निगाहों पलकों के दरमियाँ l
छिपा था बेबाक दीवानगी का आलम ऐसा ll

मुसाफिर मुझसा मशहूर गया उसके नाम से ऐसे l 
पता कोई अपना भूल गया उसके घर के आगे जैसे ll  


 

Tuesday, January 4, 2022

धुँधला

रिश्तों के बाजार में नया कुछ ना था l
दर्पण में हर एक चेहरा धुँधला सा था ll

अर्सों सँवारा नाजों से जिस हर एक पल को l 
काफूर गुम था वजूद हर एक उस पल का ll

टुकड़ों टुकड़ों बिका मैं भी परिंदा नादान l
तौलता गया तराजू बिन किये दर भाव ll

स्पर्श था रक्त का हवाओं के आस पास l
बहा था मेरा लहू जो अश्कों के साथ साथ ll 

सौदागरी बदल गयी देखने परखने के अंदाज़ l 
काफ़िरना बन गया मैं काफिरों के साथ साथ ll

हर एक मोल में थी छुपी थी एक ही अरदास l
कहीं दिल ना बिक जाये जिस्म के साथ साथ ll 

अहमियत खो गए सारे जज्बाती बात व्यवहार l
धूल में मिल मिट गए रिश्तों के सारे तार सार ll

सौदागरों की इस बस्ती में रिश्ते थे बेईमान l
अक्स भी धुँधला हो जाता आकर दर्पण पास ll