Friday, July 1, 2022

साँझा दर्द

छिपाने अश्कों याराना बारिशों से मैंने कर ली l
मेघों की बिखरती बूँदों से दर्द भी साँझा कर ली ll


शिकवा रहे ना खुद से किसी बेरुखी का l
काले बादलों में हबीबी की नूर तराश ली ll


हौले से अधूरे ख्वाब बेच जाती नींद पलकों में l
कोलाहल सागर मल्हारों यही थी जो छुपा लाती ll


रुखसत होने इस अश्रु व्यंग परिहास ज़ख्मों से l
बूँदों की फुसफुसाहट ताबीर इसकी बना डाली ll


फिदा बारिशों के इस संगम मनुहार पर l
धारा अश्कों मेहरान घटायें सिमट आती ll

Friday, June 10, 2022

ll सरल प्रेम ll

सरल थी वो ओस की उन अनछुई शबनमी बूँदों सी l
इतराती अठखेलियाँ विलुप्त हो जाती पवन वेगों सी ll


चिंतन मनन जब जब करता उसे अल्फाजों पिरो सीने की l
लब मौन तब तब सिल जाते उसके गुलाब पराग कणों सी ll


नाम जिनका उकेरा था सागर सी मचलती जल तरंगों पर l
दरिया बन समा गयी वो मेरे अधूरे क्षितिज अश्रु बूँदों पर ll


संजोग तारतम्य अक्षरों चयन बीच कभी हुए नहीं l
संदेशों में भी बैरंग खत कभी हमसे अता हुए नहीं ll


खुमारी इसकी मीठी मीठी आबो हवा बारिश बारातों की l
मुक्तक पतंग उड़ा रही परिंदों सी रंगे दिल आसमानों की ll


उतरी जब यह नायाब चित्रकारी दर्पणों के सूने आगोश में l
विस्मित चकित खुदा भी ढल खो गया इसके प्रेम आगोश में ll

Tuesday, June 7, 2022

रंजिश

सदियों बाद भी रंजिशें कम ना थी इश्क खुमारी बीच l
दरिया तेजाब का बहता रहा हर दफा शुष्क आँखों बीच ll

उलझता रहा अपने ही इश्क के रंगीन हसीन ख्यालों बीच l
मोहलत कभी माँग लाता साँसों की अधजली फ़िज़ाओं बीच ll

कहानियाँ इस दहलीज की लफ्जों में मुकम्मल थी नहीं l
दस्तूर इस अंजुमन की रातें बिन चाँद गवाह अधूरी थी ll

ख्वाइशों की गुजारिशों में तल्ख़ थी बंदिश रिवाज़ों की l
लकीरों के कोहराम में हथेली सूनी थी मेहँदी हाथों की ll

कोई सरहद ना थी इन भींगे भींगे मौन अल्फ़ाज़ों बीच l
पहचान खुद की गुमनाम थी आइनों के इन अक्सों बीच ll

पहचान खुद की गुमनाम थी आइनों के इन अक्सों बीच l
पहचान खुद की गुमनाम थी आइनों के इन अक्सों बीच ll

Wednesday, June 1, 2022

हवा

सुन उसके पैरों की आहट हवाओं से मैं बात करते चला l
छाँव के साये महफ़ूज़ उसे रखने बदरा तुम संग लेते आना ll

तपिश की चुभन छाले ना पड़े उनके कदमों में l
उनके पैरों निशाँ पर तुम बारिश बन छा जाना ll

सरगम उसके पायलों की मिल रेत कणों से l
बासंती मृदंग रंग घोल रही उसके कर्णफूलों से ll

आना तुम भी मिलने मुझसा पागल दीवाना बनके l
आँचल आँधियों का पहना रूह मेरी बन ठहर जाना ll

सगुन की रंगों भरी इन मुलाकात बरसातों में l
मेहरम मेरी बन धड़कनें उनकी बन रच जाना ll

ए हवा मेहरबां बन तू मेरी इस सफर के हमसफर l
मिलन इस पहर आलिंगन खुशबु बनके छा जाना ll

Monday, May 23, 2022

ll ज्ञान व्यापी शिव ll

शिवालय तू मेरे ध्यानमग्न महताब का l
कंठ विष सा नीला इसके आसमान का ll

उलझी बिखरी केश लट जटाएं समेटी l
अनगिनत सी अश्रुधारा सागर वेग का ll

तांडव सा रौद्र रूप दमक रहा इसका l
नाच रहा क्षितिज मन महाकाल का ll

मस्तक तिलक त्रिशूल तेज बना इसने l
श्रृंगार रचा रखा हिमालय ताज का ll

भस्म धूनी रमाये जलती आधी साँझ का l
बज रहा डमरू इसके ही शिव जाप का ll

बज रहा डमरू इसके ही शिव जाप का l
बज रहा डमरू इसके ही शिव जाप का ll

Thursday, May 19, 2022

ज़ख्म

इन तन्हाइयों की अब कोई सहर नहीं l
साँझ सी डूबती धड़कनों में ख्वाब नहीं ll

काफिर की अनसुनी फ़रियाद थी जो कभी l
विलीन हो गयी पत्थरों के बीच आज कही ll

रूमानी थी जो शामें उसके नूर की गली गली l
मशहूर हैं वो आज सुरा की बदनाम गली गली ll

महरूम ख़ामोशियों ने तराशा था जो मंजर l
उस मोड़ पर तन्हा अधूरा खड़ा था बचपन ll

मशगूल थी मौजे अम्बर आस पास में l 
प्यासी थी फिर भी बूंदे अपने आप में ll

जुदा होना चाहा था ख़ुद ने जिस रुसवाई से l
लिपटा हुआ खड़ा था उसकी ही परछाई में ll

सौदा जिस रूह से इस तन का कभी हुआ था l
ज़ख्म उसका इस सीने से कभी जुदा हुआ नहीं ll

Thursday, May 12, 2022

बहाना

सोचा दफ़न कर आता हूँ यादों की उन बंदिशों को l
बिन बुलाएँ चलती आती जो कुरेदने ख्यालों को ll

बटोरी चुपके से यादें उन पुरानी किताबों के अंदर से l 
महफूज बेखबर सो रही थी जो खतों के लिहाफ अंदर ll 

उम्र दहलीज छू ना पायी थी उन यादों को अब तलक l
दुओं के ताबीज़ में लिपटी सिमटी थी इनकी रहगुजर ll

बेईमान सी कशमकश थी एक मन के अंदर ही अंदर l
क्यों ना मकबरा बना दूँ इसके दीदार के गुजरे सफर ll

फैसला होता कैसे दिलों की कशिश के बहते समंदर l
यादें ही तो एक बहाना थी छूने मधुशाला के समंदर ll

Monday, May 2, 2022

रूह

मजहब रंग एक था मेरी मोहब्बत का l
रोजा वो रखती इसकी सलामती का ll

इफ्तारी मैं करता उसके चाँद दीदार से l
कबूल हो जाती मन्नतें कई एक साथ में ll

होली मेरी जलती जैसे दिवाली रोशन आस में l
रंगों सराबोर होती उसकी कंचन काया साथ में ll

मीरा थी वो मेरे दिल रास रचे इस मधुवन की l
सहज भाव झुक जाती देख साया मंदिर की  ll

नफासत इतनी भरी थी दोनों दिलों जान में l
दुआएं छलकती इनसे जैसे तारों आसमान से ll

सरका हिजाब मुस्काती जब वो कनखियों नाज से l
बाँसुरी सी धुन घुल जाती मेरी रुकी रुकी सांस में ll

मीठी मीठी नज्म थी वो इस दिल गालियां चौबारों की शान से l
ना मंदिर ना मस्जिद की रूह थी वो गीता कुरान की एक साथ मे ll

Wednesday, April 20, 2022

कल्पनाशील

उलझी उलझी थी मोहब्बत मेरी उसके दिल की गली गली l
संगेमरमर सी ताज महल बन गयी वो यादों की गली गली ll

खुशनुमा हो जाते थे तरन्नुम के वो कुछ खास से पल l
छत पर जब नजर आ आती थी उसकी एक झलक ll

कसीदें उसके तारूफ में भेजा करते जब आसमाँ साथ में l
मेघों की लड़ियों भी सज जाती उसकी कर्णफूलें शान में ll

कलाई से बंधे धागों सी कोई कशिश थी इन चाहतों के बीच l
हथेलियों पर लिखी कोई इबादत थी जैसे इन लकीरों के बीच ll

करवटों की लिहाफ़ से हो जाती थी करारी तकरार सी l
चाँद जब जब उतर आता था मेरे झरोखे दालान भी ll

बड़ा मीठा सा रूमानी था कल्पनाशील का वो आशिकी मिजाज़ भी l
निभाने दस्तूर ख्यालों से निकल वो चले आते थे ख़्वाबों पास भी ll

अवदान उनकी उस मुस्कान का ही था मेरी उड़ानों के बीच l
जिक्र सिर्फ जिनकी आँखों का ही था मेरी किताबों के बीच ll

Sunday, April 3, 2022

तसव्वुर

संग पानी के रेत दरियाँ की लिपटी क़दमों से ऐसे l
मृगतृष्णा सी हिना सज गयी रेगिस्तान में जैसे ll

आसमाँ भी उतर आया सुन इसके झांझर की झंकार l
मुद्दतों बाद कोई सौगात ले आयी रंगों नूर की बारात ll

कुरेदा था जिसे कभी हथेलियों पर आयतों की तरह l
खुशफहमियाँ उन मौजों की मिल रही खुदा की तरह ll

आतुर कश्ती भी डोली थी कभी छूने इसके साहिल को l
सिमट गयी थी खोई खोई संकुचित लहरें अपने पानी को ll

बेबाक सी कह गयी थी दीवारें उस अंजुमन मजार की l
रुखसत होते ही तेरे हिज्रे बेनकाब हो गयी हिजाब की ll  

तसव्वुर उस चाँद का ओझल हुआ नहीं दिल के बीच l
खाब्बों के दरमियाँ अकेला रह गया इसके सजदे बीच ll

Tuesday, March 8, 2022

मल्हार

माना की वहम थी वो सांवली सी काया इन आँखों की l
पर अर्ध चाँद सी अधूरी ताबीर थी इस नूर ए अंदाज की ll

मौसम भी ऐसा बे रुत बदला इसके अंजुमन साज में l
मेघ मल्हार सज गया जैसे किसी प्यासे  रेगिस्तान में ll

छांव सलोनी सी खाब्बों की ढलती रात मुलाक़ातों की l
खलिस इस रहगुज़र की मौन करवटें बदलती रातों की ll

महकी थी फिजां हीना की कभी कभी उस दालान आस पास भी l
अहसास जब कभी सिमट आये इनके रुखसार दरमियाँ पास भी ll

किस्सा ए बयां थी उन बेईमान धड़कनों किस्तों का l
अनजानी अजनबी उन मचलती आरजू अंतरंगों का ll

एक सदी सी गुजर गयी रंगते रंगते रूह जिस कायनात की l
तस्वीर फिर भी अधूरी रह गयी उस सांवली काया साज की ll

Tuesday, February 22, 2022

मोड़

उन अनछुए लावण्य लम्हों का जिक्र जब जब चला l
साँसे अनजानी थी धड़कनों से भ्रम सत्य हो चला ll

गुलदस्ते एक किनारे पे बैठा था पल सिरहाने से l
पतझड़ सा मौसम दस्तक दे रहा जैसे सावन में ll

धागे बिन अधूरी थी पर मोतियों की वो माला l
पिरो गुँथी नहीं जिसमें इसकी शबनमी काया ll

खोई स्मृतियों झाँक रही घूंघट के उन दौरों से l
पानी नहीं था जब बादलों की उफनती मौजों में ll

प्यासे प्यासे रुंधे कंठ आतुर थे तर जाने को l
मदिरालय दूर खड़ी बुला रही पास आने को ll

लकीरें खिंची थी दोनों ने दहलीज के दोनों छोरों पर l
हौले बिसरा गया मिलन साँसों का धड़कन मोड़ पर ll

हौले बिसरा गया मिलन साँसों का धड़कन मोड़ पर l
हौले बिसरा गया मिलन साँसों का धड़कन मोड़ पर ll

Thursday, February 17, 2022

एक चाँद

हर रात खुली आँखों में जग जग के सोया करता हूँ l
एक चाँद के दीदार को पलकें खुली रखा करता हूँ ll

परिणय था पुतलियों का आसमाँ के जिस डगर से l
नयनों के तीर से घायल था ऐ परिंदा उस पनघट पर ll

तराशा जिस तरकश को हसीन ख्वाबों नजारों में l
परिणति हुई उसकी ढलती स्याह आधी रातों में ll

दृष्टि को लग गया मानो चंद्र ग्रहण सा कोई l
सृष्टि में जैसे दूसरा कमल और ना हो कहीं ll

मुस्तकबिल मेरा वाकिफ था इसकी भँवर गहराई से ll
तलाशता फिरा मुकाम फिर भी इसकी अँधेरी सच्चाई में l

परिचय जब हुआ पलकों का आँखों की उचटती नींदों से l
परिचित तब ही हुआ इसके दर्द भरे गुमनाम ठिकानों से ll

सम्भाल रखा हैं अहसान इन हसीं ख्यालातों के l
एहसास ताकि जिंदा रहे इन पलकों मुलाकातों के ll

Saturday, February 12, 2022

तस्दीक

जिंदगी ने भी कल तोहमत लगाई थी l
संभाली नहीं आरज़ुएँ मुद्दतों से मैंने कई ll

गिनी थी कल इसने मेरे साँसों की माला l
बड़ी बदरंग सी थी इनमे कुछ की काया ll

कुछ रोज पहले रंग भरे दिल की गहराइयों ने l
रंगी थी तस्वीर जिस इश्कों नूर ए चाँद की ll

धड़कनों में डूबी अपनी जिस कूची परछाई से l
पर कल रात वो क्यों नज़र आयी अर्ध चाँद सी ll

थम गयी रफ़्तार शायद मेरे अरमानों की l
राख हो गयी धुंआ मेरे जलते अंगारों की ll

तस्दीक यही हैं मेरी खुद से रुस्वाई का l
हमराज़ कोई बना नहीं मेरी परछाईं का ll

हमराज़ कोई बना नहीं मेरी परछाईं का l
हमराज़ कोई बना नहीं मेरी परछाईं का ll

Sunday, February 6, 2022

अकेली रात

कल की वो रात बड़ी अकेली थी l
अक्स भी वो गुमशुदा लापता था ll

दीदार में जिसके ठहरी हुई रातें भी l
खामोशी से ढ़ल सी जाया करती थी ll

अक्सर ख्वाब बन जो आया करता था l
मंजर कल की रात का वो अधूरा सा था ll

आवाज दे पुकारूँ उसे इस आलम में कैसे l
दर्द में डूबे अल्फाजों से कशिश वो दूर थी ll

काश यह रात मुझे भी अपने में समा जाती l
तन्हा करवटों में थोड़ी सी नींद पिरो जाती ll

मगर बारिश की वो करुण भीगी भीगी रुन्दन l
मेघों की वो भयभीत कांपती सी थरथराहट ll

डरा रही थी अधखुली पलकों को ऐसे l
नाता ना जोड़ों इन परायी नींदों से ऐसे ll 

चाँद वो जो अक्सर संग मेरे जगा करता था l
कल रात वो भी बिन सुलायें खो गया था ll

इस बैरंग आसमाँ में रंग जिसके भरा करते थे l
वो गुमनाम अक्स कल रात से गुमशुदा सा था ll

Wednesday, February 2, 2022

दिलकशी

अहसास उन मीठी मीठी यादों लम्हों का l 
श्रृंगार में रचे ढले हसीन सुरीले तरानों का ll

काफ़िला ले आया संग अपने एक बार फिर ये l
रंगने कारवाँ यादों की मौशिकी महफ़िलों का ये ll 

नज़र उतारू हर एक उन याद पायदानों की l
मरुधर संगम होता इनका जिस चिलमन पर ll

परछाइयाँ रूह सायों में लिपटी बेजुबान सी l
हर कदम जुदा यादों से होती जिस एक मोड़ पर ll 

अविस्मरणीय स्मृति ग्रंथ पल पल छलके l
इनके कण कण से अमृत सागर बूँदों सी ll

संकोच कुछ ऐसा यादों की इन तालीम में l
पलकें झुका कहती सिर्फ आँखों पुतलियों से ll 

मीठे दर्द सा फरमान इन अकेली तन्हा यादों में l 
फेहरिस्त लिखता जैसे अर्ध चाँद ढलती रातों में ll

जब जब आयी यादें बरसती सी मरुधर अंजुमन में l
साँसों को साँसों से जोड़ आयी इसके पहलू दामन से ll

डुबों इस मरुधर को मीठी यादों की सौगात बना l 
ताबूतों को भी दिलकशी में जीना सीखा आयी ये ll 

Wednesday, January 19, 2022

गुलदस्तां

गुलदस्तां हैं तू उन शबनमी गुलाबों का l
इश्क़ महके जिसके चुभते काँटों से भी ll

नाजुक कोमल पँखुड़ियों सा तेरा मासूम स्पर्श l 
छू रही मधुर चाँदनी जैसे कोई रसीला यौवन ll

महक रही पुरबाई बयार तेरी साँसों से ऐसे l
सुगंध तेरी मिल गयी इन धड़कनों से जैसे ll

कायनात तू इन रूमानी जज्बातों की l
जिस्म आफ़ताब रूहानी अंदाज़ों की ll

फरिश्ता तू उन मीठी चिलमन रातों की l 
डूबी रही सहर जिनके बंद गुलज़ारों की ll

सिमटी रहे सपनों सी इस निन्दियाँ गोद में l 
कैद करलूँ इन लम्हों को पलकों आगोश में ll 

Saturday, January 15, 2022

नया आयाम

अधरों पर अल्फाज़ मेरे थे पर ज़ज्बात तेरे थे l
अश्कों के दरिया में पर नयन दोनों के साथ थे ll

विरल थी तेरी वो अर्ध चाँद सी मासूम हँसी l
प्रेम ग्रहण लगा गयी जो इस नादाँ दिल को ll

महक रहा गुलाब सा यौवन गुल गुलशन सारा l
तेरे केशों साज में सजा जैसे वेणी गजरा सारा ll

ओढ़ ली जब आफताब ने चादर तेरे इश्क नाम की l
मुलाकातों के सायों में हमकदम भी एक साथ हो ll

मधुमास अंगार में जलती इसकी विरह चेतना l
रंग फूलों का गुलाब के इत्र सा महका रही जो ll

ख़ामोश सुर्ख लबों पर इश्क फ़साना लिख l
इबादत का नया आयाम दे गयी इस दिल को ll

Thursday, January 6, 2022

सोहबत

सोहबत में उस अजनबी के ऐसे रंगे हम l
तोहमत उसके गुनहा की हमको डस गयी ll 

पिंजर से इस परिंदे का रुख कैसे अब रुखसत हो l 
जब महताब के दाग में उसके गालों का तिल हो ll  

कायल थे जब हिजाब के पीछे छुपी उस नजाकत के l 
नफासत भरे पैगाम से इश्क़ लाजमी फिर कैसे ना हो ll

जादुई स्पर्श सा था उसकी मीठी मीठी बातों में l
सुध बुध भुला खो जाये साँसे जिन मुलाकातों में ll  

बेकरार उनकी निगाहों पलकों के दरमियाँ l
छिपा था बेबाक दीवानगी का आलम ऐसा ll

मुसाफिर मुझसा मशहूर गया उसके नाम से ऐसे l 
पता कोई अपना भूल गया उसके घर के आगे जैसे ll  


 

Tuesday, January 4, 2022

धुँधला

रिश्तों के बाजार में नया कुछ ना था l
दर्पण में हर एक चेहरा धुँधला सा था ll

अर्सों सँवारा नाजों से जिस हर एक पल को l 
काफूर गुम था वजूद हर एक उस पल का ll

टुकड़ों टुकड़ों बिका मैं भी परिंदा नादान l
तौलता गया तराजू बिन किये दर भाव ll

स्पर्श था रक्त का हवाओं के आस पास l
बहा था मेरा लहू जो अश्कों के साथ साथ ll 

सौदागरी बदल गयी देखने परखने के अंदाज़ l 
काफ़िरना बन गया मैं काफिरों के साथ साथ ll

हर एक मोल में थी छुपी थी एक ही अरदास l
कहीं दिल ना बिक जाये जिस्म के साथ साथ ll 

अहमियत खो गए सारे जज्बाती बात व्यवहार l
धूल में मिल मिट गए रिश्तों के सारे तार सार ll

सौदागरों की इस बस्ती में रिश्ते थे बेईमान l
अक्स भी धुँधला हो जाता आकर दर्पण पास ll