Tuesday, August 2, 2022

निःशब्द

कहाँ से चला था कौन सी डगर का मुकाम था वो l

राहों की अधीर पगडण्डियाँ का सैलाब सा था जो ll


टूटे खंडहरों का आशियाँ था शायद जैसे कोई l

बिखरे ख्वाबों की लूटी अस्मत थी जैसे कोई ll


झंझोर था एक रुकी हुई दबी सी हल्की आहट का कहीं l

दस्तक दे रही जो निःशब्द अहसासों को कभी कभी ll


व्याकुल पपहिया छुपे पैगाम भेज रहा था जैसे कोई l

शब्द फिर भी पास ना थे उन सूखे हुए लबों के कहीं ll


बैचैन सावन की पुरवाई का रुख जुदा था खुद से कहीं कहीं l

रौनक ऐ महफिल का चाँद तन्हा खोया हुआ था और कहीं ll


इतनी भर साँसे अब तलक भी जो थी जिंदा बची खुची l

एक संदेशे इंतजार में धड़का जाती थी यह दिल कभी कभी ll

Friday, July 1, 2022

साँझा दर्द

छिपाने अश्कों याराना बारिशों से मैंने कर ली l
मेघों की बिखरती बूँदों से दर्द भी साँझा कर ली ll


शिकवा रहे ना खुद से किसी बेरुखी का l
काले बादलों में हबीबी की नूर तराश ली ll


हौले से अधूरे ख्वाब बेच जाती नींद पलकों में l
कोलाहल सागर मल्हारों यही थी जो छुपा लाती ll


रुखसत होने इस अश्रु व्यंग परिहास ज़ख्मों से l
बूँदों की फुसफुसाहट ताबीर इसकी बना डाली ll


फिदा बारिशों के इस संगम मनुहार पर l
धारा अश्कों मेहरान घटायें सिमट आती ll

Friday, June 10, 2022

ll सरल प्रेम ll

सरल थी वो ओस की उन अनछुई शबनमी बूँदों सी l
इतराती अठखेलियाँ विलुप्त हो जाती पवन वेगों सी ll


चिंतन मनन जब जब करता उसे अल्फाजों पिरो सीने की l
लब मौन तब तब सिल जाते उसके गुलाब पराग कणों सी ll


नाम जिनका उकेरा था सागर सी मचलती जल तरंगों पर l
दरिया बन समा गयी वो मेरे अधूरे क्षितिज अश्रु बूँदों पर ll


संजोग तारतम्य अक्षरों चयन बीच कभी हुए नहीं l
संदेशों में भी बैरंग खत कभी हमसे अता हुए नहीं ll


खुमारी इसकी मीठी मीठी आबो हवा बारिश बारातों की l
मुक्तक पतंग उड़ा रही परिंदों सी रंगे दिल आसमानों की ll


उतरी जब यह नायाब चित्रकारी दर्पणों के सूने आगोश में l
विस्मित चकित खुदा भी ढल खो गया इसके प्रेम आगोश में ll

Tuesday, June 7, 2022

रंजिश

सदियों बाद भी रंजिशें कम ना थी इश्क खुमारी बीच l
दरिया तेजाब का बहता रहा हर दफा शुष्क आँखों बीच ll

उलझता रहा अपने ही इश्क के रंगीन हसीन ख्यालों बीच l
मोहलत कभी माँग लाता साँसों की अधजली फ़िज़ाओं बीच ll

कहानियाँ इस दहलीज की लफ्जों में मुकम्मल थी नहीं l
दस्तूर इस अंजुमन की रातें बिन चाँद गवाह अधूरी थी ll

ख्वाइशों की गुजारिशों में तल्ख़ थी बंदिश रिवाज़ों की l
लकीरों के कोहराम में हथेली सूनी थी मेहँदी हाथों की ll

कोई सरहद ना थी इन भींगे भींगे मौन अल्फ़ाज़ों बीच l
पहचान खुद की गुमनाम थी आइनों के इन अक्सों बीच ll

पहचान खुद की गुमनाम थी आइनों के इन अक्सों बीच l
पहचान खुद की गुमनाम थी आइनों के इन अक्सों बीच ll

Wednesday, June 1, 2022

हवा

सुन उसके पैरों की आहट हवाओं से मैं बात करते चला l
छाँव के साये महफ़ूज़ उसे रखने बदरा तुम संग लेते आना ll

तपिश की चुभन छाले ना पड़े उनके कदमों में l
उनके पैरों निशाँ पर तुम बारिश बन छा जाना ll

सरगम उसके पायलों की मिल रेत कणों से l
बासंती मृदंग रंग घोल रही उसके कर्णफूलों से ll

आना तुम भी मिलने मुझसा पागल दीवाना बनके l
आँचल आँधियों का पहना रूह मेरी बन ठहर जाना ll

सगुन की रंगों भरी इन मुलाकात बरसातों में l
मेहरम मेरी बन धड़कनें उनकी बन रच जाना ll

ए हवा मेहरबां बन तू मेरी इस सफर के हमसफर l
मिलन इस पहर आलिंगन खुशबु बनके छा जाना ll