Wednesday, August 4, 2021

आईना

आईना हमने भी देखा हैं करीब से गुजरते हुए    
तेरी हुस्न तपिश में जल मोम सा पिघलते हुए 

वाकिफ़ ज़माना रहा परदानशीन तेरे हुस्नों अंदाज़ से 
नज़रें मिलायी हटा हिज़ाब सिर्फ तूने दर्पण यार से 

आये तुम जब कभी इस अंजुमन की छावं में 
चाँद ईद का निकल आया जैसे अमवास रात में 

रंगीन चूड़ियाँ काँच की मिली जब काँच से 
चटक गयी कोर आईने की तेरी झंकार से 

सिर्फ तेरा ही चेहरा नज़र आया आईने को 
अपने बदले बदले हुए दर्पण अक्स राग में

टूट बिखरा आईना जब छोटी छोटी धार में  
तस्वीर तेरी ही उभरी तब भी इसके आगाज़ में 

Tuesday, July 27, 2021

बूँदे

बारिश की उन बूँदों की भी अपनी कुछ ख्वाइशें थी l  
ओस बूँदों सी स्पर्श करुँ उसके गालोँ के तिल पास से ll  

मचली थी घटायें भी एक रोज मदहोशी शराब सी l
छू जाऊ बरस संगेमरमर की उस हसीन क़ायनात को ll 

पर चुपके से दबे पावँ बयार एक दौड़ी चली आयी l
संग अपने उड़ा बादलों को आसमाँ शून्य कर आयी ll 

आवारा हो गयी हसरतें बारिश आते आते इस मोड़ पर l  
बिखरा रंग गयी आसमां काले काले काजल की कोण से ll 

धुन लगी थी बूँदों को भी इसी उम्र बरस जाने की l
भींगी भींगी रातों में बाँहों के तन से लिपट जाने की ll    

आतुर थे छिछोरे बादल भीगने उस बरसात में l
घुँघरू बन सज जाने उन सुने सुने पावँ में ll

Wednesday, July 21, 2021

सकून

अजीब सा सकून था झोपड़े के उस खंडहर में l
बिछौने आँचल पसरा देती माँ रोता मैं जब डर के ll

सिरह जाता कौंधने बिजली कभी आधी रातों में l  
सीने से दुबका नींदों में सुला देते थे तब बाबा भी ll

एक अदद टूटी लालटेन ही रोशनी का सहारा थी l 
अँधियारे से लड़ती इसकी कमजोर लौ बेसहारा थी ll 

टपकती छत अँगीठी अक्सर बुझा जाती थी l
माँ फिर भी साँसे फूँक इसको सुलगा लाती थी ll 

मेरे लिए खाट जो बुनी थी बाबा ने अपनी धोती से l
थपकी की थाप लौरी की गूँज छाप दोनों थी उसमें ll

माँ की उस रसोई से भी दुलार ऐसा बरस आता था l 
सूखी रोटी नमक में भी मक्खन स्वाद का आता था ll   

मोहताज़ थी वो झोपड़ी खंडहर एक दरवाज़े के लिए l
फिर भी कोई कमी ना थी माँ बाबा के उस क्षत्रशाल में ll

महसूस हुई ना कभी कोई कमी इसकी धूप छाँव में l 
अजीब सा सकून था उस झोपड़े की दरों दीवार में ll 

मिल जाये वो ही सकून एक बार फिर से l 
रो दिया लिपट यादों की उस तस्वीर से ll 

Sunday, July 18, 2021

अनाम रिश्ते

कुछ रिश्ते अनाम अनजाने से होते हैं l
सिर्फ ख्यालों में सपने पिरोने आते हैं ll

दायरे इनके सिमटे सिमटे नज़र आते हैं l
नींदों में चिलमन इनके गुलज़ार हो आते हैं ll    

तसब्बुर में इनकी खाब्ब ऐसे घुल मिल जाते हैं l 
जन्नत के उन पल खुली पलकें ही सो जाते हैं ll

परछाइयाँ मेहरम इनकी इस कदर चले आते हैं l
धागे रिश्तें इनसे खुद ही खुद जुड़ते चले जाते हैं ll

खाब्ब कभी नींदों से जो खफा हो जाते हैं l
हलचल दिलजलों सी पीछे छोड़ जाते हैं ll

गुज़ारिश रही नींदो की ख़ब्बों के दरमियाँ l 
उम्र मुकमल होती नहीँ इन रिश्तोँ के बिना ll 

आरज़ू इनके साँसों की पलकों के खाब्बों की l
मियाद सजी रहे अनजाने रिश्तों खाब्बों की ll  

Saturday, July 3, 2021

खामोशियाँ

खामोशियाँ कह गयी लब कह ना पाए जो बात l
लफ्ज अल्फाज बिखर उठे पा कायनात को पास ll 

खत नयनों के छलक पढ़ने लगे कलमों के अंदाज़ l
गूँज उठी अजान साँझ की लिए कई सिंदूरी पैगाम ll

लज्जा रही पलकें सुर्ख हो रहे उसके गुलाबी गाल l
दूर क्षितिज पर भी चमक रहा उसका ही आफ़ताब ll 

तहरीर थी दिल अंजुमन में ताबीर जिसकी चाह l
जुस्तजू मयसर हो गयी रूह रूहानी आगोश समाय ll

लहजा तकरीरें दे गयी सौगात एक दूजे के नाम l 
परदे में भी बेपर्दा हो गए उनके नूरों के साज ll

सँभाला था जिस नफासत को नजाकत की तरह l
नज़राना मेहर हो गयी वो दिल रिवायतों की तरह ll

संजीदा थे इस पनघट की बोलियों के पैगाम l
निसार हो उठी शोखियाँ देख चाँदनी इठलाय ll

खामोशियाँ कह गयी लब कह ना पाए जो बात l
लफ्ज अल्फाज बिखर उठे पा कायनात को पास ll