Thursday, July 2, 2026

काग़ज़ फूल

खो गयी परछाईं उस अलख जगाते अर्ध चाँद की l

पतंग मांझे डोरी उलझ चटकी चरखी पायदान की ll


कमसिन बुनियाद कच्चे धागे पिरोई साँझी रात की l

आसमाँ धुन्ध ढाँक गयी उसे काले आँचल छाँव की ll


स्थिल हो चली करवटें सिरहाने अस्तित्व साँस की l

टूटा स्पर्श इस सूने झरोखे आँगन उतरे मझधार की ll


टूटी निंद्रा केशों वेणी गुँथी मन बावरे नादान की l 

फिसली धड़कन लकीरें उस मोक्ष संगम चाह की ll


मिटा गयी तारीख उस गुलाबी सर्द काग़ज़ फूलों साँझ की l

डस गयी जिसे ग्रहण रेखा एक अंतिम आलिंगन पुकार की ll

Sunday, June 7, 2026

गुजारिश

गुजारिश थी मेरी शबनमी मोती बूँदों की बोलती लिखावट कहानी की l

सदियाँ ना लगाना कोरे कागज लिखे मौन अल्फाजों सुनने जुबानी सी ll


निहारना शहद घुली मीठी चासनी सलवटें इस एकांकी वर्णन की ll

पढ़ने जिस खुली अधूरे प्रेम ग्रंथ को बैचैन था वो मेरा चाँद भी कभी ll


बातें वो याद करना आँखों से ही सिर्फ तुम मेरी उस लेखनी सहर की l

जिस पतंग मांझे डोरी उलझ गयी थी कभी तेरे ख्वाबों की कोई डोर भी ll


इजहार कुछ तो किया होगा इन सूखी स्याही पीछे छुपी पहेली राजों ने l

खुदगर्ज़ आलम भी कितना अकेला था इस बियाबान शब्दों संस्कारों में ll


टूटी कलम नोंक लिखती रही आखर टेढ़े मेढ़े डुबो खुद को सरोबार रंगों में l

कतरन उन पुरानी पैबंद लगे किताबों की खोई रही यादों की इस अलमारी में ll

Thursday, May 21, 2026

वैतरणी

लाजमी थी गलतफहमियां मधुशाला क़ुरबत आलिंगन हाथ में l

मदहोश थी दहलीजें इसकी नजदीकियां अफ़साने आँगन खास में ll


रंग ज़माने खुदगर्जीयों के थे बहरूपिये मयखाने सरूर रफ्तार में l 

नाजुक थी कड़ियां इसके मजहब तालीम छलकते जामों प्याम में ll


पूरी थी जिन्दगानी इसकी रूह कडियों महफ़िलों सजती शाम में l

शून्य भी शृंगार सा था इसके कायनात पटल चमकते अर्ध चाँद में ll


इन्द्रधनुषी पगडण्डियाँ सी रोशनी मधुशाला छलकते नयनों खोये जाम में l

तर गयी कंठ वैतरणी भूल काफिर पीड़ा सुरा के अस्तित्व खोई दालान में ll


मीमांसा फिर पहरेदारी थी मदिरा की अनकही प्रतिक्रिया समीक्षा राज में l

जीना फिर से सीखा गयी इसकी तवायफ कोठी अपने आँचल अंदाज़ में ll

Thursday, May 7, 2026

आलिंगन

तू ही मेरी वो पाठशाला जिस नदी का मैं ठहरा हुआ किनारा l

संभली नहीं किताब वो कभी अक्स तेरा जिसमें लगे पुराना ll


पेंसिल से नाम मेरा लिख मिटाना दूरियाँ चाँद फासलों समझाना l

लिखावट सी बन गयी वो मेरी साँसों रूह ज़िल्द कागज पन्नों की ll


बेमिसाल नादानियाँ तेरी गिली रेत बनाते महल चित्र आकारों की l

अमिट छाप मोहर बन गयी इस शागिर्द के बचपन मुलाक़ातों की ll


तू ही मेरा आसमाँ तू ही चाँदनी इस बंजर पहेली आरज़ू की l

अनछुआ स्पर्श भीगते बारिश तेरी बनाई कागज कश्ती की ll


रेखा लकीरें छांव सी यादें मुलाकातें तेरे सूखे गुलाब खुशबु की l

मधुशाला कस्तुरी बन गयी वो मेरी आलिंगन अलबेले साँझ की ll

Saturday, April 18, 2026

पारिजात

अक्सर आधी चाँदनी रातों को बाहें फैला आसमाँ से बातें करता हूँ l

कहानी उसके गजरे खुशबु की पारिजात को सुनाया करता हूँ ll


ललाट पर बिंदी की वो मोहर गालों की रुखसार बताया करता हूँ l

बालियों की धड़कनों से उसकी लहराती केश लट्टे उलझाया करता हूँ ll


नमी उसके आँखों की अपने काजल से पलकों बंद कर लेता हूँ l

डोरी उसके दिल पतंगों की दूसरी मांझे पेंचो से बचाया करता हूँ ll


तारूफ सुन उस चाँद की पता पूछने लगा आसमाँ चाँद भी l

कहा ठहर कोरी कल्पना नहीं घूंघट हटा दिख जायेगा पास अभी Il


तूने इत्र सा महकाया आँचल छोर बना राधा प्रेयसी रूप जिसका l

ये चाँदनी सहेली पता ना पूछ उस पागल चितचोर दिल तरन्नुम का ll