Tuesday, November 1, 2022

मौन

मौन ही वह सबसे सुंदर अहसास था l

पल जो उसके लबों से होकर गुजरा था ll


उफनता सागर भी वो ठहर गया था l

खुशबु को इसकी जब मैंने छुआ था ll


स्पर्श हृदय मन ने किया था जिस मौन को l

अल्फाज़ आहटें बिखर गयी थी उस पल को ll


मौन वाणी पल्लवित सुगंध महका अंबर को l

आतुर कर गयी थीं छुने उन उड़ते परिंदों को l


समेटा इन मौन अक्षरों को सदियों बाद फिर l

प्रेम कपोल प्रस्फुटित हो गया एक बार फिर ll


धूप छाँव सी दस्तक देती  किंवदंतियों इन मौनौ की l

शब्द सार नक्काशी तराशती फिर उन्हीं अहसासों की ll


अधूरी रह गयी थी चेतना जिन अल्फाजों की l

मौन उसकी लिख गयी नयी इबादत जज़्बातों की ll


मौन उसकी लिख गयी नयी इबादत जज़्बातों की ll

मौन उसकी लिख गयी नयी इबादत जज़्बातों की ll

Monday, October 24, 2022

दीपावली

दीपावली दीपोत्सव सारांश संक्षेप में l

आहुति आभा से रोशन तम का मंडल ll


भोग चौदह वर्षों का कठिन वनवास l

काल मृत्युंजय रावण का कर संहार ll


सुन रघुवर अपनों की आराधना पुकार l

अवतारी चले आये थामे माता का हाथ ll


प्रीत किरण पुंज से चमकते धूमकेतु से l

शिरोधार्य इस मंगल बेला जन कल्याण ll


पिरो लडिया सुन्दर जगमग करते दीपों सी l

उत्सर्ग कर रहा संसार वैमनस्य अंधेरों की ll

Monday, October 10, 2022

वैतरणी

टाँक दिया रूह को उस पीपल की शाखों पर l

दर्द कभी रिस्ता था जिसकी कोमल डालों से ll


सावन में भी पतझड़ बातों से मुरझा गया पीपल l 

सूना हो गया चौराहा उजड़ गया पीपल राहों से ll


फिर भी समझा ना सका दिल वैतरणी को l

गुलाब वो बना था किसी और के आँगन को ll 


गवाह थी दरिया किनारे बरगद की वो लटें l

गुजरी थी कई शामें जिसके हिंडोले मोजों में ll


बदले बदले रूप वो चाँद नजर क्यूँ आ जाता हैं l  

पुराने खतों नूर उसका ही नजर क्यूँ आ जाता हैं ll


संग इसके बीते थे जो कभी हसीन अतरंगी पल l

टिसन देते आज भी याद आते जब कभी वो पल ll

Thursday, October 6, 2022

आकृति

आकृति मेरी प्रतिलिपि की जी रही किसी और के साये सी l

मगर खुदगर्ज़ी सी वो पहेली मानो नचा रही इसे तांडव सी ll


धोखा था उसकी उस साँझ का ख्वाब महका था जिसके छांव तले l

गुलजार पनघट सा वो नज़र आता था जिस महताब की डगर तले ll 


अक्सर उस जगह जहाँ मैं भूल आता था पता अपना ही l

फ़िज़ाओं की उन लिफाफों के करवटों सलवटों साये तले ll


कभी रूबरू खुद को करा ना पाया उनके अंतरंगी पलों से l

आधे अधूरे खत के उन लिफाफों के बिखरते सप्तरंगी रंगों से ll


कुछ कदम का फासला था प्रतिबिंब की उस परछाई से l

दबी थी रूह मेरी आकृति की जिस साये की परछाईं से ll

Thursday, September 22, 2022

दिलचस्प

दर्द कुछ सहमी फ़िज़ाओं की आगोश में था l

कुछ कुछ तेरी पनाहों की सरगोशियों में था ll


आफताब उस सहर का भी खोया खोया था l

निगाहों में तेरी जिस तस्वीर का घर टूटा था ll


ख़्यालातों मंजर अश्कों का दरिया सैलाब बन जो गुजरा था l

मुख़्तलिफ़ फिर भी हुई नहीं बंदिशें रंजिशें इनकी राहों से तेरी ll


एक सौदा सा था मेरी रूहानियत और तन्हाइयों के बीच l

निकाह तेरी निगहबानी का मुक़र्रर हुआ था जिस दिन ll


दिलचस्प थी इस रूमानियत जुदाई आलम की वो हर घड़ी l

किश्तों में सिमटी किस्सों में उलझी थी इसकी वो मासूम कड़ी ll


दफन थी यादें सारी कही जैसे मय्यत कफन लिबास में खोई खोई l

शरीक ना हुई वो इनायतें भी इसके जनाजे अंजुमन सफर साथ भी ll