Sunday, January 8, 2023

गुस्ताखियाँ

बेईमान लम्हों की हसीन नादान गुस्ताखियाँ l

कर गयी ऐसी मीठी मीठी दखलअन्दाज़िया ll


शरमा तितली सी वो कमसिन सी पंखुड़ियां l

रंग गयी गुलमोहर उस चाँद की परछाइयाँ ll


सुनहरी ढलती साँझ की मधुर लालिमा जिसकी l

संदेशा गुनगुना जाती यादों सिमटती रातों का ll


अक्सर दस्तक देती चिलमन की वो शोखियाँ l

जुड़ी थी जिससे कुछ अनजाने पलों की दोस्तियाँ ll


मेहरबाँ थी अजनबी राहें भटकती मृगतृष्णा बोलियाँ l

बन्ध गयी थी जिनसे इस अनछुए अकेलेपन की डोरियाँ ll


स्पंदन एक मखमली सा था इनकी फ़िज़ाओं हवाओं में l

इत्र सा महका जाती आल्हादित मन अपनी गुस्ताखियों से ll

Monday, December 5, 2022

संगिनी

कोहिनूर सी दिलकशी थी जिसकी बातों में l

महजबीं कायनात थी वो इन अल्फाजों की ll


वसीयत बन गयी थी वो इस नादान रूह की l

संभाली थी जिसे किसी महफ़ूज़ विरासत सी ll


हँसी लिये वो मुकाम उस लालिमा रुखसार का l

संदेशा गीत सुनाती मेघों पंखुड़ियां शबाब का ll


परखी जिन पारखी निगाहों ने इस नायाब को l

मृगतृष्णा मुराद बन गयी उस जीने की राह को ll


इस धूप की साँझ छाँव बनी थी जो कभी l

बूँद उस ओस की संगिनी सी गुलजार थी ll


हीना सी महका जाती यह अटारी फिर उस गली l

याद आ जाती वो मासूम अठखेलियाँ जब कभी ll

Tuesday, November 1, 2022

मौन

मौन ही वह सबसे सुंदर अहसास था l

पल जो उसके लबों से होकर गुजरा था ll


उफनता सागर भी वो ठहर गया था l

खुशबु को इसकी जब मैंने छुआ था ll


स्पर्श हृदय मन ने किया था जिस मौन को l

अल्फाज़ आहटें बिखर गयी थी उस पल को ll


मौन वाणी पल्लवित सुगंध महका अंबर को l

आतुर कर गयी थीं छुने उन उड़ते परिंदों को l


समेटा इन मौन अक्षरों को सदियों बाद फिर l

प्रेम कपोल प्रस्फुटित हो गया एक बार फिर ll


धूप छाँव सी दस्तक देती  किंवदंतियों इन मौनौ की l

शब्द सार नक्काशी तराशती फिर उन्हीं अहसासों की ll


अधूरी रह गयी थी चेतना जिन अल्फाजों की l

मौन उसकी लिख गयी नयी इबादत जज़्बातों की ll


मौन उसकी लिख गयी नयी इबादत जज़्बातों की ll

मौन उसकी लिख गयी नयी इबादत जज़्बातों की ll

Monday, October 24, 2022

दीपावली

दीपावली दीपोत्सव सारांश संक्षेप में l

आहुति आभा से रोशन तम का मंडल ll


भोग चौदह वर्षों का कठिन वनवास l

काल मृत्युंजय रावण का कर संहार ll


सुन रघुवर अपनों की आराधना पुकार l

अवतारी चले आये थामे माता का हाथ ll


प्रीत किरण पुंज से चमकते धूमकेतु से l

शिरोधार्य इस मंगल बेला जन कल्याण ll


पिरो लडिया सुन्दर जगमग करते दीपों सी l

उत्सर्ग कर रहा संसार वैमनस्य अंधेरों की ll

Monday, October 10, 2022

वैतरणी

टाँक दिया रूह को उस पीपल की शाखों पर l

दर्द कभी रिस्ता था जिसकी कोमल डालों से ll


सावन में भी पतझड़ बातों से मुरझा गया पीपल l 

सूना हो गया चौराहा उजड़ गया पीपल राहों से ll


फिर भी समझा ना सका दिल वैतरणी को l

गुलाब वो बना था किसी और के आँगन को ll 


गवाह थी दरिया किनारे बरगद की वो लटें l

गुजरी थी कई शामें जिसके हिंडोले मोजों में ll


बदले बदले रूप वो चाँद नजर क्यूँ आ जाता हैं l  

पुराने खतों नूर उसका ही नजर क्यूँ आ जाता हैं ll


संग इसके बीते थे जो कभी हसीन अतरंगी पल l

टिसन देते आज भी याद आते जब कभी वो पल ll