Saturday, July 6, 2024

स्वच्छंद पहेली

साये ने मेरे प्रतिलिपि लिखी थी एक गुमनामी शाम की l

गुलमोहर छाँव परछाई सहमी थी उस किनारे घाट की ll


कशिश सरोबार सिंदूरी श्रृंगार मन वैजयंती ताल की l

सहज लहर पदचापें ठौर उस क्षितिज गुलाबी साँझ की ll


साँझी लेखनी साँसे कोई प्रत्युत्तर अंकित इस राज की   l

बहक उलझ गयी थी केशें उस हसीं चित्रण ख्वाब की ll


अंतरंगी डोर वैतरणी रूपरेखा उस खोई पहेली शाम की l

सतरंगी साजों धुन पिरो रही छलकती ओस बूँदों ख़ास की ll


मंथन उस काव्य धरा सजली थी प्रतिलिपि मेरे नाम की l

स्वच्छंद मुक्त हो गयी पिंजर बंद धड़कने मेरे उस चाँद की l

Saturday, June 22, 2024

सुरमई

अल्फाजों के मेरे छुआ लबों ने जब तेरे मिल गये सब धाम l

अंतस फासले सिरहाने पाकीजा अंकुश सिमट गये सब ध्यान ll


युग युगांतर साधना महकी जिस सुन्दर क्षितिज सागर समर समाय l

नव यौवन लावण्य अंकुरन उदय जैसे इनके रूहों बीच समाय ll


छुपी थी जो राज की जो बातें इसकी आसमाँ परछाईं के साथ l

आते आते दरमियाँ थरथराते पन्ने पलटने लगे पुरानी किताबों के पास ll


बिन शब्दों का स्पर्श असर मुरादों को बांध गया कच्चे धागों साथ l

पतंग माँझे सी साँझा हो गयी जैसे बहकती साँसों की दीवार ll


अर्थहीन पतझड़ सी सज बिकी थी जिन सूनी गलियों की आवाज l

सुरमय बन गये बोल इसके पा साहिल दरिया किनारे का आगाज ll

Monday, June 17, 2024

बेजुबान इश्क

चिलमन गुलजारों जिसके लिखी थी एक बेजुबान इश्क कहानी l

तसव्वुर में तस्वीर रूहानी उसकी रुखसार सी ऐसी महक आयी ll


अल्फाज़ नयनों के उसके इन ख़ामोशियों की ग़ज़ल बन आयी l

रूह बदल धड़कने उस नूर ए माहताब के गालों की तिल बन आयी ll


कोई कसर कमी ना थी इशारों के इन इश्क इकरार इजहार में l

पहेली उलझी थी हिरनी के लंबे गुँथे बालों के सुहाने किरदार में ll


कच्ची डोरी ऊँची आसमाँ बादलों उड़ती रंगीन पतंगबाजी की l

बिन स्याही बेतरतीब लकीरें लिखी जुबानी खोये लफ्ज़ किनारों की ll


खोल गयी पंख आतुर परिंदों के बंद विरासत एकान्त पिंजरों की l

सज-धज संवर गयी उड़ान इस बेजुबान धूमिल इश्क किनारे की ll

Sunday, May 26, 2024

आभास

इश्क हुआ था जब चाँद से मैंने कहा था रात से l

हौले हौले चलना ढलना नहीं आज रात के लिए ll


चाँदनी इसकी मेरे प्रीतम का आभास हैं l

अक़्स में इसके बिछड़न की एक आवाज हैं ll


फ़रियाद हैँ मुझ जैसे इश्क लुटे फ़कीर की l

थाम ले अंगड़ाई ले करवटें बदलती साँसों की ll


ठहरी झिझकी सहमी तारों सजी रात सुन दरखास्त l

ठग मुस्करा चुपके से दे गयी पूर्ण चाँद को अर्ध आकर ll


अनसुनी कर मेरे बाबले मन की इश्क आगाज l

ढ़ल छुपा ले गयी संग अपने चाँद तारों की बारात ll

Tuesday, May 14, 2024

ग्रहण

ख्याल जेहन आया रुबरु करा लूँ खुद से खुद को आज l

थरथरा उठे पांव महीन नोंक चुभन कंपकंपी के साथ ll


निरंतर पराजय से क्षत विक्षित वैचारिक वाद संवाद l

द्वंद समावेश लिये यह आक्रमक सैली रंजिश द्वार ll


विस्फोटक चक्रव्यूह आगे नतमस्तक चक्रवर्ती मंथन काल l

हर बारीकी में बारूदी कण कण मस्तिष्क शून्य ग्रसत समाय ll


अभिलाषा परम्परा आलेख स्वप्न दिग्भ्रमित ग्रहण छाया माय l

मरुधरा सी मिथ्या काया मन रुदन आवेग विचलित करती जाय ll


रेखांकित चित्रण अधूरे रूह बदलते जज़्बातों की l

फेहरिस्त लहू रिसते बोझिल नयन दर्पण अरमानों की ll


संजो पिरो ना पायी फिर से कड़ियां उन पायदानों की l

आतुर बेकरार खयालात खुद मुझे खुद से मिलाने की ll