Monday, June 17, 2024

बेजुबान इश्क

चिलमन गुलजारों जिसके लिखी थी एक बेजुबान इश्क कहानी l

तसव्वुर में तस्वीर रूहानी उसकी रुखसार सी ऐसी महक आयी ll


अल्फाज़ नयनों के उसके इन ख़ामोशियों की ग़ज़ल बन आयी l

रूह बदल धड़कने उस नूर ए माहताब के गालों की तिल बन आयी ll


कोई कसर कमी ना थी इशारों के इन इश्क इकरार इजहार में l

पहेली उलझी थी हिरनी के लंबे गुँथे बालों के सुहाने किरदार में ll


कच्ची डोरी ऊँची आसमाँ बादलों उड़ती रंगीन पतंगबाजी की l

बिन स्याही बेतरतीब लकीरें लिखी जुबानी खोये लफ्ज़ किनारों की ll


खोल गयी पंख आतुर परिंदों के बंद विरासत एकान्त पिंजरों की l

सज-धज संवर गयी उड़ान इस बेजुबान धूमिल इश्क किनारे की ll

Sunday, May 26, 2024

आभास

इश्क हुआ था जब चाँद से मैंने कहा था रात से l

हौले हौले चलना ढलना नहीं आज रात के लिए ll


चाँदनी इसकी मेरे प्रीतम का आभास हैं l

अक़्स में इसके बिछड़न की एक आवाज हैं ll


फ़रियाद हैँ मुझ जैसे इश्क लुटे फ़कीर की l

थाम ले अंगड़ाई ले करवटें बदलती साँसों की ll


ठहरी झिझकी सहमी तारों सजी रात सुन दरखास्त l

ठग मुस्करा चुपके से दे गयी पूर्ण चाँद को अर्ध आकर ll


अनसुनी कर मेरे बाबले मन की इश्क आगाज l

ढ़ल छुपा ले गयी संग अपने चाँद तारों की बारात ll

Tuesday, May 14, 2024

ग्रहण

ख्याल जेहन आया रुबरु करा लूँ खुद से खुद को आज l

थरथरा उठे पांव महीन नोंक चुभन कंपकंपी के साथ ll


निरंतर पराजय से क्षत विक्षित वैचारिक वाद संवाद l

द्वंद समावेश लिये यह आक्रमक सैली रंजिश द्वार ll


विस्फोटक चक्रव्यूह आगे नतमस्तक चक्रवर्ती मंथन काल l

हर बारीकी में बारूदी कण कण मस्तिष्क शून्य ग्रसत समाय ll


अभिलाषा परम्परा आलेख स्वप्न दिग्भ्रमित ग्रहण छाया माय l

मरुधरा सी मिथ्या काया मन रुदन आवेग विचलित करती जाय ll


रेखांकित चित्रण अधूरे रूह बदलते जज़्बातों की l

फेहरिस्त लहू रिसते बोझिल नयन दर्पण अरमानों की ll


संजो पिरो ना पायी फिर से कड़ियां उन पायदानों की l

आतुर बेकरार खयालात खुद मुझे खुद से मिलाने की ll

Saturday, May 4, 2024

रूहानी साँझ

पैगाम जो आहिस्ते दस्तक दे रहे थे रूहानी साँझ को l

करार कही एक छू रहा था इसके सुर्ख लबों साथ को ll


संगीत स्वर फ़रियाद आतुर जिस तरंग ढ़ल जाने को l

वो मौन दिलकशी डूबी होठों तन्हा सागर बीच आकर ll


आरज़ूयें बेकरार थी जिस अधूरी ग़ज़ल साज की तरह l

दिलजलों को ख्वाब वो लिखती गयी मनचलों की तरह ll


दास्ताँ बयां ना होती इस अल्हड़ दर्द के मासूमियत की l

जुबाँ अधूरे किश्तों पैबंद सजी कहानी सुना ना रही होती ll


मासूम नादानी मौसीक़ी रंगा चाँद कहर ढा गया इस बाती पर l

इनायतों सिमटी बदरी में किसी दिलचस्प आयतों की तरह ll




Sunday, April 7, 2024

अंजुमन

इस अंजुमन ताबीर की थी जिन ख्यालों की l

अक्सर उन बैरंग खतों ढ़ल जाती वस्ल रातों की ll


मुख़्तसर थी इनायतें इनके जिन ख्वाबों की l

रूबरू तस्वीर एक हुई थी उन फसानों की ll


साँझ की तस्दीक बैठे रहते इसी के अंजुमन में l

मुलाकातें कभी यही उस महताब से तो होगी ll


जुनून था जिस रूमानियत रूह आरज़ू का l

बारिश नीर सुगंध रंग उसकी ही महकाती थी ll


कह उस बेनज़ीर को हबीबी पुकारी थी जब यादें ll

बंजारे चिलमन की रफीक बन गयी थी साँसे l


मिलाप था यह एक अनजानी सहर आलाप का l

सिलसिला आगाज था हमसफर अह्सास का ll