Thursday, September 22, 2022

दिलचस्प

दर्द कुछ सहमी फ़िज़ाओं की आगोश में था l

कुछ कुछ तेरी पनाहों की सरगोशियों में था ll


आफताब उस सहर का भी खोया खोया था l

निगाहों में तेरी जिस तस्वीर का घर टूटा था ll


ख़्यालातों मंजर अश्कों का दरिया सैलाब बन जो गुजरा था l

मुख़्तलिफ़ फिर भी हुई नहीं बंदिशें रंजिशें इनकी राहों से तेरी ll


एक सौदा सा था मेरी रूहानियत और तन्हाइयों के बीच l

निकाह तेरी निगहबानी का मुक़र्रर हुआ था जिस दिन ll


दिलचस्प थी इस रूमानियत जुदाई आलम की वो हर घड़ी l

किश्तों में सिमटी किस्सों में उलझी थी इसकी वो मासूम कड़ी ll


दफन थी यादें सारी कही जैसे मय्यत कफन लिबास में खोई खोई l

शरीक ना हुई वो इनायतें भी इसके जनाजे अंजुमन सफर साथ भी ll

Saturday, September 17, 2022

मिथ्या

कुछ अनकही बातों दरिया का जिक्र फिर कभी हो ना पाया l

मौन मकबरे सा कभी खुद से भी यह गुफ़्तगू कर ना पाया ll


तारतम्य पिरो ना पाया अपनी मोजों और किनारों में l

सामंजस्य अधूरा रह गया था इसके बहते संवादों में ll


आवारा साँझ सी बहती इन मझधार लहरों तरंगों पर l

अस्त होती लालिमा नाच रही जैसे व्यथित सी होकर ll


आवाज दूँ कैसे आलिंगन करूँ कैसे उस मौन को l

अहसास जिसका जुदा हो ना पाया इस वज़ूद से ll


आहिस्ते आहिस्ते टूटती इन बेज़ान दरख्तों में l

एक कंपकंपी सी थी उन मौन स्तब्ध पलों में ll


मिथ्या थी वो अनजानी सी आधी अधूरी मेरी मुलाकातें l

कह के भी कह ना पायी जो अपने मौन जज्बातों की बातें ll


दस्तक देता रह गया इसकी भूली सरहद आवाजों को l

खोई हुई जैसे किसी मौन शून्य में पसरी आहटों को ll

Thursday, September 8, 2022

गुस्ताखी

एक उम्र दहलीज का फासला था मेरी इश्क गुस्ताखी में l

जब कभी आईना पूछता हौले से परदा कर लेता उससे ll


वो सफ़ेदी तलाशती फिरती मेरे रुखे बिखरे बालों में l

भूला दुनिया सुकून से मैं सो जाता उसकी बाहों में ll


तबस्सुम उसकी ढ़क जाती झुर्रियां मेरे उम्र चेहरे की l

मोहलत मिल जाती जैसे साँसों को और धड़कने की ll


उस हिजाब वाली अंतरंगी के हम तो थे ऐसे मासूम कायल l

खुदग़र्ज़ी थी खिताबों से रंगे थे फिर भी खिजाबों में आकर l


दुआएँ आखरी फिजां इश्क के उन ताउम्र फासलों की l

मय्यत जनाजे भी सहारा मिले उसके ही कांधों का आकर ll

Tuesday, August 2, 2022

निःशब्द

कहाँ से चला था कौन सी डगर का मुकाम था वो l

राहों की अधीर पगडण्डियाँ का सैलाब सा था जो ll


टूटे खंडहरों का आशियाँ था शायद जैसे कोई l

बिखरे ख्वाबों की लूटी अस्मत थी जैसे कोई ll


झंझोर था एक रुकी हुई दबी सी हल्की आहट का कहीं l

दस्तक दे रही जो निःशब्द अहसासों को कभी कभी ll


व्याकुल पपहिया छुपे पैगाम भेज रहा था जैसे कोई l

शब्द फिर भी पास ना थे उन सूखे हुए लबों के कहीं ll


बैचैन सावन की पुरवाई का रुख जुदा था खुद से कहीं कहीं l

रौनक ऐ महफिल का चाँद तन्हा खोया हुआ था और कहीं ll


इतनी भर साँसे अब तलक भी जो थी जिंदा बची खुची l

एक संदेशे इंतजार में धड़का जाती थी यह दिल कभी कभी ll

Friday, July 1, 2022

साँझा दर्द

छिपाने अश्कों याराना बारिशों से मैंने कर ली l
मेघों की बिखरती बूँदों से दर्द भी साँझा कर ली ll


शिकवा रहे ना खुद से किसी बेरुखी का l
काले बादलों में हबीबी की नूर तराश ली ll


हौले से अधूरे ख्वाब बेच जाती नींद पलकों में l
कोलाहल सागर मल्हारों यही थी जो छुपा लाती ll


रुखसत होने इस अश्रु व्यंग परिहास ज़ख्मों से l
बूँदों की फुसफुसाहट ताबीर इसकी बना डाली ll


फिदा बारिशों के इस संगम मनुहार पर l
धारा अश्कों मेहरान घटायें सिमट आती ll