Sunday, May 9, 2021

हमकदम

एक फ़िक्र उसकी ही थी ज़माने में l
ख़ैरियत बदली नहीं कभी फ़साने में ll

दुआओं के अम्बर में फ़रियाद थी साँसों की l
मंत्र मुग्ध सुध बुध खो जाती राहों में उनकी ll 

कमसिन सा था यह सानिध्य अगर l
लटों में उलझा हिज़ाब था उस नज़र ll

राज छुपाये पुकार थी अंतर्मन की कोई l 
हर नज्म हसीन बने उनके साये जैसी ll

साथ कदम दो कदम उनके चलते कैसे l
मेहर में चाँद को नज़राना चाँद का देते कैसे ll 

सिफ़ारिश की थी सितारों से हमने उस घड़ी l
महफ़िल सजा रखी थी घटाओं ने उस घड़ी ll
 
ओझल था चाँद जाने कौन से झुरमुट बीच l
छोड़ गया यादें बस उन फरियादों के बीच ll

स्पर्श उनकी अनकही मीठी मीठी बातों का l 
छू जाती दिल के तारों को हमकदम जैसे कोई ll

Saturday, May 1, 2021

बेचैन पलकें

बेचैन रहती थी पलकें इस कदर l
अश्कों का कोई मोल नहीं था इस शहर ll

पर कटे परिंदों सा था ये हमसफ़र l
झुकी नज़रें बयाँ कर रही तन्हा यह सफ़र ll

मेहरम नहीं इनायत नहीं सुबह हो या रात भर l
फासला गहरा इतना दो पहर सागर के दो तरफ़ ll

आरज़ू मिली भटकती राह एक शाम इस शहर l
लिपट गयी सहम गयी ख़ुद से सहमी सहमी डगर ll

पगडंडियाँ से पटी थी बाजार की नहर l
निर्जन खड़ी थी जिजीविषा की लहर ll 

आहट एक समाई थी अंदर ही अंदर l
साये संग रूह की ना थी कोई खबर ll

रेखा हथेलियाँ बदलूँ एक रोज नए शहर l
फ़िलहाल ख़ामोश रहूँ कह रही पलकें संभल संभल ll 

 बेचैन रहती थी पलकें इस कदर l
अश्कों का कोई मोल नहीं था इस शहर ll

Friday, April 2, 2021

पनघट

देख चाँद की हिरणी सी मतवाली चाल l
शरमा पनघट करली घूँघट आट ll

आँख मिचौली नज़र नायाब l
बादलों की ओट छिप रहा महताब ll 

बिंदिया सा सज रहा पनघट के ललाट l
प्रतिबिम्ब निखर रहा दरिया के गाल ll

उड़ रहा घूँघट आँचल दामन थाम l
बरस रही बदरी भींग रहा आफताब साथ ll 

झुक गयी पलकें लज्जा गया पनघट ताज l
आसमां से धरती उतर आया दिल का चाँद ll

दरिया के उस छोर चाँद और पनघट साथ l
रास की रात सितारों संग चला आया चाँद ll

देख चाँद की हिरणी सी मतवाली चाल l
शरमा पनघट करली घूँघट आट ll

Saturday, March 13, 2021

पैबंद

ज़ख्मों के पैबंद सिलने भटकता रहा मैं l
अश्कों की कभी इस गली कभी उस गली ll 

डोर वो तलाशता रहा ढक दे जो पैबंद की रूही l 
दिखे ना दिल के जख़्म छुपी रहे सिलन की डोरी ll

ख़ामोशी लिए लहू रिस रहा तन के अंदर ही अंदर l
बुझा दे प्यास पानी इतना ना था समंदर के अंदर ll

मरुधर तपिश सी जल रही तन की काया l
बरगद से भी कोशों दूर थी चिलमन की माया ll

दृष्टिहीन बन गूँथ रहा ख्यालों की माला l
मर्ज़ निज़ात मिले भटकते रूह को साया ll

टूट गया तिल्सिम ताबीज़ के उस नूर का भी l 
बिन आँसू रो उठी पलकों पे जब तांडव छाया ll

लुप्त था धैर्य विश्वास ना था अब गतिमान l
डूब गया प्रहर डस गया इसको तम का आधार ll

सी लूँ पैबंद किसी तरह दिल के बस एक बार l 
छोड़ जाऊ तन का साया इसका फिर क्या काम ll   

Sunday, March 7, 2021

संस्कार

धरोहर जो मिली विरासत में l
मेरुदंड सँवार लूँ संस्कारों में ll

गुंजयमान रहे पल प्रतिपल l 
प्रतिध्वनि चेतना संस्कारों की ll

ज़िक्र चलता रहे सदियों तलक l
संस्कृति उद्धभव से उथानों की ll

परिधि कोई इसे बाँध ना पाए l
प्रतिलिपि इसके पायदानों की ll 

सहेजू दास्तानें उस सुन्दर लेखनी की l 
टूट गयी ज़ंजीरें ग़ुलामी अविव्यक्ति की ll

विद्धेष अग्नि ज्वाला आतुर हो ना कभी l
विपरीत दिशा बहे प्रतिशोध कामना इसकी ll

लौ मशाल तमस चीरती रहे अज्ञानी की l
उम्मीद सृष्टि बँधी रहे अनुकूल किरणों की ll 

परिवेश सुगम सरल हो प्रावधानों की l
बहती रहे गंगा सुन्दर संस्कारों की ll