Sunday, December 5, 2021

मुकाम

सफर के हर पड़ाव कदम मुकाम बदलते गये l
निशाँ अपनी फितरतों के हर और छोड़ते गये ll

इतने लग गये इसके दामन के दरमियाँ  बदरंगें से दाग l
मैला हो आँचल तार तार हो गये इसके पहलू एक साथ ll

नादानीयॉ उस रुखसार की शिकस्त ऐसी दे गयी l
अधूरे मशवरे की खींचतान में आबरू फिसल गयी ll

अवरुद्ध संकरी गलीया भटक गयी थी सफर की डोर l
चाँद वो नजर आया नहीं छुपा था जो बादलों की ओट ll

धुन्ध में लिपटी थी फलक तलक इसकी जो बारिशें l
धुँआ धुआँ हो बिखर गयी थी गुल की सारी नवाजिशें ll

फेहरिस्त लंबी थी इस सफर के उन गुलजारों की l
भटकते कदमों के घायल गुलजार अरमानों की ll

पग पग स्वाँग रचा रखा था राहों ने हर उस मोड़ पर l
भ्रमित हो मुकाम बदल लिया क़दमों ने जिस ढोर पर ll

ना मिटने वाले क़दमों के निशाँ छूटते गए हर तरफ l
मुकाम बस एक मय्सर ना हुआ सफर के इस सफर ll

Friday, December 3, 2021

गुनाह

ज़िक्र सिर्फ और सिर्फ तेरा ही आया बार बार I
मेरे हर गुनाह में तेरा ही नाम आया हर बार II

तितलियाँ जो उड़ाई थी तूने रंगीन फ़सनों की I
आगाज़ वो कभी बनी नहीं इनके अरमानों की II

पँख खोल परवाज़ भर उड़ जाने बेताब इन परिंदों को I
आसमाँ वो मिला नहीं कबूल करले जो इन परवानों को I 

ना जाने कैसे बिन पते का बंद तेरा वो खत I
मोहर सा लिफाफे से चिपका गया मेरा मन II

तेरी पर्दानशीं आँखों के उस सम्मोहन भरे जादू से I
अछूता रह ना पाया गुनाह अंजाम अदा करने से II

खामोशीयों पे मेरी पहरे लगे थे तेरी यादों के सभी I
तेरे फैसले में रजा मेरी भी थी तेरे लिए ही शामिल II

परत दर परत ताबीर गुनाह की ज्यों ज्यों खुलती गयी I
इस गुनाह रिश्ते की चर्चा सरेआम होती चली गयी II

Saturday, November 20, 2021

शिद्धत

शिद्धत से तलाशता फिरा जिस सकून को l
मुद्दतों बाद थपकी दे सुला गया जो मुझको ll 

सनक थी इसके दुलार के उस मीठी खनकार की l
नींदों के आगोश में लोरी सुना सुला गयी जो मुझको ll

अस्तित्व ख्वाबों की उन बिछडी खोई नींदो का l
वज़ूद ढूंढ रही अपना पलकों में ढलती रातों का ll

दस्तक थी उन उनींदी उनींदी दरख़ास्तों की l
दस्तखत दे गयी पलकों पे जो अपने नामों की ll

मुनासिब थी वर्षों से जगी इन पलकों की भी रजामंदी l
झपकी इसकी पल में दे गयी जीवन भर की मस्ती ll

लयवद्ध हो गया मेरा सम्पूर्ण सपनों का शहर l
पहलू में नीँदों की आ मिला जो मुझसे बिछड़ा पहर ll

मग्न हो गयी पलकों बीच आँखे इस कदर l
बेखबर बेसुध हो सो गयी सपनों की डगर ll  

Friday, November 12, 2021

ढलती छावं

खड़ी थी वो लिए उन सुहानी यादों को उस मोड़ पर l
एक ताज महल मैं भी गूँथ लूँ लम्हों के जिस मोड़ पर ll

नये रंग में फिर से लिखूँ हर्फ की यह नयी ग़ज़ल l
की महताब भी मेहरम हो आये इसकी हर नजर ll

सदियों से छुपा रखे उन राज़दार सूखे गुलदस्तों से भी l
हर अंदाज़ में महके अल्फ़ाज़ ताजे हसीन फूलों सी ll

कच्चे धागे से बँधी इस प्रीत की बंधन डोर को l
ताबीज़ बना पहन लूँ इन मन्नत धागों डोर को ll

मोहलत थोड़ी सी ख़रीद लूँ उस आसमाँ खास से l
अर्से बाद बेताब हो रहे अश्रु धारा नयनों साथ में ll

उकेर लूँ इस चहरे को पूरी तरह मेरे आँगन द्वार में l
खो ना जाय फिर कही साया यह ढलती छावं में ll

खो ना जाय फिर कही साया यह ढलती छावं में ll
खो ना जाय फिर कही साया यह ढलती छावं में ll

Tuesday, November 9, 2021

अंतर्ध्वनि

निकला बेचने रूह को जिस्म के जिस बाजार l
बिन सौदागर मौल हुआ नहीं उस सरे  बाजार ll 

अंतर्द्वंद विपासना जलाती रही चिता कई एक साथ l
पर हर कतरे में पाषाण सी थी इस रूह की रुई राख ll

मंडी तराजू के उसके बदलते मंजर के आगे l
भाव शून्य सी कोने में थी काया खड़ी सकुचाय ll

दीवार थी शीशे की पूरी गर्त से ढकी हुई l 
अंधकार की छाया थी दूजी और खड़ी ll

पैबंद में लिपटी रूह की यह स्याह घडी l
बाट जो रही यह बिकने नजरों की गली ll 

विच्छेद दास्तानों भँवर में भटकी अटकी रातों की l
फेहरिस्त दीवानों की इसकी जुदा औरों से थी ll

आज इस महफ़िल में तन्हा थी रूह अकेली l
कद्रदान कोई आया नहीं जीने इसे इस कोठी ll 

जिस्म की मंडी में नीलाम हो ना पायी l
इस रूह की बिलखती यह अंतर्ध्वनि ll