Monday, December 5, 2022

संगिनी

कोहिनूर सी दिलकशी थी जिसकी बातों में l

महजबीं कायनात थी वो इन अल्फाजों की ll


वसीयत बन गयी थी वो इस नादान रूह की l

संभाली थी जिसे किसी महफ़ूज़ विरासत सी ll


हँसी लिये वो मुकाम उस लालिमा रुखसार का l

संदेशा गीत सुनाती मेघों पंखुड़ियां शबाब का ll


परखी जिन पारखी निगाहों ने इस नायाब को l

मृगतृष्णा मुराद बन गयी उस जीने की राह को ll


इस धूप की साँझ छाँव बनी थी जो कभी l

बूँद उस ओस की संगिनी सी गुलजार थी ll


हीना सी महका जाती यह अटारी फिर उस गली l

याद आ जाती वो मासूम अठखेलियाँ जब कभी ll