Wednesday, July 21, 2021

सकून

अजीब सा सकून था झोपड़े के उस खंडहर में l
बिछौने आँचल पसरा देती माँ रोता मैं जब डर के ll

सिरह जाता कौंधने बिजली कभी आधी रातों में l  
सीने से दुबका नींदों में सुला देते थे तब बाबा भी ll

एक अदद टूटी लालटेन ही रोशनी का सहारा थी l 
अँधियारे से लड़ती इसकी कमजोर लौ बेसहारा थी ll 

टपकती छत अँगीठी अक्सर बुझा जाती थी l
माँ फिर भी साँसे फूँक इसको सुलगा लाती थी ll 

मेरे लिए खाट जो बुनी थी बाबा ने अपनी धोती से l
थपकी की थाप लौरी की गूँज छाप दोनों थी उसमें ll

माँ की उस रसोई से भी दुलार ऐसा बरस आता था l 
सूखी रोटी नमक में भी मक्खन स्वाद का आता था ll   

मोहताज़ थी वो झोपड़ी खंडहर एक दरवाज़े के लिए l
फिर भी कोई कमी ना थी माँ बाबा के उस क्षत्रशाल में ll

महसूस हुई ना कभी कोई कमी इसकी धूप छाँव में l 
अजीब सा सकून था उस झोपड़े की दरों दीवार में ll 

मिल जाये वो ही सकून एक बार फिर से l 
रो दिया लिपट यादों की उस तस्वीर से ll 

Sunday, July 18, 2021

अनाम रिश्ते

कुछ रिश्ते अनाम अनजाने से होते हैं l
सिर्फ ख्यालों में सपने पिरोने आते हैं ll

दायरे इनके सिमटे सिमटे नज़र आते हैं l
नींदों में चिलमन इनके गुलज़ार हो आते हैं ll    

तसब्बुर में इनकी खाब्ब ऐसे घुल मिल जाते हैं l 
जन्नत के उन पल खुली पलकें ही सो जाते हैं ll

परछाइयाँ मेहरम इनकी इस कदर चले आते हैं l
धागे रिश्तें इनसे खुद ही खुद जुड़ते चले जाते हैं ll

खाब्ब कभी नींदों से जो खफा हो जाते हैं l
हलचल दिलजलों सी पीछे छोड़ जाते हैं ll

गुज़ारिश रही नींदो की ख़ब्बों के दरमियाँ l 
उम्र मुकमल होती नहीँ इन रिश्तोँ के बिना ll 

आरज़ू इनके साँसों की पलकों के खाब्बों की l
मियाद सजी रहे अनजाने रिश्तों खाब्बों की ll  

Saturday, July 3, 2021

खामोशियाँ

खामोशियाँ कह गयी लब कह ना पाए जो बात l
लफ्ज अल्फाज बिखर उठे पा कायनात को पास ll 

खत नयनों के छलक पढ़ने लगे कलमों के अंदाज़ l
गूँज उठी अजान साँझ की लिए कई सिंदूरी पैगाम ll

लज्जा रही पलकें सुर्ख हो रहे उसके गुलाबी गाल l
दूर क्षितिज पर भी चमक रहा उसका ही आफ़ताब ll 

तहरीर थी दिल अंजुमन में ताबीर जिसकी चाह l
जुस्तजू मयसर हो गयी रूह रूहानी आगोश समाय ll

लहजा तकरीरें दे गयी सौगात एक दूजे के नाम l 
परदे में भी बेपर्दा हो गए उनके नूरों के साज ll

सँभाला था जिस नफासत को नजाकत की तरह l
नज़राना मेहर हो गयी वो दिल रिवायतों की तरह ll

संजीदा थे इस पनघट की बोलियों के पैगाम l
निसार हो उठी शोखियाँ देख चाँदनी इठलाय ll

खामोशियाँ कह गयी लब कह ना पाए जो बात l
लफ्ज अल्फाज बिखर उठे पा कायनात को पास ll

Thursday, July 1, 2021

दर्पण जैसा

सोचा लम्हा एक चुरा लूँ उन हसीन खाब्बों के पल से l
फिसल गए वो हुनर ना आया मुट्ठी को इस पल में ll

वजूद मेरे किरदार का भी कुछ उस दर्पण जैसा l
अक्स निहार छोड़ गए जिसे हर कोई अकेला ll

पिंजरे बंद परिंदा हूँ उन सुनहरे अरमानों का l
पंख मिले नहीं जिसे कभी उन आसमानों का ll   

छू आँचल निकल गयी वो पवन वेग हठेली भी l
गुलशन फिजायें महकी थी कभी जिस गली भी ll

फासला सिमटा नहीं इन हथेली लकीरों का कभी l
अजनबी बन गया दामन खुद का खुद से तभी ll

सौदा रास ना आया अपनी खुदगर्जी से कभी l
बारीकें सीखी थी जिन की मर्ज़ी से ही कभी ll

बैठा हूँ उन टिमटिमाते जुगनुओं सी सर्द रातों में l
चाँद मेरा भी नज़र आयेगा कभी इस मुँडेर की दीवारों पे ll    

Saturday, June 26, 2021

क़िरदार

महफ़ूज थी कुछ यादें वक़्त के उस क़िरदार में l
गुजर गयी बिन बरसे ही आवारा बादल साथ में ll

सफ़र इतना ही था मेरा फ़िज़ाओं के गुलज़ार में l
पतझड़ का मौसम सजा था बहारों के बाग़ में ll

पर कतरे परिंदों सा बंद था ख्यालों के पिंजार में l
चहकी जिसकी बोलियाँ कभी बरगद की शाख में ll

निर्जन सी सपनों की कुटियाँ इस निर्धन के पास में l 
अश्रुओं का मंजर बहा ले गयी यह गुलिश्तां साथ में ll

खाली खाली नींदें सिर्फ़ खाली खाली सौदे पास में l
एकाकी के इस पल में यादें भी नहीं रही साथ में ll

मशरूफ थी जो शोखियाँ कभी गुलमोहर साथ में l
इस अंजुमन खल रही उनकी ही खलिस पास में ll

फरियाद थी महकती रहे यादों की हिना साथ में l
गुज़ारिश रास ना आयी उस काफ़िर को ख्यालात में ll

फ़लसफ़ा मजमून इतना सा ही था मेरे पास में l
यादें सदा हमसफ़र बनी रहे मेरे हर किरदार में ll   

Friday, June 25, 2021

कारीगरी

बड़े ही हुनरमंद थे उनकी कारीगरी के हाथ 
तराशते रहे काँच का दिल पथरों के साथ 

रंज ना हुआ उन हाथोँ को एक पल को भी 
नश्तर सी चुभती रही टूटे शीशे की धार 

दरिया रिस्ते लहू का था बड़ा ही बदनाम 
धड़कनों पे था मौन रहने का इल्जाम

लकीरें हथेलियाँ उकेरी नहीं उन खाब्बों ने 
साँसों का सौदा था जिस अज़नबी खाब्बों से 

थी वो एक बहती मझधार पहेली सी 
कश्ती बहा ले गयी वो दिले नादान की 

रास ना आयी उसे वफायें यार की 
दिल दगा दे गयी उस मेहताब की 

अस्तित्व बिख़र गया टूट काँच के आफ़ताब की 
वो तराशती रही पथरों से दिल चटक धार सी  

Wednesday, June 23, 2021

पैबंद

सुनके उनकी मीठी मीठी बातों को l
बैठ गया पिरोनें रिश्ते धागों को ll

कशीदें अदाकारी हुनर साजों से l
छुपा लूँ पैबंद उलझे धागों से ll

रफ़ू कर फ़िर सी लूँ उन रिश्तों को l
तार तार कर गयी वो जिन रिश्तों को ll 

चुभ रही एक कसक ज़िस्म कोने में l
छलनी हो रही अंगुलियाँ इन्हें सिने में ll 

सिते सिते पैबंद भूल गया पिरोने धागों से l
रिश्तों के धागे सुई की उस महीन कमान में ll

रिहाई ना थी टूटी रिश्तों जंजीरों बाँध से l
जकड़ रखी थी कुछ बंदिशों ने मनोभाव से ll 

रफ़ू हो हो वो बिखर गए पैबंद टाट में l
दुरस्त कर ना पाया इन्हें उलझे तार से ll 

Tuesday, June 15, 2021

सम्मोहन

गज़ब का सम्मोहन उसकी हर बातों में 
दिलकश मीठे मीठे रूमानी अंदाज़ों में 

लफ्जों अल्फाजों की वो सुन्दर जादूगरी 
जुगनू सी चमकती उसके होटों की हसी 

बिन जिसके अर्ध निशा भी गुम अँधेरी सी 
मादक इठलाती चाँदनी करवटें अधूरी सी 

साँझ बेला उसकी कोई तिल्सिम सुनहरी 
पहेली वो इस पल की सम्मोहन अनोखी 

रूहानियत की वो कोई ईबादत नई नई 
नयनों से सजाती कोई धुन नई नई सी 

गिरफ़्त हो चला मन बावरा उसकी हसीं 
घुल गया गुल उसके सम्मोहन की गली 

अंश बिखरा गयी इस डाल उसकी छवि 
कमसिन सी वो मासूम सम्मोहन छवि  

Friday, June 11, 2021

पनाह

फुर्सतों की उनकी भीनी भीनी पनाहगायें l
ठिकाना बन गयी मेरी मंजिलों की भोर ll

भटक रही जो आरजू उल्फतों में उलझी कहीं ओर l  
छू गयी उस राह पुँज को अदृश्य शमा की एक छोर ll 

अनबुझ पहेली थी उसके बिखरे बिखरे लट्टों की ढोर l
संदेशे खुली खुली जुल्फों के जैसे काली घटाएँ घनघोर ll

जुदा जुदा लकीरें हाथों की सलवटें माथे की l
निगाहें पनाह हो रही सुरमई करवटें रातों की ll   

उफन रहा मचल रहा सागर छूने किनारें की टोह l 
चुरा ले गया बहा ले गया तट को लहरों का शोर ll

कश्ती फिर भी सफ़र करती चली आयी तरंगों पे l
पनाह जो उसे मिल गयी उस चाँद की चकोर ll

फुर्सतों की उनकी भीनी भीनी पनाहगायें l
ठिकाना बन गयी मेरी मंजिलों की भोर ll

Saturday, June 5, 2021

तरुवर

तरुवर सा तरुण यह पागल सा मन आज l
टटोल रहा बारिश में खोये हुए पल आभास ll  

डोरे डाल रहे कजरे सँवरे सँवरे गगन आकाश l 
तन लिपट रही शबनमी बूँदे बरस बरस आज ll

खुली खुली लटों के उड़ते जुल्फें दामन आकार l
बादल उतर रहे रह रह आगोश में आकर आज ll

मृदुल तरंग लिख रही नयी बारिश शीतल लहर l
विभोर हो नाच रहे नयन मयूर तरुवर सी नज़र ll

चेतन सचेत बदरी हो रही फुहारों की होली आय l
डूब उतर रहा तन मन बारिशों की हमजोली साथ ll 

बहक गए मेघों के घुँघुरों के सारे सुर और ताल l
लगी समेटने अंजलि बूँदों के अक्स और ताल ll

तरुवर सा तरुण यह पागल सा मन आज l
टटोल रहा बारिश में खोये हुए पल आभास ll    

Friday, June 4, 2021

अतरंग

गूँथ डाली तेरे गुलाबों से महकते पैगाम ने l
जुल्फों में उलझे उलझे गजरे के प्याम ने ll

लावण्य यौवन करवटें बदलती रातों में l
घूँघट में ना हो नूर बहकते आफ़ताब के ll

मधुशाला बहती रहे नयनो के जाम से l
मदहोश रहे सपनों के हसीं संसार में ll

संगीत स्वर लहरी लिए दिल के अरमानों से l 
खनकती रहे चूड़ियाँ प्यार के इस व्यार में ll

डूबे इस कदर साँसों की सरगम ताल  में ऐसे l 
आलिंगन बना रहे धडकनों की मीठी साजिशों में ll

सप्तरंगी रंगो से सजी इस अतरंग कहानी  में l
घुलती रहे चासनी अरमानों की अंतर्मन नादानियों में ll 

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Thursday, June 3, 2021

यादों की अलमारी

पन्ने बंद कितबों के जो पलटे l
अलमारी खुल गयी यादों की ll

गाँठ खुलते ही पोटली की l
गठरी खनक गयी जोरों से ll

अब तलक जो कैद थी पिटारे में l
बिखर गईं मोतियों के साज सी ll

वो पुरानी मीठी मीठी बातें l
लुके छिपे सूखे फूलों के साये ll

चुराई थी खत से उसकी जो बातें l
छप गयी पन्नों में वो सब बातें ll

बिसर गयी थी जो किताब कल कहीं l
मिली क्यों वो जब थी एक दीवार खड़ी ll
  
पन्ने इसके कुछ नदारद थे l
अंजाम दूर खड़े मुस्करा रहे थे ll

जिल्द उतर गयी थी किताबों की l
अधूरी यादें बन गयी पहेली सी थी ll

किरदार एक मैं भी था इसका l
कहानी वो मेरी ही सुना रही थी ll

Wednesday, May 26, 2021

क़त्ल

दुरस्त गुजर रही थी जिंदगी अकेले में l
क़त्ल कर दिया हसीन खाब्बों के मेलों ने ll

गुनाह हो गया बेबाक़ी निगाहों से l
रिहा कैसे हो उन उम्र कैद बंदिशों से ll

चाँद नज़र आया एक शाम मेरे आँगन में l
चल पड़ा वो भी दिल कारवें संग राहों में ll

मुक़ाम वो आ गया चौराहा ओर करीब आ गया l 
सिर्फ अर्ध चाँद का साया रह गया इस मंज़िल पास ll

आहटों से रसिक इस कदर रहा बेख़बर l
आसमां डूबा ले गया चाँद घटाओं के पास ll

बिसर गया पथिक निकला था किस सफर l
कर बैठे गुनाह उसके मासूम से हमकदम ll  

क़त्ल हो गया अरमानों के तसब्बुर का l
गुनहगार बन गया टूटे दिल ख्यालों का ll  

Saturday, May 15, 2021

अंकुरन

बिन दर्द जीवन का क्या मोल l
गुलाब भी खिलता काँटों के छोर ll

पीड़ ना पहचानी जिस रूह ने l
कुदरत ने रची नहीं ऐसी कपोल ll
 
कुछ और नहीं कवायद यह धड़कनो की l
फासला ना हो साँसों और रूह के करीब ll

मुनासिब हैं आहट कदमों की बनी रहे l
सामंजस्य बना रहे उम्र और तन के बीच ll

बँधी रहे साँसों से साँसों की डोर l
कमज़ोर ना हो आस की डोर ll

टूट गए जो डाली से तो क्यों रोय l
सजा दो गुलदस्ते में नए जीवन की भोर ll

बगियाँ के गुलसिताँ सजी महकती रहे l
अंकुरित कुदरत के प्राणों के बीज़ ll   

Wednesday, May 12, 2021

रुबाब

स्पर्श था उनकी मीठी मीठी यादों का l
मन्नत की कलाई से बंधे धागों का ll

फ़ितरत धुन थी ही उनकी इतनी नायाब l 
शुमार कर लेती हर पैगाम अपने नाम ll 

सागर मचल रहा था आतुर उस किनारें को l 
ठहर गया था वक़्त आतुर उस साये को ll 

मग्न थी वो तारों के शहर अपने सफ़र में l
ख़बर ना थी मुझको भी अपनी उस पल में ll 

चाह ना पूछना उस माली की अब रुखसार l 
मरुधर आस लगाए बैठा मीठे पानी की धार ll

सिलसिला हैं इंतज़ार की नयी सहर आस l
उड़ा ले जाती पवन बदरी किसी दूजे पास ll

तारीख ने तहरीर लिखी थी उनके आने की l
तसब्बुर में चाहत थी उनके कुर्बत में आने की ll 

संदेशा आया फलक तक हमसफ़र सितारों की l
आफ़ताब भी फ़ना हैं इसके रुबाब नज़रों की ll

Sunday, May 9, 2021

हमकदम

एक फ़िक्र उसकी ही थी ज़माने में l
ख़ैरियत बदली नहीं कभी फ़साने में ll

दुआओं के अम्बर में फ़रियाद थी साँसों की l
मंत्र मुग्ध सुध बुध खो जाती राहों में उनकी ll 

कमसिन सा था यह सानिध्य अगर l
लटों में उलझा हिज़ाब था उस नज़र ll

राज छुपाये पुकार थी अंतर्मन की कोई l 
हर नज्म हसीन बने उनके साये जैसी ll

साथ कदम दो कदम उनके चलते कैसे l
मेहर में चाँद को नज़राना चाँद का देते कैसे ll 

सिफ़ारिश की थी सितारों से हमने उस घड़ी l
महफ़िल सजा रखी थी घटाओं ने उस घड़ी ll
 
ओझल था चाँद जाने कौन से झुरमुट बीच l
छोड़ गया यादें बस उन फरियादों के बीच ll

स्पर्श उनकी अनकही मीठी मीठी बातों का l 
छू जाती दिल के तारों को हमकदम जैसे कोई ll

Saturday, May 1, 2021

बेचैन पलकें

बेचैन रहती थी पलकें इस कदर l
अश्कों का कोई मोल नहीं था इस शहर ll

पर कटे परिंदों सा था ये हमसफ़र l
झुकी नज़रें बयाँ कर रही तन्हा यह सफ़र ll

मेहरम नहीं इनायत नहीं सुबह हो या रात भर l
फासला गहरा इतना दो पहर सागर के दो तरफ़ ll

आरज़ू मिली भटकती राह एक शाम इस शहर l
लिपट गयी सहम गयी ख़ुद से सहमी सहमी डगर ll

पगडंडियाँ से पटी थी बाजार की नहर l
निर्जन खड़ी थी जिजीविषा की लहर ll 

आहट एक समाई थी अंदर ही अंदर l
साये संग रूह की ना थी कोई खबर ll

रेखा हथेलियाँ बदलूँ एक रोज नए शहर l
फ़िलहाल ख़ामोश रहूँ कह रही पलकें संभल संभल ll 

 बेचैन रहती थी पलकें इस कदर l
अश्कों का कोई मोल नहीं था इस शहर ll

Friday, April 2, 2021

पनघट

देख चाँद की हिरणी सी मतवाली चाल l
शरमा पनघट करली घूँघट आट ll

आँख मिचौली नज़र नायाब l
बादलों की ओट छिप रहा महताब ll 

बिंदिया सा सज रहा पनघट के ललाट l
प्रतिबिम्ब निखर रहा दरिया के गाल ll

उड़ रहा घूँघट आँचल दामन थाम l
बरस रही बदरी भींग रहा आफताब साथ ll 

झुक गयी पलकें लज्जा गया पनघट ताज l
आसमां से धरती उतर आया दिल का चाँद ll

दरिया के उस छोर चाँद और पनघट साथ l
रास की रात सितारों संग चला आया चाँद ll

देख चाँद की हिरणी सी मतवाली चाल l
शरमा पनघट करली घूँघट आट ll

Saturday, March 13, 2021

पैबंद

ज़ख्मों के पैबंद सिलने भटकता रहा मैं l
अश्कों की कभी इस गली कभी उस गली ll 

डोर वो तलाशता रहा ढक दे जो पैबंद की रूही l 
दिखे ना दिल के जख़्म छुपी रहे सिलन की डोरी ll

ख़ामोशी लिए लहू रिस रहा तन के अंदर ही अंदर l
बुझा दे प्यास पानी इतना ना था समंदर के अंदर ll

मरुधर तपिश सी जल रही तन की काया l
बरगद से भी कोशों दूर थी चिलमन की माया ll

दृष्टिहीन बन गूँथ रहा ख्यालों की माला l
मर्ज़ निज़ात मिले भटकते रूह को साया ll

टूट गया तिल्सिम ताबीज़ के उस नूर का भी l 
बिन आँसू रो उठी पलकों पे जब तांडव छाया ll

लुप्त था धैर्य विश्वास ना था अब गतिमान l
डूब गया प्रहर डस गया इसको तम का आधार ll

सी लूँ पैबंद किसी तरह दिल के बस एक बार l 
छोड़ जाऊ तन का साया इसका फिर क्या काम ll   

Sunday, March 7, 2021

संस्कार

धरोहर जो मिली विरासत में l
मेरुदंड सँवार लूँ संस्कारों में ll

गुंजयमान रहे पल प्रतिपल l 
प्रतिध्वनि चेतना संस्कारों की ll

ज़िक्र चलता रहे सदियों तलक l
संस्कृति उद्धभव से उथानों की ll

परिधि कोई इसे बाँध ना पाए l
प्रतिलिपि इसके पायदानों की ll 

सहेजू दास्तानें उस सुन्दर लेखनी की l 
टूट गयी ज़ंजीरें ग़ुलामी अविव्यक्ति की ll

विद्धेष अग्नि ज्वाला आतुर हो ना कभी l
विपरीत दिशा बहे प्रतिशोध कामना इसकी ll

लौ मशाल तमस चीरती रहे अज्ञानी की l
उम्मीद सृष्टि बँधी रहे अनुकूल किरणों की ll 

परिवेश सुगम सरल हो प्रावधानों की l
बहती रहे गंगा सुन्दर संस्कारों की ll

Monday, March 1, 2021

बिछड़न

बंदिशों की डोर से हम ऐसे बंध गए l
उलझनों में उलझ उनकी तारुफ़ को तरस गए ll

सिलसिला खतों का जाने कहाँ गुम हो गया l
मुँडेर से जैसे पतंगों का माँझा कट गया ll

खनखियों से बातें करना दूर से आहें भरना l 
सपनों में सपनों को छू जिंदादिली से जीभर जीना ll

मन्नतों के धागों में उनके लिए फरियाद करना l
नुक्कड़ से ही उनकी दहलीज़ पर नज़र रखना ll

रिवाजों ने दौर के इस तरन्नुम को बदल दिया l
एक अदद हसीं को भी दिल खुद से मुकर गया ll

प्रतिशोध अग्नि जल रहा तन का मन l
भटक गयी नींद की करवटें दर बदर ll

प्रतिघात यह दे गया बिछड़न का गम l
संगनी संग छूट गया जाने कौन से पहर ll    

Saturday, February 13, 2021

साज

गुज़ारिश की मौशकी के उस अर्ध चाँद से हमनें l
शरीक हो हमारी महफ़िल में पूरे शब्बाब में अपने ll

मुल्तवी करवादी सुरमई आँखों ने हया ऐसे l
सुरमा बह बिखर गया हर और गालों पे जैसे ll

सिफ़ारिश मुनासिब थी उनके क़ुरबत आने की l
फ़रियाद बरसों पुरानी थी पहलू उनके आने की ll

धरोहर थे कशिश के रंग बिरंगे सुनहरे पल l
अतीत के इत्र में महक रहा खोया हुआ मन ll

चट्टानों पर उकेरा सुन्दर आरज़ू आलेख कोई l
ओस की शबनमी बूँदों से बहता आवेग कोई ll

दीवानगी का आलम ना थी सरहदों की सर जमीं l
ख़ामोशी में सिमटी रातें ठहरा हुआ महताब वहीं ll

दस्तूर दिलों की इन रिवायतों का पास यही l
कसक जवां होती हैं हर आरज़ू साज में नयी ll  

Wednesday, February 3, 2021

खनक

चूड़ियाँ गिनने बैठा उसकी कलाई की l
खनक उतर गयी दिल गहराई की ll

राज़दार उसकी आँखे बन गयी l
तसब्बुर में जलते अँगारों सी ll

दफ़न अब तलक सीने में थी जो चिंगारी l 
सोहबत में उसकी रजा बन गयी परछाई की ll 

रंगरेजन रंग गयी हौले से तन्हाई को l
महक उठी हीना जीने शहनाई को ll

पहन ली ताबीज़ बना उसके झाँझर के झंकारों की l 
घुल गयी रातों में मिठास आगोश में सितारों सी ll

शरमा सिमट रही वो खुद के आँचल से ऐसे l
सकून भरी करवटों में मिला साथ चाँद का जैसे ll

लकीरें हाथों की सलवटें माथे की l
स्याह घुल रही जिस्म भींगी रातों सी ll 

नादानियाँ भरी शोखियाँ थी उस चंचल काया की l
निखर आयी साँझ रंग भरे यादों के साये सी ll

रंग भरे यादों के साये सी l
रंग भरे यादों के साये सी ll

Sunday, January 17, 2021

सिफ़ारिश

माना बंदिशे हज़ारों हैं दिल की राहों में l
कुछ और नहीं तो खाब्बों में आ जाया करो ll

ख्यालों की गुलाबी घटाओं में रंग जाओ ऐसे l
संदेशों में मचल रहा हो कोई नादान समंदर जैसे ll 

शहद सी मिठास घुली धुन बन उतर आओ ऐसे l
साज़ सा पिरो लूँ साँसों की इन सरगम में ऐसे ll

सँवार लूँ सपनों की इस अनछुई जागीर को वैसे l
पनाह मिली हो उलझे धागों की कमान को जैसे ll

चाँद सी अनबुझ पहेली बने इन रिश्तों में l
तारों से इशारों में हौले से पैगाम यह कह दो ll

ढलती साँझ सा हसीन इकरार हो l
करार अपना सबसे बेमिसाल हो ll

सिफ़ारिश कर दो अपनी अतरंगी साँसों से ऐसे l
धड़के सिर्फ मेरी रूह की आरज़ू बन जाये ऐसे ll

धड़के सिर्फ मेरी रूह की आरज़ू बन जाये ऐसे l
धड़के सिर्फ मेरी रूह की आरज़ू बन जाये ऐसे ll

Friday, January 1, 2021

परछाई

हमें तो उस परछाई से मोहब्बत हो गयी I
वहम जिसका दिल में लिए हुए जिन्दा थे II

अजनबी सी चाहत थी यह या कुछ और I
जो भी थी कशिश यह थी दिल की और II

अनोखा सा था फ़साना इस इश्क़ का I
अफ़साना था ही इसका बड़ा बेजोड़ II

दीवानों सा आलम था हमारे फ़ितूर में I
बेकरार बावला था दिल उसके सुरूर में II

शोखियों थी चुलबुली सी मस्ती थी I
उस परछाई में मानो रूह की बस्ती थी II

कायनात के लिबास में मिल जाती वो हर ओर I
भटक रही संग मेरे ऐसे बंधी जैसे इससे कोई डोर II

दिल्लगी लगी जब वहम से इस कदर मनमोह I
लाजमी थी मोहब्बत फिर परछाई से कैसे ना हो II

खाब्बों की लकीरों में ख्वाईसों के जो रंग उकेरे थे I
परछाई बन वो ही हमारे दिल से रूबरू हो चले थे II

खुद से खुद हम इस कदर मिल गए I
परछाई के साये में दिल को भूल गए II  

कुछ और नहीं तन्हाईओं में जिन्दा रहने को I 
अनजाने में परछाई से ही मोहब्बत कर बैठे II