Monday, September 27, 2021

अर्ज़ियाँ

उस अधूरे बेरंग बिखरे पते पर l
अर्ज़ियाँ डाली इन तन्हाइयों ने ll

आहटें हलकी थी इनके अल्फ़ाज़ों की l 
दस्तक चुप चुप थी इनके हुँकारों की ll

फिरा ले उन्हें डाकिया हर गली गली l
मिला ना ठिकाना उसे किसी गली भी ll 

सादे कागज़ बिन कलम लिखी लिखावट l 
जुड़ी हुई थी यह दिल लहू अक्षरों नाज़ से ll

वसीयत यह उस विरासत अकेली की l
मर्म जब जब पढ़ूँ उस रात अकेली की ll

नदारद आकांक्षाएँ इन खोई अर्जियों की l 
ढूँढती फिर रही पता अपनी मर्ज़ियों की ll

सो गुम हो गयी थी अर्ज़ियाँ भी उस पते की l 
तन्हाईयों ने भेजी उस अधूरे बिखरे पते की ll


 

Friday, September 24, 2021

एकाकी

हल्के हल्के पदचापों की आहटें l
थिरका रही बावरे मन की आयतें ll 

दस्तक दे रही उस परिंदे घरोंदों को l
आ ढहा जा इस एकाकी दीवारों को ll

कटे पर बेताब हूँ परवाज़ भर जाने को l
आतुर हूँ छूने अम्बर के उन बादलों को ll

सूख ना जाए पानी कहीं इन बरसातों के l
लिपट अंग भिगों दे आँचल अरमानों के ll

हिज़्र में जिसकी कितनी सदियाँ गुज़र गयी l
मुलाक़ात उस खुदा से एक मुकम्मल हो जाये ll

संग तारुफ़ उनके मिज़ाज़ की शरीक ऐसी रहे l
इत्तेफाकन ही मिल जाये वो इस अंजुमन में ll

आवाज़ दे रही एकाकी पिंजरें की दरों दीवारें l 
बसेरा बन बस जाये उनकी यादों के साये ll


Friday, September 17, 2021

मौन स्तब्ध

मैं मौन स्तब्ध नथनी से जो टकरा गया जब l
ज़िक्र अल्फ़ाज़ों में उसका ही ठहर गया तब ll 

बारिश रहमत मोहब्बत की लगी बरसने तब l
पायल उसकी मुस्करा दिल तार छू गयी जब ll

अजनबी आँखों से छलका गयी ऐसा मीठा ज़हर l
रोम रोम तर गया उस मदहोश मधुशाला मयस्सर ll

हौले से फुसफुसा कर्णफूल बजे जो एक साथ l
छेड़ गए दिल की दरिया में उफनते तरंग राग ll 

शायर की शायरी सी खनकती हाथों की उसकी चूड़ियाँ l
दिवा स्वप्न सी रचा गयी रंगीन तिल्सिम की दुनिया ll

उलझी उलझी लटों के केशों में सजी वेणी उसकी l
पूर्णविराम नवाज़ गयी मेरे अधूरे यौवन अंक को ll

सुध बुध खो बूत बन खो गया उस मधुवन में l
निगाहें पलकों में कैद हो गयी जिस उपवन में ll

Sunday, September 12, 2021

सहर

उनींदी आँखों लिखने बैठा तेरी सहर की कली l 
नज़्म ढलती गयी खुद ही नज़र की इस कली ll

जादू कर गयी तेरे ताबीज़ की वो कच्ची डोरी l
बंधी थी जिससे तेरे संग मेरे रूह की डोरी ll  

सुन तेरे पाक इबादत के नूरों को इस घड़ी l
सिमट मिटते गयी हर फासलों की ये घड़ी ll

ओश शोखियाँ सी इठलाती नाज़ुक तू तितली l 
शिकायतें जो उड़ा ले गयी ग़ज़ल की इस गली ll

खुमारी लगी दिल्लगी एक मासूम सी कली l
तालीम आलम छा गयी पलकों पे दिलकशी ll  

रंगत बरस रही लफ्जों से अजान सी मीठी l
खोये अल्फ़ाज़ों से जुड़ गयी लबों की खुशी ll

लिखने बैठा तेरी सहर सफर की इस गली l
उनींदी आँखे खुली तेरे ही नयनों की गली ll

Thursday, September 9, 2021

दीमक

बदल गयी वो सारी गुलज़ार गालियाँ आज l
मशहूर थी इश्क़ चर्चे से जो कभी सरेआम ll 

दीमक लग गयी उन यादोँ की रंगत को आज l
बहा ले गयी थी अश्क जिसे कभी अपने साथ ll

वीरान अकेला आज उस मकान का वो आलिंद l 
कभी जिसके नूर से चमकती इसकी न्यारी बाती ll

अब ना हवाओं में वो मर्ज ना लबों पे उन लफ्जों का साथ l
वास्ता जिनकी तारुफ़ का गुज़रा था जिन गलियों के पास ll

मेला जमघट लगा था कभी दिलजलों का जहाँ l
दास्ताँ कहने को बचा रहा नहीं वहाँ कोई निशाँ ll

ढह गया उजड़ा खंडहर बदलते वक़्त के साथ l
दीमक लगा गया सहेजी पुरानी यादों के पास ll 

दीमक लगा गया सहेजी पुरानी यादों के पास l
दीमक लगा गया सहेजी पुरानी यादों के पास ll

Tuesday, September 7, 2021

वजूद

ज़िक्र एक उसका ही था मेरे जनाजे में l
सौदा दिल से कफ़न का कर आयी थी जो ll

सौगात आँसुओं को मिट्टी के दे आयी थी जो l
तालुक उस पर्दानशीं से इस काफिर का ना हो ll

कोई मीठा झोंका थी या किसी फरेब का साया l
हसीन सी दास्तां थी उसकी नज़रों का साया ll

उधार थी क़िश्तें बहुत उस नूर शबनम की l
महरूम थी उसकी एक झलक से मेरी काया ll

तकरीर रंगीन थी उसके ताबीज़ के गुल से l
तहरीर सजी थी जैसे उसके जन्नत गुल से ll

मशरूफ रूह उस खाब्ब में खोई थी इस कदर l
निगाहें शगुन पैमाना बन गयी थी उस वक़त ll

फक्कत वो ऐसी गहरी नींद सुला गयी मुझको l
वजूद काया ताबूत में सिमटा गयी मुझको ll