Friday, September 17, 2021

मौन स्तब्ध

मैं मौन स्तब्ध नथनी से जो टकरा गया जब l
ज़िक्र अल्फ़ाज़ों में उसका ही ठहर गया तब ll 

बारिश रहमत मोहब्बत की लगी बरसने तब l
पायल उसकी मुस्करा दिल तार छू गयी जब ll

अजनबी आँखों से छलका गयी ऐसा मीठा ज़हर l
रोम रोम तर गया उस मदहोश मधुशाला मयस्सर ll

हौले से फुसफुसा कर्णफूल बजे जो एक साथ l
छेड़ गए दिल की दरिया में उफनते तरंग राग ll 

शायर की शायरी सी खनकती हाथों की उसकी चूड़ियाँ l
दिवा स्वप्न सी रचा गयी रंगीन तिल्सिम की दुनिया ll

उलझी उलझी लटों के केशों में सजी वेणी उसकी l
पूर्णविराम नवाज़ गयी मेरे अधूरे यौवन अंक को ll

सुध बुध खो बूत बन खो गया उस मधुवन में l
निगाहें पलकों में कैद हो गयी जिस उपवन में ll

Sunday, September 12, 2021

सहर

उनींदी आँखों लिखने बैठा तेरी सहर की कली l 
नज़्म ढलती गयी खुद ही नज़र की इस कली ll

जादू कर गयी तेरे ताबीज़ की वो कच्ची डोरी l
बंधी थी जिससे तेरे संग मेरे रूह की डोरी ll  

सुन तेरे पाक इबादत के नूरों को इस घड़ी l
सिमट मिटते गयी हर फासलों की ये घड़ी ll

ओश शोखियाँ सी इठलाती नाज़ुक तू तितली l 
शिकायतें जो उड़ा ले गयी ग़ज़ल की इस गली ll

खुमारी लगी दिल्लगी एक मासूम सी कली l
तालीम आलम छा गयी पलकों पे दिलकशी ll  

रंगत बरस रही लफ्जों से अजान सी मीठी l
खोये अल्फ़ाज़ों से जुड़ गयी लबों की खुशी ll

लिखने बैठा तेरी सहर सफर की इस गली l
उनींदी आँखे खुली तेरे ही नयनों की गली ll

Thursday, September 9, 2021

दीमक

बदल गयी वो सारी गुलज़ार गालियाँ आज l
मशहूर थी इश्क़ चर्चे से जो कभी सरेआम ll 

दीमक लग गयी उन यादोँ की रंगत को आज l
बहा ले गयी थी अश्क जिसे कभी अपने साथ ll

वीरान अकेला आज उस मकान का वो आलिंद l 
कभी जिसके नूर से चमकती इसकी न्यारी बाती ll

अब ना हवाओं में वो मर्ज ना लबों पे उन लफ्जों का साथ l
वास्ता जिनकी तारुफ़ का गुज़रा था जिन गलियों के पास ll

मेला जमघट लगा था कभी दिलजलों का जहाँ l
दास्ताँ कहने को बचा रहा नहीं वहाँ कोई निशाँ ll

ढह गया उजड़ा खंडहर बदलते वक़्त के साथ l
दीमक लगा गया सहेजी पुरानी यादों के पास ll 

दीमक लगा गया सहेजी पुरानी यादों के पास l
दीमक लगा गया सहेजी पुरानी यादों के पास ll

Tuesday, September 7, 2021

वजूद

ज़िक्र एक उसका ही था मेरे जनाजे में l
सौदा दिल से कफ़न का कर आयी थी जो ll

सौगात आँसुओं को मिट्टी के दे आयी थी जो l
तालुक उस पर्दानशीं से इस काफिर का ना हो ll

कोई मीठा झोंका थी या किसी फरेब का साया l
हसीन सी दास्तां थी उसकी नज़रों का साया ll

उधार थी क़िश्तें बहुत उस नूर शबनम की l
महरूम थी उसकी एक झलक से मेरी काया ll

तकरीर रंगीन थी उसके ताबीज़ के गुल से l
तहरीर सजी थी जैसे उसके जन्नत गुल से ll

मशरूफ रूह उस खाब्ब में खोई थी इस कदर l
निगाहें शगुन पैमाना बन गयी थी उस वक़त ll

फक्कत वो ऐसी गहरी नींद सुला गयी मुझको l
वजूद काया ताबूत में सिमटा गयी मुझको ll