Thursday, March 22, 2018

कब्रगाह

वो दूर क्या गये एक भूल से

दिल यादों का कब्रगाह बन गया

फ़नाह थी जो मोहब्बत कभी

लिपटी रहती थी फूलों की चादर सी

जो कभी इस मज़ार से

मुरझा रुखसत हो गयी

अलविदा कह

तन्हा बैचेन छोड़ गयी इस रूह को

भटकने यादों के कब्रिस्तान में

भटकने यादों के कब्रिस्तान में

2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (24-03-2017) को "कविता का आथार" (चर्चा अंक-2919) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. बहुत सुंदर

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