Sunday, December 7, 2025

परिदृश्य

हैरत हुई ना किश्तों उधार मिली यादों दरारों में l

इल्तिजा ठहरी नहीं चहरे शबनमी बूँदों दरारों में ll


खोई सलवटें सूने आसमाँ तुरपाई गलियारों में l

छुपा गयी गुस्ताखियां आँचल पलकों सायों में ll


सुरमई बादल पनाह काजल निगाह घनेरो में l

कोई रंजिशें पैबंद ठगी अधखुली कपोलों में ll


बिखरे केशों लिपटी लट्टे झुर्रियां दर्पण लहरों में l

तस्वीरें धुंधली बदलती लकीरें हाथों मेहंदी में ll


ख्वाबों ख्यालों परिदृश्य फिराक दीवारों परिधि में l

लकीरें हाथों मिट गयी उलझन अंधियारों में ll

Tuesday, December 2, 2025

एक आवाज

 खो गयी एक आवाज शून्य अंधकार सी कही l

सूखे पत्ते टूटने कगार हरे पेड़ों डाली से कही ll


उलझी पगडण्डियों सा अकेला खड़ा मौन कही l

अजनबी थे लफ्ज़ उस अल्फाज़ मुरीद से कही ll


तराशी चिंतन टकटकी निगाहें मूर्त अधूरी थी कही I

रूह चेतना थी नहीं शतरंज बिछी बाजी सी कही ll


सूखी गर्त रूखी स्याही टूटे कलम नोंक से हर कही l

पुरानी सलवटें कागज लिख ना पायी अरमान कही ll


परछाई साये सी मौन साथ चलती रही कदमों कही l

ढलान ठोकर गहरी समुद्रों उफनती लहरों सी कही ll


डूबी अधूरी बातें चिंतन बादलों पार सूर्यास्त सी कही I

मझधार गुमनामी छोड़ गयी बिखरे थे जज्बात कही ll