Tuesday, December 4, 2018

गूँगी

सब कुछ हैं पास फ़िर भी अकेला हूँ

जिंदगी की भीड़ में तन्हा खड़ा हूँ

आँसू भी अब तो लगे पराये से हैं

रूह भी जिस्म से जैसे जुदा जुदा हैं

हाथों की लकीरें अधूरी अधूरी सी हैं

किस्मत मानो जैसे गहरी निंद्रा सोई हैं

साज़िश ना जाने कौन सी छिपी हैं

हर मुक़म्मल प्रार्थना भी मानों अधूरी सी हैं

शायद खुदगर्ज़ बन खुदा भी गूँगी बन सोई हैं

गूँगी बन सोई हैं

3 comments:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 06.12.20-18 को चर्चा मंच पर चर्चा - 3177 में दिया जाएगा

    धन्यवाद

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