Wednesday, December 5, 2018

आत्म मंथन

मस्तिष्क शून्य चेतना लुप्त

रूह नदारद ख़ुदा विचारत

जग मिथ्या मृगतृष्णा बिसारत

भटकत मन उद्वेगिन नयन

भाव करत द्वन्द चित करत सुमिरन

बिखरत हर भँवर बरसत लहू रंग

बिमुख होत चलत अशांत तन

काल निशा करत फ़िरत भ्रमर

लगत ग्रहण अस्त होवत जाय दिवाकर

समय प्रहर करत तांडव

विचलित होय तरुण राग फ़िरत जाय

करुण रास गला रुँधत जाय

ठगत जाय छलत जाय

आत्म मंथन जौहर बलि चढ़त जाय

जौहर बलि चढ़त जाय

1 comment:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (07-12-2018) को "भवसागर भयभीत हो गया" (चर्चा अंक-3178) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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