Saturday, January 26, 2019

दिल की बात

चिनारों की दरख़तों से फ़िज़ा लौट आयी

इबादत की मीनारों से रूह लौट आयी

सलवटें पड़ गयी रिश्तों की गलियारों में

भूल जो मेरे वजूद का क़िरदार

ढूँढती फिरी आसमां में महताब

लकीरें थी हाथों में मगर

क़िस्मत नहीं थी चाँद सितारों सी पास

नम थी दिल की जमीं पलकें थी भीगीं भीगीं

पर वो ना थी कही आस पास

छुपी थी जैसे बादलों के पार

ख्यालों की भीड़ में खो गयी अरमानों की दास्ताँ

आरज़ू उल्फ़त सनाट्टा बन छा गई दिल के आस पास

ना कोई ख्वाईशें ना कोई तरंगें छेड़ रही अब दिल के तार

बेज़ार हो उठी ख़ुद से ख़ुद के दिल की बात

उलझ रह गए बस रिश्तों के तार

सवालों के पहाड़ों में ढूँढता फिरा मैं अपना क़िरदार

टूटे दिलों में जगा ना पाया उन अहसासों के जज़्बात

बस टटोलता फिरा दिलों में दिल की बात, दिल की बात  

4 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (28-01-2019) को "सिलसिला नहीं होता" (चर्चा अंक-3230) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. आवश्यक सूचना :
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  3. खूबसूरत पंक्तियाँ. मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है.
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