Tuesday, June 11, 2019

तमाशबीन

ए जिंदगी तेरी किताब में

हम गुमनाम हो गए

नफरतों के बाजार में

मोहब्बत के क़र्ज़दार हो गए

साँसों की रफ़्तार ने निराशा में

ख़ामोशी की चादर ओढ़ ली

टूटती नब्ज़ घबरा तुझसे

लफ्जों से महरूम हो गयी

कहने लगी हैं रुख हवायेँ सभी

आ लुका छिपी के पेंच खोल दे

जुड़ जाए मेरी डोर तेरी पतंग से

पुरानी बातों की गाँठें खोल दे

मुझ जैसे तमाशबीन में

फिर मोहब्बत के रंग भरने

कोई गुमनाम शायर ही सही

ए जिंदगी तेरे कुछ पन्ने

तुझसे ही उधार खरीद

तेरी किताब के पन्नों में

फिर से हमें आबाद कर दे 

9 comments:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक चर्चा मंच पर चर्चा - 3365 दिया जाएगा

    धन्यवाद

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    1. मेरी रचना को चर्चा मंच पर स्थान देने के बहुत बहुत धन्यवाद
      आभार
      मनोज क्याल

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  2. बहुत खूब लिखा है ...
    अच्छी रचना ...

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    1. This comment has been removed by the author.

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    2. आदरणीय नासवा जी

      प्रोत्साहन के लिए तहे दिल से आपका आभारी
      आभार
      मनोज क्याल

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  3. अति सुंदर लेख

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    1. आदरणीय
      रचना पसंद करने के लिए धन्यवाद्
      आभार
      मनोज क्याल

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  4. ए जिंदगी तेरे कुछ पन्ने

    तुझसे ही उधार खरीद

    तेरी किताब के पन्नों में

    फिर से हमें आबाद कर दे

    बहुत उम्दा हृदय स्पर्शी रचना ।

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  5. आदरणीय कुसुम दीदी
    हौसला अफजाई के दिल से शुक्रिया
    आभार
    मनोज क्याल

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