Friday, May 15, 2020

पतझड़

पतझड़ सा खामोश हैं मन l
पर कटे परिंदो सा विचलित हैं तन ll

स्याह अंधेरों में गुम हो गया वक़्त l
चिनारों के दरख़्तों पर अब नहीं कोई सहर ll

बंजारा हो फिर रहा हूँ दर बदर l
कैसे पिघले पत्थर रहा ना कोई हमसफ़र ll

कड़वाहट घुली मौसम मिजाज ऐसी l  
दूरियाँ थाम ली रिश्तों मिजाज वैसी ll

महज इतेफाक कहूँ या आत्म संजोग l
अपरिचित से लगने लगे हैं खुद के नयन ll

बदल गए हैं अब सपनों के भी पल l
टूट गए साहिल ढह गए रेतों के महल ll

नवयौवन नवरंग फूलों खिला नहीं l
बदरा इस सावन खिलखिला हँसा नहीं ll

बदल गयी तस्वीर चिनारों की पुरानी l  
वसंत दरख्तों पर फिर कभी लौटा नहीं ll

सुहानी शामें ठंडी आहों सी सिसक गयी l
कारवाँ पतझड़ का अब तलक गुजरा नहीं ll 

2 comments:

  1. Replies
    1. आदरणीय शास्त्री जी
      आपकी हौशला अफ़ज़ाई से मेरी लिखावट में और निखार लाती हैं, आपका बहुत बहुत शुक्रिया
      आभार

      मनोज

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