Wednesday, May 6, 2020

रिश्तों की चाबी

खट्टास जंग की परत ऐसी जमी जिंदगानी पर l
चाबी रिश्तों की अलग हो गयी गुच्छे की पहरेदारी पर ll

बड़ी सिद्धत से सँवारा सहेजा जिस रिश्ते को l
हिफाज़त ही गुनाह बन गयी उसकी नजाकत को ll

सहज बेबाक पतंगों से उड़ते रहते थे जो रिश्ते l
डोर उसकी ही उलझ कट गयी अपने ही माँझे से ll

लाख जतन की मिट्टी महकती रहे इसकी की कोमल राहों की l
फूलों से सजी रहे पगडण्डी इसकी राहोँ की ll 

खुदा भी ख़ौफ़ज़दा हो गया इसके चिंतन क्रोध के आगे l
तल्खी में चादर नकाब की बैरी बन जब इसने ओढ़ ली ll

गुरुर था जिस रिश्ते को नफ़ासत अंदाज़ से जीने का l
मगरूर बन बिफर गया आसमां उसके कोने कोने का ll

हिसाब अधूरा रह गया कुछ खोने और पाने का l
सवाल अटक गया बेहिसाब जज्बातों का ll

प्रायश्चित करूँ कैसे अनवरत बह रहे अश्कों का l
निरुत्तर वो मौन है सजदा रिश्तों के रखवालों का ll

प्रायश्चित करूँ कैसे अनवरत बह रहे अश्कों का l
निरुत्तर वो मौन है सजदा रिश्तों के रखवालों का ll

8 comments:

  1. नमस्ते,

    आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" में गुरूवार 07 मई 2020 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

    ReplyDelete
    Replies
    1. आदरणीय रविंद्र जी
      मेरी रचना को अपने मंच पर स्थान देने के लिए शुक्रिया
      आभार
      मनोज

      Delete
  2. प्रायश्चित करूँ कैसे अनवरत बह रहे अश्कों का l
    निरुत्तर वो मौन है सजदा रिश्तों के रखवालों का ll
    बहुत खूब.... ,सादर नमन

    ReplyDelete
    Replies
    1. आदरणीया कामिनी जी
      रचना पसंद करने के लिए तहे दिल से शुक्रिया
      आभार
      मनोज

      Delete
  3. सहज बेबाक पतंगों से उड़ते रहते थे जो रिश्ते l
    डोर उसकी ही उलझ कट गयी अपने ही माँझे से

    अपने ही माँझे से कटती है रिश्तों की डोर अक्सर
    दोष दूसरों के सिर मढना तो शौक है अपना..
    बहुत सुन्दर सृजन
    वाह!!!

    ReplyDelete
    Replies
    1. आदरणीया सुधा जी
      रचना पसंद करने के लिए तहे दिल से शुक्रिया
      आभार
      मनोज

      Delete
  4. Replies
    1. आदरणीया मीना जी
      आपका बहुत बहुत शुक्रिया
      आभार
      मनोज

      Delete