Friday, June 19, 2020

निदान

बार बार टूटा हूँ हर बार टूटा हूँ 
क्यों हर बार मैं ही छला हूँ 

दर्द ने भी रंग अपना बदल लिया 
डसते डसते खुद से तन्हा कर दिया 

प्रायश्चित करने जिस चौखट पे आया 
द्वार उसके भी अपने लिए बंद पाया

खुदा भी बहरा बन किसी कोने छिप गया
पत्थर की मूरत में कोई ना नूर उभर आया  

मंज़िलें फकीरों सी राहों से भटक गयी 
वेदनाएँ रूह में उतर अपनी होती चली गयी

तलाश रहा हूँ निदान जख्मों की ताबीर का 
सकून कही मिला नहीं माँ की आँचल के छावं सा 

2 comments:

  1. बहुत सुन्दर।
    योग दिवस और पितृ दिवस की बधाई हो।

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    1. आदरणीय शास्त्री जी
      रचना पसंद करने के लिए शुक्रिया
      आभार
      मनोज

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