तराशा था जिसे खाब्बों में
तलाशता फिरा उसे फिर ज़माने में
पर मिला ना कोई ऐसा अब तलक इस जमाने में
रंग भर दे जो उस मूर्त में
तराशी थी जिसकी सूरत खाब्बों में
यूँ तो सितारें अनेक मिले राहों में
पर चाँद वो नजर ना आया
तराशा था जिसे खाब्बों में
माना हुस्न की कमी ना थी ज़माने में
मगर वो ना मिली
तस्वीर जिसकी बसी थी आँखों में
गुनाह यह दिल का था या आँखों का
गुमान इसका ना था
पर चाहत का यह कैसा अहसास था
अरमानों से तराशा था जिसे
रंग उसके
आज भी तलाशता फिर रहा हूँ राहों में
आज भी तलाशता फिर रहा हूँ राहों में
तलाशता फिरा उसे फिर ज़माने में
पर मिला ना कोई ऐसा अब तलक इस जमाने में
रंग भर दे जो उस मूर्त में
तराशी थी जिसकी सूरत खाब्बों में
यूँ तो सितारें अनेक मिले राहों में
पर चाँद वो नजर ना आया
तराशा था जिसे खाब्बों में
माना हुस्न की कमी ना थी ज़माने में
मगर वो ना मिली
तस्वीर जिसकी बसी थी आँखों में
गुनाह यह दिल का था या आँखों का
गुमान इसका ना था
पर चाहत का यह कैसा अहसास था
अरमानों से तराशा था जिसे
रंग उसके
आज भी तलाशता फिर रहा हूँ राहों में
आज भी तलाशता फिर रहा हूँ राहों में