Wednesday, May 6, 2020

रिश्तों की चाबी

खट्टास जंग की परत ऐसी जमी जिंदगानी पर l
चाबी रिश्तों की अलग हो गयी गुच्छे की पहरेदारी पर ll

बड़ी सिद्धत से सँवारा सहेजा जिस रिश्ते को l
हिफाज़त ही गुनाह बन गयी उसकी नजाकत को ll

सहज बेबाक पतंगों से उड़ते रहते थे जो रिश्ते l
डोर उसकी ही उलझ कट गयी अपने ही माँझे से ll

लाख जतन की मिट्टी महकती रहे इसकी की कोमल राहों की l
फूलों से सजी रहे पगडण्डी इसकी राहोँ की ll 

खुदा भी ख़ौफ़ज़दा हो गया इसके चिंतन क्रोध के आगे l
तल्खी में चादर नकाब की बैरी बन जब इसने ओढ़ ली ll

गुरुर था जिस रिश्ते को नफ़ासत अंदाज़ से जीने का l
मगरूर बन बिफर गया आसमां उसके कोने कोने का ll

हिसाब अधूरा रह गया कुछ खोने और पाने का l
सवाल अटक गया बेहिसाब जज्बातों का ll

प्रायश्चित करूँ कैसे अनवरत बह रहे अश्कों का l
निरुत्तर वो मौन है सजदा रिश्तों के रखवालों का ll

प्रायश्चित करूँ कैसे अनवरत बह रहे अश्कों का l
निरुत्तर वो मौन है सजदा रिश्तों के रखवालों का ll

Sunday, May 3, 2020

आवाज़

नफरतों के बाजार में मिला ना कोई कद्रदान l
खरीद सके जो इस तन्हा दिल के पैगाम ll

ख्वाईश हैं सौदागर मिले कोई ऐसा नायाब l
मेहताब बन निखर आये दिलों के अरमान ll

हालात ने पहरे लगाये हुए संवादों पर आय l
ताले पड़ जड़ गए जुबाँ के प्यालों पर आय ll

बिन कड़वाहट रिश्तों में दूरियाँ ऐसी बन आयी l
परछाई अपनी भी दस क़दम दूर खड़ी नज़र आयी ll

प्रतिलिपि फिर खोजी आफ़ताब के पास l
रहनुमा बन रूह उतर आये इसकी आवाज़ ll

महरूम ना हो कभी रिश्तें भी दूरियों के दरम्यां l
महफ़िल ओर मुखर आये बेक़रार धड़कनों के पास ll

ढलती साँझ नकाब के पीछे छुपी मुस्कान l
क़त्ल कर दिल का खरीद लिए सारे पैगाम ll

वो काफिर था या रहगुजर बेचैन थे नयनों के तार l
जल गयी चिंगारी बुझ गए जुल्मों सितम के तार ll

आँधियों के मेले में साये को मिल गया आकार l
हमसफ़र बन मिल गया दिल को जैसे कोई परवरदिगार ll

Tuesday, April 21, 2020

अजनबी जिंदगी

ना जाने जिंदगानी को किसकी नज़र लग गयी l
अब तो बस यह किस्तों में सिमट रह गयी ll

ताबीज़ को मानो खुद की नज़र लग गयी l
जैसे धुप खुद अपनी तपिश से जल गयीll

साँझ की कवायदें भी अब बिन सुरूर ही ll
बंद मयखानों की ज़ीनों पे ही ढल गयी ll

मौशकी थी जिसकी तारुफ़ से l
चाँद बन वो भी बादलों में छुप गयी ll

अब क्या नींद क्या नींदों के पैगाम l
बिन पलक झपके ही रात ढल गयी ll

सफ़र अब यह अजनबी सा बन गया l
हमसफ़र साँसों का साथ दूर छूट गया ll

कल तलक जो एहतेराम हबीबी था l
आज संगदिल बेरूह जिस्म बन गया ll

मज़लिस सजी रहती जिसकी धुनों पे l
धुंध पड़ गयी मय्यत की उसके सीने पे ll

करवटें बदल राहें बदल साजिशें ऐसी रची काफ़िर ने l
हाथ छुड़ा जिंदगी दूर हो गयी जिंदगानी से ll

मायूसी का आलम ओढ़ रुखसत हो गयी रूह l
रोती बिलखती रह गयी धड़कनों की रूह ll

किस्तों में बंट गयी जिंदगानी की रूह l
किस्तों में बंट गयी जिंदगानी की रूह ll

Wednesday, April 15, 2020

क्षितिज

प्रचंड प्रबाल हैं इतना वेग

हिल रहा हिमालय का तेज़

अँगार बन बरस रहा

जल प्रपात कोहराम का सेज़

भष्मीभूत हो भभक रहे

अरण्य नगर और खेत

भीभिषका लाली दानव रूप धरे 

तटस्थ खड़ा ज्वालामुखी यमदूत बने

पसरा मातम कायनात रौद्र रूप धरे

अग्रसर सृष्टि इंतकाल मुख खड़े

पटाक्षेप तांडव लहरें

कर अस्त भाग्य कर्म

मरणासन्न शैया क्षितिज ओर चले 

क्षितिज ओर चले

Monday, April 13, 2020

बेईमान यादेँ

कभी पलकें छू जाती हैं

कभी नींदें चुरा ले जाती हैं

यादेँ तेरी बड़ी बेईमान हैं

खुली आँखों में  सपनें संजो जाती हैं

कभी झपकी कभी थपकी

खट्टी मीठी यादों के ऐसे पल बुन जाती हैं

कभी नींदों में मुस्कराता हूँ

कभी करवटों में तकिये से लिपट जाता हूँ

घरौंदे यादों के ऐसे मचल जाते हैं

मैं फिर से बचपन में लौट आता हूँ

कुछ अध लिखे खतों की सोफ़ियाँ

कुछ बिछड़े जमाने की दूरियाँ

चाँद में आज भी तेरा ही अक्स बना

यादों की लोरियाँ गुनगुना जाती हैं

इसी बहाने नींदों में ही सही

मुलाक़ात अपनी मुकम्मल करा जाती हैं

भुला दस्तूर अध खुली पलकों का

यादें तेरी रात महका जाती हैं

छलकती पलकें आज भी तस्वीर

तेरी यादों की ही बुनती जाती हैं

तेरी यादों की ही बुनती जाती हैं