Friday, October 11, 2019

गुफ्तगूँ

साँसों की गुफ्तगूँ में

गुस्ताख़ी नजरों की हो गयी

खुले केशवों की लटों में

अरमानों की ताबीर खो गयी

देख चाँद के शबाब को

आयतें खुदगर्ज अपने आप हो गयी

सिंदूरी साँझ की लालिमा में लिपटी

आँचल के आगोश में सिमटी

तारुफ़ फ़िज़ा के लावण्य पर फ़ना हो गयी

निकल सपनों के ख़्यालों की जागीर से

चाँदनी नूर बन दिल से रूबरू हो गयी

हौले हौले तहरीर लबों की दस्तक ऐसी दे गयी

गुफ्तगूँ साँसों की साँसों से हो गयी

गुफ्तगूँ साँसों की साँसों से हो गयी

Saturday, September 14, 2019

यादों के नाम

लिख रहा हूँ नज़्म तेरी यादों के शाम

महकी महकी सोंधी साँसों के नाम 

सागर की कश्ती बाँहों के पास 

उड़ रहा आँचल निकल रहा आफताब 

शरमा रही लालिमा झुक रहा आसमां 

बंद पलकों के शबनमी दामन ने 

थाम लिया लबों के अनकहे लफ्जों का साथ 

निखर रही हिना छुप रहा महताब 

खोया रहू ता जीवन तेरे केशवों की छाँव 

बीते हर सुरमई शाम तेरी एक नयी नज्म के नाम 

मेहरबां उतार तू अब नक़ाब का लिहाज 

समा जा मेरी रूह के आगोश में 

बन मेरी धड़कनों का अहसास 

मैं लिखता रहूँ नज्म बस तेरी यादों के नाम   

Thursday, August 22, 2019

बेबजह

कोशिश करता हूँ मुस्कराने की

रुन्दन के आलाप को छिपाने की

दगा पर दे जाती हैं लकीरें ललाटों की

सूनी पथराई आँखों का मंजर

कह रहा देख ताबीर हाथों की

ले कटारी उकेर दूँ

किस्मत की इन अछूती लकीरों को भी

भूल गया था सँवारने खुदा जिन्हें

सपनों की अनमोल जल तरंगों सी

प्यासी रह गयी थी अन्तरआत्मा

रिस रहा लहू अंतर्द्वंद के प्रहरों से भी

वक़्त के पहले चहरे पर पड़ी सलवटें

चीख चीख सुना रही कहानियों इन लक़ीरों की

कर समझौता उदासी के इन रंगों से

उम्र अब एक नयी लिखूँ

बेबजह मुस्कराने की

बेबजह मुस्कराने की

Monday, August 19, 2019

रूठी जुबानी

अधूरी मोहब्बत का अधूरा फ़साना हो तुम

या अधूरे अल्फाजों की किताब हो तुम

या फिर अध लिखे खतों की ताबीर हो तुम

जो कोई भी हो तुम

पर मेरे लबों की खोई मुस्कान हो तुम

जुगनू सी चमकती, तारों से टिमटिमाती रातों में

चाँद की फरमाईस हो तुम

या तेरी धुन पर थिरकती कायनात की कोई कहानी हो तुम

जो कोई भी हो तुम

पर मेरे एक तरफ़ा इश्क़ की निशानी हो तुम

दरख्तों पर उकेरी कोई अधूरी चित्रकारी हो तुम

या मंदिर मस्जिद में लिखी कोई इबादत हो तुम

जो कोई भी तुम

पर मेरे बदनाम इश्क़ की रूठी जुबानी हो तुम

पर मेरे बदनाम इश्क़ की रूठी जुबानी हो तुम  

Thursday, August 15, 2019

निंद्रा

रुला रुला आँसुओ को मैं सुला आया

बोझिल पलकों को तम के साहिल में डूबो आया

खुदगर्ज़ हो चले थे जो जज्बात

जनाजे की बारात में दफ़न उन्हें कर आया

अरमानो के वो मुक़ाम टिसन जिसकी चुभ रही

लहू की बारिस में उन्हें भी भिगों आया 

कर रुसवाई यादों के भँवर से

निंद्रा की आगोश में खुद को लुटा आया

पर अन्तर्मन की करुण रूँधो से

एक बारी साया भी घबरा आया

फिर भी

रुला रुला आँसुओ को मैं सुला आया

आँसुओ को मैं सुला आया