माँ तुम कीर्ति हो कुदरत की बेमिसाल
सर झुके तेरे ही चरणों में बारम बार
सृष्टि रचे तेरे ही पुण्य प्रताप
रब से भी पहले तुझे ही पुकारे
सारे जन अपार
हा माँ तुम ही वो महान अवतार
जिसके आगे शीश नवाये
ईश्वर भी खुद आय
Sunday, September 5, 2010
सच्चाई
पढ़ हमारी रचना
कहा एक मित्र ने
क्यों लिखते हो दर्द ए दास्तान
लिखो कुछ ऐसा
पढ़ जिसे आ जाये जोश फुर्तीला
कहा हमने
मित्र नहीं ए हमारे बस में
लिखू सिर्फ दिल बहलाने के वास्ते
मुँह मोड़ नहीं सकता मैं
निष्ठुर सच्चाई के आगे
कहा एक मित्र ने
क्यों लिखते हो दर्द ए दास्तान
लिखो कुछ ऐसा
पढ़ जिसे आ जाये जोश फुर्तीला
कहा हमने
मित्र नहीं ए हमारे बस में
लिखू सिर्फ दिल बहलाने के वास्ते
मुँह मोड़ नहीं सकता मैं
निष्ठुर सच्चाई के आगे
Friday, September 3, 2010
अभिशाप
जन्म लेना है वरदान
जिन्दा रहना है अभिशाप
नरक से बदतर है जिन्दगी
कीमत जिन्दा रहने की ऐसी
जो मरकर भी छोड़े ना साथ
घुट घुट रेंगती है जिन्दगी
बिन पानी जैसे मछली
तड़पती है जिन्दगी
ह़र पल कहीं ना कहीं
बिकती है जिन्दगी
जिन्दा रहने के लिए
क्या कुछ नहीं कराती है जिन्दगी
खुद से हार , बन गयी अभिशाप
ओर देह बन गयी एक जिन्दा लाश
जिन्दा रहना है अभिशाप
नरक से बदतर है जिन्दगी
कीमत जिन्दा रहने की ऐसी
जो मरकर भी छोड़े ना साथ
घुट घुट रेंगती है जिन्दगी
बिन पानी जैसे मछली
तड़पती है जिन्दगी
ह़र पल कहीं ना कहीं
बिकती है जिन्दगी
जिन्दा रहने के लिए
क्या कुछ नहीं कराती है जिन्दगी
खुद से हार , बन गयी अभिशाप
ओर देह बन गयी एक जिन्दा लाश
अजनबी
अजनबी शहर अजनबी लोग
ढूंड रही नज़र तलाश रही छोर
मन हो उदास भटक रहा
कभी इस गली
कभी उस मौहले की ओर
बेबस आँखे घुर रही गुजरे पल की ओर
अब तो याद भी नहीं
जाना है किस ओर
अजनबी शहर अजनबी लोग
ढूंड रही नज़र तलाश रही छोर
मन हो उदास भटक रहा
कभी इस गली
कभी उस मौहले की ओर
बेबस आँखे घुर रही गुजरे पल की ओर
अब तो याद भी नहीं
जाना है किस ओर
अजनबी शहर अजनबी लोग
रुसवा
यूँ लगे , जिन्दगी हमसे रुसवा हो गयी
चहरे पे उदासी की लकीरें उभर गयी
अनजानों के बीच
जिन्दगी कैद हो रह गयी
लाख जतन की
पर वो खुशी फिर मिल ना सकी
चहरे पे उदासी की लकीरें उभर गयी
अनजानों के बीच
जिन्दगी कैद हो रह गयी
लाख जतन की
पर वो खुशी फिर मिल ना सकी
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