आवेग हूँ मैं ऐसी
बाँध सके ना जिसे कोय
मझधार से मेरी जो मिले
जुदा ना फ़िर मुझ से होय
जुदा ना फ़िर मुझ से होय
उफ़ान हूँ चरम पे
प्रपात में लिए घनघोर शोर
प्रपात में लिए घनघोर शोर
फ़िर भी
शीतल निर्मल प्रवाह हूँ मैं
स्पर्श आलिंगन से मेरी
नयी चेतना की अनुभूति होय
नयी चेतना की अनुभूति होय
बाँध सके ना जिसे कोय
मझधार से मेरी जो मिले
जुदा ना फ़िर मुझ से होय
जुदा ना फ़िर मुझ से होय
उफ़ान हूँ चरम पे
प्रपात में लिए घनघोर शोर
प्रपात में लिए घनघोर शोर
फ़िर भी
शीतल निर्मल प्रवाह हूँ मैं
स्पर्श आलिंगन से मेरी
नयी चेतना की अनुभूति होय
नयी चेतना की अनुभूति होय