Wednesday, March 2, 2016

कोहराम

बड़ी मनहूस थी वो रात

छूट गया जब तेरा मेरा साथ

बदलते हालातों की थी ए आग

भस्म हो गयी जिसमें रिश्तों की बुनियाद

गुम हो गयी वो थी प्यार की पुकार

रह गयी थी सिर्फ सिसकियों की आवाज़

बसने से पहले उजड़ गयी आशियाने की दीवार

रह गया खंडहर याद दिलाने उस रात का कोहराम 


Sunday, February 14, 2016

जीना

तू गुज़रे कल की बात ना कर

आने वाले कल की बात कर

सँवर जाएगा मुकद्दर

वक़्त को हमसफ़र बना के चल

तस्वीर फ़िर रंग जायेगी

महफ़िल क़ामयाबी की जब सज जायेगी

माना जो गुज़र गया वो अपना ना था

पर आनेवाला जो सपना था

वही एक पल तो अपना था

क़वायद इसलिए जिंदगी की तू सीख ले

कल के बदले आज में जीना सीख ले

सुरा के रंग

बात जो मदिरालय की पुकार में

ना वो मस्जिद की अजान में

ना वो मंदिर के भगवान में

छू लेती है दिल को इसकी जो बात

यहाँ नहीं कोई महजब की दीवार

एक ही किश्ती के यहाँ सब खैवन्हार

छलकाती है जब ए जाम

जन्नत उत्तर आती हैं तब धरा के पास

थामी जिसने भी इसकी पतवार

खुद वो खुदा बन गया

सुरा के रंग समाय

सुरा के रंग समाय

Friday, January 22, 2016

किश्तों में जिंदगी

किश्तों में जिंदगी जीना हमने छोड़ दी

लकीरें हाथों की हमनें मोड़ दी

देख जज्बे को

ख़फ़ा रहने वाली क़िस्मत भी खिलखिला उठी

फ़ैसला मुक़दर का अपने था

धारा जिंदगी की हमने मोड़ दी

वंचित रह न जाए जिंदगानी कही

फ़िज़ों में खुशबू हमने बिखेर दी

झुक गया आसमां भी

जिन्दा रहने की क़वायद जब हमने सीख ली

किश्तों में जिंदगी जीना हमने छोड़ दी

लकीरें हाथों की हमनें मोड़ दी

किश्तों में जिंदगी जीना हमने छोड़ दी






राह

चला था अकेला जिस नयी राह पर

मुसाफ़िर तो यूँ अनेक मिले उस राह पर

हमसफ़र कोई मिला नहीं मगर उस राह पर

गुजरती घड़ियाँ जैसे सादिया बन गयी

वक़्त जैसे ठहर गया उस राह पर आके

भूलभुलैया थी पगडंडियों की उस राह के आगे

कदम रुक गए उस राह पे आके

दिशाहीन हो भटक गया उस राह के आगे

नामों निशां ना था मंजिल का उस राह के आगे

कशमकश की इस राह पे आके

अब तो यह भी भूल गया जाना किस राह के आगे

अब तो यह भी भूल गया जाना किस राह के आगे