Wednesday, April 8, 2020

ठहराव

निभाने दस्तूर जमाने के

रस्मों रिवाज़ की तिलांजलि दे आया

बन अपनी नज़रों में अपराधी

आवाज़ में ठहराव को हवा दे आया

ठहराव हैं आत्मसात का

घुटनों पे रेंगती सच्चाई का

खोये आत्मसन्मान की अश्रु धारा का

बदल गया प्रहर का रूप

टूट बिखर गए माला के फूल

अँधियारा बदनसीबी का

बुझा गया प्रकाश पुंज

गुमनाम हो गयी नियति

बदल गए जीवन बोल

ढह गयी मिट्टी कुनबे की

लुप्त हो गए लकीरों के छोर 

जकड़ गयी जंजीर अहसानों की

गुलाम हो गए हस्त रेखाओं के मोल

ठहरने लगी दिल की आवाज़

ना कटने वाली बैचैन उम्र दराज़ों के ठोर

बैचैन उम्र दराज़ों के ठोर 

Friday, April 3, 2020

दुल्हन

कोरी रस्म बन ना रह जाए

मधुर मिलन की आस

खनकती चूड़ियों के बोल झाँझर की तान

घोल रही मधुमास में मिश्री की मिठास

बिंदिया लिख रही ग़ज़ल नयन छेड़ रहे साज

प्रियतम के आने की सजनी जोह रही बाट

क्यों देर हो रही प्रियतम को आज

ना कोई संदेश ना कोई पैगाम

क्या पिया छोड़ चले गए लिख अधूरी मनुहार

बढ़ रहा धड़कनों का साज

निहारे कभी दर्पण कभी मेहंदी लगे हाथ

इस बीच गूँज उठी शहनाई

आ पहुँचे साजन तोरण द्वार

सज गयी डोली सजनी हुई विदा को तैयार

भुला दुःस्वप्न विचार 

बन दुल्हन चल दी प्रियतम के द्वार 

माने

धुंध बिखर गयी सपनों पे सारे

पहरे लगा गए तम के अँधियारे

सिफारिश करूँ अब आफताब से कैसे

छिप गए तारे सारे अमावस के घोरे

जज्बात कैद हो रह गए सीने मेरे

जाहिर करूँ अब कैसे अरमानों के पहरे

पर कट गए परिंदों के जैसे

हालात हो गए मुजरिम जैसे

कैद हो गए साँझ सबेरे

पाबंदी लग गयी पलकों के आगे

बदल गए जिंदगी के माने

बदल गए जिंदगी के माने 

Thursday, April 2, 2020

विचलित पलकें

दरकिनार कर आँखों के पैगाम

नींद भी खो गयी पलकों के साथ

बेचैन हो रही नज़रें

ढूँढने सपनों में अपना किरदार

अर्ध निशा तलक करवटों ने भी छोड़ दिया साथ

सोचा गुजार लूँ कुछ पल चाँद के साथ

निहारा झरोखें से

पाया नदारद हैं चाँद भी सितारों के साथ

रात प्रहर लंबी हो गयी

एकांत सिधारे नींदों के पैगाम

हर घड़ी टटोल रही आँखे

विचलित पलकें नींदों के नाम

विचलित पलकें नींदों के नाम  

Wednesday, April 1, 2020

अहंकार

देख मानव के नित नये जैविक हथियारों के आविष्कार

कायनात भी स्वतः आ पहुँची नष्ट होने के कगार

बिन चले एक भी तोप , गोली और तलवार

हर ओर लग गये पर्वतों से ऊपर लाशों के अम्बार

रास ना आया प्रकृति को अहंकारी मानव का

चेतना शून्य वर्चस्व का यह अंदाज़

मूक दर्शक बन रह गया बस ख़लीफ़ा

नेस्तनाबूद हो रही सम्पूर्ण सृष्टि आज

सन्नाटा मरघट का ऐसा पसरा चहुँ ओर

जल रही चिताओं की होली बुझा गयी जीवन लौ 

शिथिल पड़ गयी मानवता विनाश लीला वेग को

रो उठी कुदरत देख अपनी ही रचना तांडव आकार

प्रतिघात कर प्रहार कर सभ्यता के सीने को

अपने स्वार्थ को कलंकित दृष्टि विहीन मानव ने

जुदा कर दिया सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की परछाई को

जुदा कर दिया सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की परछाई को