Wednesday, April 15, 2020

क्षितिज

प्रचंड प्रबाल हैं इतना वेग

हिल रहा हिमालय का तेज़

अँगार बन बरस रहा

जल प्रपात कोहराम का सेज़

भष्मीभूत हो भभक रहे

अरण्य नगर और खेत

भीभिषका लाली दानव रूप धरे 

तटस्थ खड़ा ज्वालामुखी यमदूत बने

पसरा मातम कायनात रौद्र रूप धरे

अग्रसर सृष्टि इंतकाल मुख खड़े

पटाक्षेप तांडव लहरें

कर अस्त भाग्य कर्म

मरणासन्न शैया क्षितिज ओर चले 

क्षितिज ओर चले

Monday, April 13, 2020

बेईमान यादेँ

कभी पलकें छू जाती हैं

कभी नींदें चुरा ले जाती हैं

यादेँ तेरी बड़ी बेईमान हैं

खुली आँखों में  सपनें संजो जाती हैं

कभी झपकी कभी थपकी

खट्टी मीठी यादों के ऐसे पल बुन जाती हैं

कभी नींदों में मुस्कराता हूँ

कभी करवटों में तकिये से लिपट जाता हूँ

घरौंदे यादों के ऐसे मचल जाते हैं

मैं फिर से बचपन में लौट आता हूँ

कुछ अध लिखे खतों की सोफ़ियाँ

कुछ बिछड़े जमाने की दूरियाँ

चाँद में आज भी तेरा ही अक्स बना

यादों की लोरियाँ गुनगुना जाती हैं

इसी बहाने नींदों में ही सही

मुलाक़ात अपनी मुकम्मल करा जाती हैं

भुला दस्तूर अध खुली पलकों का

यादें तेरी रात महका जाती हैं

छलकती पलकें आज भी तस्वीर

तेरी यादों की ही बुनती जाती हैं

तेरी यादों की ही बुनती जाती हैं

Wednesday, April 8, 2020

ठहराव

निभाने दस्तूर जमाने के

रस्मों रिवाज़ की तिलांजलि दे आया

बन अपनी नज़रों में अपराधी

आवाज़ में ठहराव को हवा दे आया

ठहराव हैं आत्मसात का

घुटनों पे रेंगती सच्चाई का

खोये आत्मसन्मान की अश्रु धारा का

बदल गया प्रहर का रूप

टूट बिखर गए माला के फूल

अँधियारा बदनसीबी का

बुझा गया प्रकाश पुंज

गुमनाम हो गयी नियति

बदल गए जीवन बोल

ढह गयी मिट्टी कुनबे की

लुप्त हो गए लकीरों के छोर 

जकड़ गयी जंजीर अहसानों की

गुलाम हो गए हस्त रेखाओं के मोल

ठहरने लगी दिल की आवाज़

ना कटने वाली बैचैन उम्र दराज़ों के ठोर

बैचैन उम्र दराज़ों के ठोर 

Friday, April 3, 2020

दुल्हन

कोरी रस्म बन ना रह जाए

मधुर मिलन की आस

खनकती चूड़ियों के बोल झाँझर की तान

घोल रही मधुमास में मिश्री की मिठास

बिंदिया लिख रही ग़ज़ल नयन छेड़ रहे साज

प्रियतम के आने की सजनी जोह रही बाट

क्यों देर हो रही प्रियतम को आज

ना कोई संदेश ना कोई पैगाम

क्या पिया छोड़ चले गए लिख अधूरी मनुहार

बढ़ रहा धड़कनों का साज

निहारे कभी दर्पण कभी मेहंदी लगे हाथ

इस बीच गूँज उठी शहनाई

आ पहुँचे साजन तोरण द्वार

सज गयी डोली सजनी हुई विदा को तैयार

भुला दुःस्वप्न विचार 

बन दुल्हन चल दी प्रियतम के द्वार 

माने

धुंध बिखर गयी सपनों पे सारे

पहरे लगा गए तम के अँधियारे

सिफारिश करूँ अब आफताब से कैसे

छिप गए तारे सारे अमावस के घोरे

जज्बात कैद हो रह गए सीने मेरे

जाहिर करूँ अब कैसे अरमानों के पहरे

पर कट गए परिंदों के जैसे

हालात हो गए मुजरिम जैसे

कैद हो गए साँझ सबेरे

पाबंदी लग गयी पलकों के आगे

बदल गए जिंदगी के माने

बदल गए जिंदगी के माने