Thursday, January 6, 2022

सोहबत

सोहबत में उस अजनबी के ऐसे रंगे हम l
तोहमत उसके गुनहा की हमको डस गयी ll 

पिंजर से इस परिंदे का रुख कैसे अब रुखसत हो l 
जब महताब के दाग में उसके गालों का तिल हो ll  

कायल थे जब हिजाब के पीछे छुपी उस नजाकत के l 
नफासत भरे पैगाम से इश्क़ लाजमी फिर कैसे ना हो ll

जादुई स्पर्श सा था उसकी मीठी मीठी बातों में l
सुध बुध भुला खो जाये साँसे जिन मुलाकातों में ll  

बेकरार उनकी निगाहों पलकों के दरमियाँ l
छिपा था बेबाक दीवानगी का आलम ऐसा ll

मुसाफिर मुझसा मशहूर गया उसके नाम से ऐसे l 
पता कोई अपना भूल गया उसके घर के आगे जैसे ll  


 

Tuesday, January 4, 2022

धुँधला

रिश्तों के बाजार में नया कुछ ना था l
दर्पण में हर एक चेहरा धुँधला सा था ll

अर्सों सँवारा नाजों से जिस हर एक पल को l 
काफूर गुम था वजूद हर एक उस पल का ll

टुकड़ों टुकड़ों बिका मैं भी परिंदा नादान l
तौलता गया तराजू बिन किये दर भाव ll

स्पर्श था रक्त का हवाओं के आस पास l
बहा था मेरा लहू जो अश्कों के साथ साथ ll 

सौदागरी बदल गयी देखने परखने के अंदाज़ l 
काफ़िरना बन गया मैं काफिरों के साथ साथ ll

हर एक मोल में थी छुपी थी एक ही अरदास l
कहीं दिल ना बिक जाये जिस्म के साथ साथ ll 

अहमियत खो गए सारे जज्बाती बात व्यवहार l
धूल में मिल मिट गए रिश्तों के सारे तार सार ll

सौदागरों की इस बस्ती में रिश्ते थे बेईमान l
अक्स भी धुँधला हो जाता आकर दर्पण पास ll   

Monday, December 27, 2021

प्रतिलिपि

प्रतिलिपि लिखी जिन गुमनाम गुलजारों की l
मिली वो इस अंजुमन के प्यासे रहदारों  सी ll

सूनी दीवारें सजी थी किसी दुल्हन सेज सी l
कुरबत जिसके उतर आयी थी महताब बारात की ll

मशरूफ थी रूह इस कदर इनायतें रैना इंतजार में l
शुरूर नूर लिहाज का गुम हो गया इस कायनात में ll

बिसर अलंकार शब्दों मखमली ताबीर का l
रंग गया अम्बर स्वप्निल रंगदार घटाओं का ll

अहसास फूलों सी नाजुक इन पंखुड़ियों का l
तितलियाँ उड़ा गया इन पलकों नींद का ll

मीठी सी जिरह इसकी जेहन गहराई में l
लिखती हर पल नयी इबादत गुमनामी में ll

प्रतिलिपि लिखी जिन गुमनाम गुलजारों की l
मिली वो इस अंजुमन के प्यासे रहदारों  सी ll

Sunday, December 5, 2021

मुकाम

सफर के हर पड़ाव कदम मुकाम बदलते गये l
निशाँ अपनी फितरतों के हर और छोड़ते गये ll

इतने लग गये इसके दामन के दरमियाँ  बदरंगें से दाग l
मैला हो आँचल तार तार हो गये इसके पहलू एक साथ ll

नादानीयॉ उस रुखसार की शिकस्त ऐसी दे गयी l
अधूरे मशवरे की खींचतान में आबरू फिसल गयी ll

अवरुद्ध संकरी गलीया भटक गयी थी सफर की डोर l
चाँद वो नजर आया नहीं छुपा था जो बादलों की ओट ll

धुन्ध में लिपटी थी फलक तलक इसकी जो बारिशें l
धुँआ धुआँ हो बिखर गयी थी गुल की सारी नवाजिशें ll

फेहरिस्त लंबी थी इस सफर के उन गुलजारों की l
भटकते कदमों के घायल गुलजार अरमानों की ll

पग पग स्वाँग रचा रखा था राहों ने हर उस मोड़ पर l
भ्रमित हो मुकाम बदल लिया क़दमों ने जिस ढोर पर ll

ना मिटने वाले क़दमों के निशाँ छूटते गए हर तरफ l
मुकाम बस एक मय्सर ना हुआ सफर के इस सफर ll

Friday, December 3, 2021

गुनाह

ज़िक्र सिर्फ और सिर्फ तेरा ही आया बार बार I
मेरे हर गुनाह में तेरा ही नाम आया हर बार II

तितलियाँ जो उड़ाई थी तूने रंगीन फ़सनों की I
आगाज़ वो कभी बनी नहीं इनके अरमानों की II

पँख खोल परवाज़ भर उड़ जाने बेताब इन परिंदों को I
आसमाँ वो मिला नहीं कबूल करले जो इन परवानों को I 

ना जाने कैसे बिन पते का बंद तेरा वो खत I
मोहर सा लिफाफे से चिपका गया मेरा मन II

तेरी पर्दानशीं आँखों के उस सम्मोहन भरे जादू से I
अछूता रह ना पाया गुनाह अंजाम अदा करने से II

खामोशीयों पे मेरी पहरे लगे थे तेरी यादों के सभी I
तेरे फैसले में रजा मेरी भी थी तेरे लिए ही शामिल II

परत दर परत ताबीर गुनाह की ज्यों ज्यों खुलती गयी I
इस गुनाह रिश्ते की चर्चा सरेआम होती चली गयी II