सोहबत में उस अजनबी के ऐसे रंगे हम l
तोहमत उसके गुनहा की हमको डस गयी ll
पिंजर से इस परिंदे का रुख कैसे अब रुखसत हो l
जब महताब के दाग में उसके गालों का तिल हो ll
कायल थे जब हिजाब के पीछे छुपी उस नजाकत के l
नफासत भरे पैगाम से इश्क़ लाजमी फिर कैसे ना हो ll
जादुई स्पर्श सा था उसकी मीठी मीठी बातों में l
सुध बुध भुला खो जाये साँसे जिन मुलाकातों में ll
बेकरार उनकी निगाहों पलकों के दरमियाँ l
छिपा था बेबाक दीवानगी का आलम ऐसा ll
मुसाफिर मुझसा मशहूर गया उसके नाम से ऐसे l
पता कोई अपना भूल गया उसके घर के आगे जैसे ll