Thursday, February 12, 2015

अन्धकार

प्यार की तड़प में नयनों से जब अश्रु धारा बहती है

लहू भी तब सिरहन जाता है

अन्तर्मन से निकली यह वेदना

जब करती है

चितत्कार के पुकार

करुण धारा भी बन जाती है तब प्रलय तूफ़ान

उजड़ जाता है मानो जैसे सारा संसार

ओर पसर जाता है वीरानगी का अन्धकार   

ओर पसर जाता है वीरानगी का अन्धकार

Monday, February 9, 2015

फ़ासले

आज मैं अपनी दुनिया लूटा रहा हुँ

दिल अपना किसी ओर के नाम लिख रहा हुँ

वो दिलों के पास होके भी नजरों से दूर है

ओर मैं उनकी नजरों में होके भी

उनकी धड़कनों से दूर हुँ

तन्हाई भरे इन फ़ासलों के इस दरमियाँ

उनकी यादों में खुद को भूला रहा हुँ

आज मैं अपनी दुनिया लूटा रहा हुँ  

Tuesday, January 20, 2015

ऊँची उड़ान

अधखुली पलकों के खाब्ब अभी बाकी है

क्योंकि  सपनों की ऊँची उड़ान अभी बाकी है

स्वछंद विचरण करुँ परिंदो की तरह

उड़ता फिरुँ गगन भर

डोर इस खाब्ब की थामनी अभी बाकी है

छूने मंजिल को आतुर

सपनों का संसार अभी बाकी है

खाब्बों के इस तिलसिम के

कई अधखुले राज अभी बाकी है

कई अधखुले राज अभी बाकी है

अधखुली पलकों के खाब्ब अभी बाकी है

क्योंकि  सपनों की ऊँची उड़ान अभी बाकी है

Tuesday, January 13, 2015

खोए पल

अक्सर हम कुछ लहमों  को जीते है

जवानी के कदमों में

बचपन की मासूमियत खोते है

दूर हो जाती है जिंदगी

अहसास जब तलक खोए पलों का होता है

खालीपन जब कचोटने लगता है

मुड़ कर देखना भी

नागवारा लगता है

क्योंकि हिसाब उन पलों का

आज भी आधा ही नजर आता है

आधा ही नजर आता है  

जात

मदमाती पवन की वेगों से

उनकी चाल ना पूछो

लह लहाती लहरों की वेगों से

उनकी धार ना पूछो

कब रुख बदल ले

कुदरत का यह करिश्मा

इससे इसकी जात ना पूछो

इससे इसकी जात ना पूछो