Tuesday, October 13, 2020

ll जिरह ll

जिरह होती रही तेरी मेरी साँसों में l
साजिश कोई रची यादों के खुले पन्नों ने ll
 
बेकाबू हिचकियाँ मंजर बेपर्दा आरज़ू बबंडर  l
साँसों की चिल्मन में तेरे ही रंगों का समंदर ll
 
काँच सी नाज़ुक इन गुलिस्ताँ कड़ियों में l
खट्टी मीठी सलवटें पड़ गयी बातों ही बातों में ll
 
नज़ाकत भरी रुमानियत थी इस हसीन पल में l
रंज था पास हो के भी वो पास ना थी इस पल में ll
 
रिहा थी ताबीर तस्वीर साजिश पदचापों की l
मेहराब थी हिचकियाँ खूबसूरत अहसासों की ll

बंदिशें थी साँसों की खुद से खुद अगर l
जुदा औरों से थी राहें अपनी ए रहगुज़र ll

Thursday, October 8, 2020

नींद

बादलों की ओट में ओझल होते हुए चाँद ने l 
फ़साना नया बुन दिया पलकों में बोझिल रातों ने ll

रुखसत हो गयी रवायतें मीठी मीठी नींदों की l
पलकें मुकम्मल हो गयी रात सितारों की ll

निगाहों की निगहेंबानी ने छुआ था जिस महताब को l
अंतर्ध्वनि उसकी उड़ा ले गयी नींदों की ढलती रातों को ll 

अर्ज़ियाँ लिखी खत लिखें नींद खाब्बों की तहरीर ने l
उतर आ जमीं ए चाँद नूर सौगात की रात ढले ll

गुज़ारिश कर रही नींदे सोऊ ना एक पल तेरे इंतज़ार में l
निहारु ढलती रातों में अक्स बस मेरे अर्ध चाँद के ll

साहिल फनकार मेरे ग़ुरबत चाँद में l
फ़क़त वो चले आये मिटा फासले क़ुरबत राह में ll

तनहा छोड़ गयी नींद अकेली पलकों नाज़ में l
चली आ चाँद संग मक़ाम की सकून भरी रात में ll

Thursday, October 1, 2020

चकोरी

उलझी लटें बिखरे घुँघराले लंबे लंबे केश l
सुलझाती अंगुलियाँ दे रही घटाओं को संदेश ll

उमड़ घुमड़ आ मेघा प्रियतम भेष l
बदरी को तरस रही चकोरी की मुँडेर ll 

निहारु जब जब दर्पण बरस उठो तब तब मेघ l
मुग्ध हो उठे जिससे चकोरी के शरबती नयन ll

उड़ा चल बहा चल आँचल संदेश वेग l
भींग रही चकोरी प्रितम विरह सेज ll

गुनगुनाती धूप मेघों का शीतल रूप l
इंद्रधनुषी किरणें बेचैन पलकों का रुख ll 

घरोंदे की महक मोहल्ले की सड़क l
पुकार रही बदरा लेती जा इस मुँडेर का संदेश ll

सँवारु लटें रह रह अब ना बदलूँ करवटें सेज l
दामन आलिंगन करा दे चकोर संग ऐ मेघ ll
 
दामन आलिंगन करा दे चकोर संग ऐ मेघ l
दामन आलिंगन करा दे चकोर संग ऐ मेघ ll     

Wednesday, September 23, 2020

साँवला

रंग साँवला हैं मेरे महताब का l
सुन्दर सलोने अर्ध चाँद का ll

मधुर रस हैं बीना की तान का l 
सज रही धुनों की सुन्दर साज का ll

साँझ की धुंध अजान की धुन l
निखार रही रंग अस्त होते आफताब का ll

आलिंगन कर रही क्षितिज छाया l
बेकरार निमंत्रण उस पल पैगाम का ll 

आहट खत के पदचापों की l
बंद लिफ़ाफ़े में छिपी खुमारी की ll

दस्तक दे रही जल पानी को l
साँवली सलोनी ढलती रातों को ll

मुग्ध निशा प्रहर ठहर गयी l
सजी रहे जन्नत ताबीर हुस्न नज़ारों की ll

Thursday, September 3, 2020

सौदा

निभाने कुछ मोहब्बत की रश्में I
बेचने चला था दिल गैरों के बीच II   

मुनासिब ना था सौदा अरमानों के बीच I
मंजूर ना था रहगुजर को इससे कम का पीरII

फासला था लम्बा जख्म था गहरा I
काफिराना सा खो चला वजूद इनके बीच ll

दुःस्वप्न सा था बँटवारा दिलों की मंजिलों बीच l
नज़दीकियों की दूरिओं में विरह था सूनेपन का बीज II 

आईना भी टूट बिखर गया था मन के बीच I
अंजाम ए फेहरिस्त बदल गयी थी आधी राह बीच II

मुनादी करवा दी वफाओं ने विदाई बीच I
खरा किरदार बिक रहा गुमनामी बीच II

अंजुमन की इस गुलिस्ताँ में आ गया मरुधर तीर I
मिला ना कोई सौदागर बावरा हो गया मन अधीर II

अंजुमन की इस गुलिस्ताँ में आ गया मरुधर तीर I
मिला ना कोई सौदागर बावरा हो गया मन अधीर II

Saturday, August 15, 2020

बस्ती

 

 

बरगद का वो पेड बारिश की वो मस्ती l
छुपी थी जिसमें मेरे सपनों की बस्ती ll
 
पंख लगा उड़ गयी उन पलों की मस्ती l
छोड़ गयी पीछे रंजो गम की बस्ती ll

शहर बदल उजड़ गयी नींदों की बस्ती l
छूट गयी दूर कही माँ के हाथोँ की थपकी ll

रोम रोम अंग महक रही गांव की वो मिट्टी l
लौट आ उस पल पुकार रही खेत खलियानों की बस्ती ll
 
नहीं थी खेल खिलौनों की इतनी बस्ती l
पर इन सबों से अच्छी थी वो कागज़ की कश्ती ll
 
नंगे पैरों में थी एक अजब सी मस्ती l
चुभ रही जूतों में काँटों की बस्ती ll
 
वो आबो हवा गांव के चौपाल की मस्ती l
यहाँ ना घर ना दालान सजी हुई पत्थरों की बस्ती ll
 
याद आ रही उन चौबारों गलियों की मस्ती l
काश लौट वापस आ सकता जीने उस बस्ती ll

Friday, August 14, 2020

अजनबी महरबा 

देख मुझे ऑनलाइन तुम ऑफ लाइन हो जाती हो l

डीपी बदलते ही सबसे पहले लाईक कर जाती हो ll


व्हाटस एप स्टेटस हो या फेस बुक l

कमेंट के नाम ठेंगा दिखा जाती हो ll


तुम कहती हो कोई खास रूचि नहीं l

फिर भी मेरी तस्वीरों को डाउनलोड करती जाती हो ll


भूल गयी तुम टेक्नोलॉजी ने युग बदल डाली हैं l

प्रोफाइल विजिट की ईमेल तुरंत मुझको पंहुचा जाती हैं ll


कैसे निहारु तुझे ऐ अजनबी महरबा l

तूने अपनी डीपी में भी तस्वीर मेरी जो लगा डाली हैं ll