Wednesday, September 23, 2020

साँवला

रंग साँवला हैं मेरे महताब का l
सुन्दर सलोने अर्ध चाँद का ll

मधुर रस हैं बीना की तान का l 
सज रही धुनों की सुन्दर साज का ll

साँझ की धुंध अजान की धुन l
निखार रही रंग अस्त होते आफताब का ll

आलिंगन कर रही क्षितिज छाया l
बेकरार निमंत्रण उस पल पैगाम का ll 

आहट खत के पदचापों की l
बंद लिफ़ाफ़े में छिपी खुमारी की ll

दस्तक दे रही जल पानी को l
साँवली सलोनी ढलती रातों को ll

मुग्ध निशा प्रहर ठहर गयी l
सजी रहे जन्नत ताबीर हुस्न नज़ारों की ll

Thursday, September 3, 2020

सौदा

निभाने कुछ मोहब्बत की रश्में I
बेचने चला था दिल गैरों के बीच II   

मुनासिब ना था सौदा अरमानों के बीच I
मंजूर ना था रहगुजर को इससे कम का पीरII

फासला था लम्बा जख्म था गहरा I
काफिराना सा खो चला वजूद इनके बीच ll

दुःस्वप्न सा था बँटवारा दिलों की मंजिलों बीच l
नज़दीकियों की दूरिओं में विरह था सूनेपन का बीज II 

आईना भी टूट बिखर गया था मन के बीच I
अंजाम ए फेहरिस्त बदल गयी थी आधी राह बीच II

मुनादी करवा दी वफाओं ने विदाई बीच I
खरा किरदार बिक रहा गुमनामी बीच II

अंजुमन की इस गुलिस्ताँ में आ गया मरुधर तीर I
मिला ना कोई सौदागर बावरा हो गया मन अधीर II

अंजुमन की इस गुलिस्ताँ में आ गया मरुधर तीर I
मिला ना कोई सौदागर बावरा हो गया मन अधीर II

Saturday, August 15, 2020

बस्ती

 

 

बरगद का वो पेड बारिश की वो मस्ती l
छुपी थी जिसमें मेरे सपनों की बस्ती ll
 
पंख लगा उड़ गयी उन पलों की मस्ती l
छोड़ गयी पीछे रंजो गम की बस्ती ll

शहर बदल उजड़ गयी नींदों की बस्ती l
छूट गयी दूर कही माँ के हाथोँ की थपकी ll

रोम रोम अंग महक रही गांव की वो मिट्टी l
लौट आ उस पल पुकार रही खेत खलियानों की बस्ती ll
 
नहीं थी खेल खिलौनों की इतनी बस्ती l
पर इन सबों से अच्छी थी वो कागज़ की कश्ती ll
 
नंगे पैरों में थी एक अजब सी मस्ती l
चुभ रही जूतों में काँटों की बस्ती ll
 
वो आबो हवा गांव के चौपाल की मस्ती l
यहाँ ना घर ना दालान सजी हुई पत्थरों की बस्ती ll
 
याद आ रही उन चौबारों गलियों की मस्ती l
काश लौट वापस आ सकता जीने उस बस्ती ll

Friday, August 14, 2020

अजनबी महरबा 

देख मुझे ऑनलाइन तुम ऑफ लाइन हो जाती हो l

डीपी बदलते ही सबसे पहले लाईक कर जाती हो ll


व्हाटस एप स्टेटस हो या फेस बुक l

कमेंट के नाम ठेंगा दिखा जाती हो ll


तुम कहती हो कोई खास रूचि नहीं l

फिर भी मेरी तस्वीरों को डाउनलोड करती जाती हो ll


भूल गयी तुम टेक्नोलॉजी ने युग बदल डाली हैं l

प्रोफाइल विजिट की ईमेल तुरंत मुझको पंहुचा जाती हैं ll


कैसे निहारु तुझे ऐ अजनबी महरबा l

तूने अपनी डीपी में भी तस्वीर मेरी जो लगा डाली हैं ll

Wednesday, August 12, 2020

कहानी

कहानी अपनी कुछ कुछ मिलती जुलती सी है l

इश्तिहारों से सजी जैसे कोई जुगलबंदी सी हैं ll


पर एकबारगी गिरवी क्या रख दिये l 

डैने जैसे फड़फड़ाना ही भूल गये  ll


निशान गहरे सजे थे तन गलियारों में l

निशां लम्बी थी खोये हुए मझधारों में ll


दर्पण भी पहचानना भूल गयी l 

घेर लिया उत्कंठि ज्वालाओं ने ll 


बेदखल हूँ क्षतिज के हर अरमानों से l

मौन स्तब्ध हूँ अपने ही साये से ll


तू भी निःशब्द जकड़ी जंजीरों में l

टिमटिमा रही हो जैसे मज़बूरी में ll


एक सहमी चीत्कार हैं अपनी बंदगानी में l

मिलती जुलती सी फ़रियाद हैं तेरी मेरी कहानी में ll

Tuesday, August 11, 2020

शुन्य

चाहा था एक रोज समेट लूँ दुनिया सारी l

चाहत अब बस हैं इतनी सी समेट लूँ अपनी साँसे सारी ll

 

वेदना सृजन श्राप सी लगने लगी l

कष्ट मृदु वरदान सी लगने लगी ll

 

अल्प हैं राह फरियाद के पड़ाव की l

संख्या तो बस हैं उम्र लिहाज की ll

 

हुनर कमी थी शायद परवान के कुर्बान में l

सजा मेरी थी रजा उसकी ना थी इस दरखास्त में ll

 

ख्वाईश बस एक ही बची हैं l

कह रहा हूँ दिलों अरमान से ll

 

हर बंधन से अब मुक्त हो जाऊ l

शुन्य था शुन्य में मिल जाऊ ll


छोड़ कारवाँ ध्यान मग्न काम में l

गुजर जाऊ दहलीज के इस मुकाम से ll 


शुन्य था शुन्य में मिल जाऊ l

गुजर जाऊ दहलीज के इस मुकाम से ll 

Friday, July 24, 2020

सकून

वो सकून हैं हर शामों की तसब्बुर का l
मंजर गुलज़ार हैं तन्हाई में उसकी यादों का ll

कौन कहता हैं मैं तन्हा अकेला हूँ l
हर रोज गुलफाम की क़ुरबत में उससे मिला करता हूँ ll

खत रोज एक नया उसे लिखा करता हूँ l
खबर उसे मिल जाये पतंग बिन डोर उड़ाया करता हूँ ll

हर फरमान मैं उफान लिए हर घूँट छलक जाता हूँ l
पीऊं कैसे जाम में भी अक्स उसका निहार जाता हूँ ll

कितनी हसीन यह सितमगर मोहब्बत हैं l
वो नहीं फिर भी उनकी रूह से भी मोहब्बत हैं ll

तन नहीं मन लगा जिससे किनारा उससे कैसा हो l
ख्यालों से निकल यादों से समझौता कैसे हो ll

सकून मिल रहा जिसकी फ़िज़ों से l
मौसम तन्हाईयों का गुलज़ार फिर कैसे ना हो ll