Thursday, August 17, 2017

संयोग

कैसा ऐ संयोग हैं

लंबे अंतराल बाद

किस्मत आज फ़िर उस मोड़ पे ले आयी

सोचा था जिस राह से फिर ना गुजरूँगा

ठिठक गए कदम खुद ब खुद

पास देख उस आशियाने को

फड़फड़ाने लगे यादों के पन्ने

बेचैन हो गए दिल के झरोखें

फ़िर से यादों में खो जाने को

अहसास से ऊबर

भींगी नम पलकों को जो खोला

सामने आ गया फिर वो साया

कभी बहा ले गयी थी जिसे

परिस्थितियों की हताशा

मौन उसके लफ्ज थे

पर बयां कर रही आँखें उसकी

कुछ ओर नहीं

बस कर आलिंगन जीवन अंतिम बार

हो जाऊ रुखसत दुनिया से अभी

हो जाऊ रुखसत दुनिया से अभी

Saturday, August 5, 2017

पारदर्दिष्टा

यारों आज कल आँसू भी मुस्कराते हैं

जब कभी ऐ छलकते हैं

एक पारदर्दिष्टा रेखांकित कर जाते हैं 

ओर इस अंजुमन में

अपनों की जगह दिखला जाते हैं

दर्द के इस सफ़र की

बानगी यही हैं जानिये

इसके दर्पण में

अपने सच्चे अक्स को निहारिये

इस मुकाम की आगाज़ ही वो अल्फ़ाज़ हैं

जिक्र जिनका आंसुओ के मुस्कान में  हैं

जिक्र जिनका आंसुओ के मुस्कान में  हैं

Tuesday, August 1, 2017

कुछ पल

ऐ जिंदगी कुछ पल ठहर जा

इठलाने की उम्र अभी बाकी हैं

शरारतें अभी बहुत करनी बाकी हैं

माना दहलीज़ बचपन की गुज़र गयी

पर मुक़ाम बचपने का अब तलक बाकी हैं

यक़ीनन ठहराव उम्र को मिलेगा नहीं

लेकिन फ़िर से उस पड़ाव का छोर मिलेगा कहीं

अलविदा दुनिया को कहने से पहले

उम्मीद अब तलक ऐ बाकी हैं

वो शोखियाँ वो शरारतें

उनमें फ़िर से एक बार खो जाने का

जूनून आज भी इस उम्र पे हाबी हैं

क्या हुआ जो वक़्त गुजर गया

पर संग उसकी यादों के  जीने का

सफ़र तो अब तलक बाकी हैं

ऐ जिंदगी कुछ पल ठहर जा

इठलाने की उम्र अभी बाकी हैं





Friday, July 28, 2017

तरीक़े

जीने के तरीक़े तलाश रहा हूँ

शायद अपने आप को संभाल रहा हूँ

ठोकर गहरी इतनी लगी

फिर  उठने की कोशिश कर रहा हूँ

ना ही कोई खुदा हैं

ना ही कोई अपना हैं

जन्म मृत्यु के बीच का फासला ही

यथार्थ में कर्मों का ही रूहानी खेल हैं

आत्मसात हुआ इस ज्ञान का

जिंदगी रूबरू हुई जब अपने आप से

Friday, July 21, 2017

लकीरें

ना मैं छंद पढ़ता हूँ

ना व्यंग पढ़ता हूँ

मैं तो सिर्फ़

चहरे पे लिखी लकीरें पढ़ता हूँ

हर एक रचना की

बख़ूबी ताबीर पढ़ता हूँ

तामील करता हूँ

शामिल रहे इसमें हर वो इबादत

लिखी आयतें जिसमें

सिर्फ़ ख़ुदा के नाम की हो

यारों मैं तो फकीरों की तरह

लकीरों में भी बस दुआओं का असर टटोलता हूँ

मैं तो सिर्फ़

चहरे पे लिखी लकीरें पढ़ता हूँ 


Thursday, July 20, 2017

अनाम रिश्ते

रिश्ते कुछ अनाम अभी बाक़ी हैं

काँटो में भी रह

गुलाब की तरह खिलने की चाह अभी बाकी हैं

फ़रियाद महक से इसकी भी वही आती हैं

रंग जब अपने रिश्तों का जुदा नहीं

अड़चन फ़िर  कहा

मुझको अंगीकार करने में आती हैं

कहीं खुदगर्जी का आलम

कहीं ज़माने का डर

फ़िर भी जीवन डोर में पिरोने

कुछ अनाम रिश्ते अभी बाकी हैं

कुछ अनाम रिश्ते अभी बाकी हैं

Saturday, July 8, 2017

रुख

कह दो हवाओं से

रुख बदल ले जरा

हिज़ाब उनका सरका ले जाए जरा

हुस्न जो कैद हैं इसके पीछे

आज़ाद हो जाए नक़ाब से जरा

छिपा महफ़ूज रखा जिसे

दीदार से उसके हो जाए जरा

कह दो हवाओं से

रुख बदल ले जरा