Monday, March 1, 2021

बिछड़न

बंदिशों की डोर से हम ऐसे बंध गए l
उलझनों में उलझ उनकी तारुफ़ को तरस गए ll

सिलसिला खतों का जाने कहाँ गुम हो गया l
मुँडेर से जैसे पतंगों का माँझा कट गया ll

खनखियों से बातें करना दूर से आहें भरना l 
सपनों में सपनों को छू जिंदादिली से जीभर जीना ll

मन्नतों के धागों में उनके लिए फरियाद करना l
नुक्कड़ से ही उनकी दहलीज़ पर नज़र रखना ll

रिवाजों ने दौर के इस तरन्नुम को बदल दिया l
एक अदद हसीं को भी दिल खुद से मुकर गया ll

प्रतिशोध अग्नि जल रहा तन का मन l
भटक गयी नींद की करवटें दर बदर ll

प्रतिघात यह दे गया बिछड़न का गम l
संगनी संग छूट गया जाने कौन से पहर ll    

Saturday, February 13, 2021

साज

गुज़ारिश की मौशकी के उस अर्ध चाँद से हमनें l
शरीक हो हमारी महफ़िल में पूरे शब्बाब में अपने ll

मुल्तवी करवादी सुरमई आँखों ने हया ऐसे l
सुरमा बह बिखर गया हर और गालों पे जैसे ll

सिफ़ारिश मुनासिब थी उनके क़ुरबत आने की l
फ़रियाद बरसों पुरानी थी पहलू उनके आने की ll

धरोहर थे कशिश के रंग बिरंगे सुनहरे पल l
अतीत के इत्र में महक रहा खोया हुआ मन ll

चट्टानों पर उकेरा सुन्दर आरज़ू आलेख कोई l
ओस की शबनमी बूँदों से बहता आवेग कोई ll

दीवानगी का आलम ना थी सरहदों की सर जमीं l
ख़ामोशी में सिमटी रातें ठहरा हुआ महताब वहीं ll

दस्तूर दिलों की इन रिवायतों का पास यही l
कसक जवां होती हैं हर आरज़ू साज में नयी ll  

Wednesday, February 3, 2021

खनक

चूड़ियाँ गिनने बैठा उसकी कलाई की l
खनक उतर गयी दिल गहराई की ll

राज़दार उसकी आँखे बन गयी l
तसब्बुर में जलते अँगारों सी ll

दफ़न अब तलक सीने में थी जो चिंगारी l 
सोहबत में उसकी रजा बन गयी परछाई की ll 

रंगरेजन रंग गयी हौले से तन्हाई को l
महक उठी हीना जीने शहनाई को ll

पहन ली ताबीज़ बना उसके झाँझर के झंकारों की l 
घुल गयी रातों में मिठास आगोश में सितारों सी ll

शरमा सिमट रही वो खुद के आँचल से ऐसे l
सकून भरी करवटों में मिला साथ चाँद का जैसे ll

लकीरें हाथों की सलवटें माथे की l
स्याह घुल रही जिस्म भींगी रातों सी ll 

नादानियाँ भरी शोखियाँ थी उस चंचल काया की l
निखर आयी साँझ रंग भरे यादों के साये सी ll

रंग भरे यादों के साये सी l
रंग भरे यादों के साये सी ll

Sunday, January 17, 2021

सिफ़ारिश

माना बंदिशे हज़ारों हैं दिल की राहों में l
कुछ और नहीं तो खाब्बों में आ जाया करो ll

ख्यालों की गुलाबी घटाओं में रंग जाओ ऐसे l
संदेशों में मचल रहा हो कोई नादान समंदर जैसे ll 

शहद सी मिठास घुली धुन बन उतर आओ ऐसे l
साज़ सा पिरो लूँ साँसों की इन सरगम में ऐसे ll

सँवार लूँ सपनों की इस अनछुई जागीर को वैसे l
पनाह मिली हो उलझे धागों की कमान को जैसे ll

चाँद सी अनबुझ पहेली बने इन रिश्तों में l
तारों से इशारों में हौले से पैगाम यह कह दो ll

ढलती साँझ सा हसीन इकरार हो l
करार अपना सबसे बेमिसाल हो ll

सिफ़ारिश कर दो अपनी अतरंगी साँसों से ऐसे l
धड़के सिर्फ मेरी रूह की आरज़ू बन जाये ऐसे ll

धड़के सिर्फ मेरी रूह की आरज़ू बन जाये ऐसे l
धड़के सिर्फ मेरी रूह की आरज़ू बन जाये ऐसे ll

Friday, January 1, 2021

परछाई

हमें तो उस परछाई से मोहब्बत हो गयी I
वहम जिसका दिल में लिए हुए जिन्दा थे II

अजनबी सी चाहत थी यह या कुछ और I
जो भी थी कशिश यह थी दिल की और II

अनोखा सा था फ़साना इस इश्क़ का I
अफ़साना था ही इसका बड़ा बेजोड़ II

दीवानों सा आलम था हमारे फ़ितूर में I
बेकरार बावला था दिल उसके सुरूर में II

शोखियों थी चुलबुली सी मस्ती थी I
उस परछाई में मानो रूह की बस्ती थी II

कायनात के लिबास में मिल जाती वो हर ओर I
भटक रही संग मेरे ऐसे बंधी जैसे इससे कोई डोर II

दिल्लगी लगी जब वहम से इस कदर मनमोह I
लाजमी थी मोहब्बत फिर परछाई से कैसे ना हो II

खाब्बों की लकीरों में ख्वाईसों के जो रंग उकेरे थे I
परछाई बन वो ही हमारे दिल से रूबरू हो चले थे II

खुद से खुद हम इस कदर मिल गए I
परछाई के साये में दिल को भूल गए II  

कुछ और नहीं तन्हाईओं में जिन्दा रहने को I 
अनजाने में परछाई से ही मोहब्बत कर बैठे II

Thursday, December 17, 2020

साथ

तू हुनरमंद मैं बेफिक्रे आलम l
चल सौदा अहसासों का करते हैं ll

कुछ अजनबी मोड़ से टकरा रही जिंदगी l
दुरस्त बातों जज्बातों को करते हैं ll

सफ़र जो पीछे छूट गया l
वो काफ़िरानों की बस्ती सी हैं ll

बंजारा सा था बेवकूफ़ यह मन l
पिरो ना पाया रिश्तों के पल ll

ठहरा हुआ मंजर खोया खोया आसमां था l
फीके फीके रंग ढले अस्त हो रहा महताब था ll

प्यासे कंठ और रह नहीं सकता l
अवरुद्ध चाहतों को और कर नहीं सकता ll

उजागर कर दू हर वो बात l
तोड़ दू सारे बंधन सारे जज्बात ll

मिल जाए इस सौदे में जो तेरा साथ l
भर दूँ रंग हर गलियों के अहसास  ll  

Monday, December 7, 2020

तज़ुर्बा

तज़ुर्बा ना पूछ ए सोखियाँ l
झुरिआ वयां रही ख्यालों की लड़ियाँ ll

बदल गयी जो रंग जुल्फ़ों के l
वो चाँदनी कम ना थी औरों से ll

लिखें हैं उन्हें खत लाखों हटेलिओं में l
मुरीद थी निगाहें जिनकी परवाज़ों में ll

सुरूर उस साकी का औरों से दूजा था l
हिना सी महकती गुलबदन का आसमां और था ll

कभी पर्दा कभी बेपर्दा अटखेलियाँ करती बेपरवाह l
जादू सा सम्मोहन वश करती उसकी नादानियाँ ll

फ़िसल गए वो वक़्त दरख़्तों की गहराई में l
खुमारी फिर भी उतर ना पायी दिल की गहराई से ll

जिन्दा वो आज भी हैं साँसों की सच्चाई में l
बेताबी वही हैं धड़कनों की परछाई में ll

बेताबी वही हैं धड़कनों की परछाई में l
बेताबी वही हैं धड़कनों की परछाई में ll