Sunday, January 13, 2019

इच्छा शक्ति

प्रबल हो अगर इच्छा शक्ति

हिमालय की भी नहीं कोई हस्ती

धड़क रही हो ज्वाला जब दिलों में

आतुर उतनी तब होती जीतने की प्रवृति

दौड़ रहा हो लहू जब जूनून बन

द्वंद कैसे ना फिर मस्तिष्क में हो

आवेग इसका जो संग्राम मचाये

हृदय ललकार जोश ऐसा भर जाए

आगाज़ समर जीत से

एक नया अध्याय रचत जाए

कर्मठ हो जब ऐसी लगन भक्ति

वरदान बन जाती हैं तब सम्पूर्ण सृष्टि

रूह से मंज़िल फिर दूर नहीं

नामुमकिन सी फिर कोई सुबह नहीं

प्रबल इच्छा शक्ति के आगे

हिमालय का भी कोई मौल नहीं

कोई मौल नहीं 

Friday, January 11, 2019

उम्र फ़साना

उम्र तो सिर्फ़ और सिर्फ़ एक फ़साना हैं

चेहरे की झुर्रियाँ ही सिर्फ़ वक़्त का अफ़साना हैं

फ़लसफ़ा लिखा जिसने इन साँसों पर

परवाज़ भरती वो गगन खाब्बों पर

आईना तो सिर्फ़ इसका एक बहाना हैं

उम्र की दहलीज़ मानो फ़रेब का खज़ाना हैं

रंगों की उल्फ़त इसका ताना बाना हैं

फ़ितरत कभी इसने बदली नहीं

धड़कनों से यारी इसकी कभी जमी नहीं

रूह तो सिर्फ़ इसका एक मुखौटा हैं

हर पड़ाव पर मगर एक नया संदेशा हैं

जी लो जी भर पल दो पल यहाँ

क्योंकि उम्र के बदलते आसमां में

कल का क्या भरोसा हैं कल का क्या भरोसा हैं

Monday, January 7, 2019

एक लहर

पतों की सरसराहट फूलों की मुस्कराहट

दस्तक धड़कनों को यह दे रही

कुछ अर्ज़ियाँ अभी मुक़म्मल होनी बाकी हैं

आयतों में मोहब्बत के दीदार होने अभी बाकी हैं

गुजरती शामों के ढ़लती रातों के पैगाम अभी बाकी हैं

वियोग की तपिश में जल रही रूह को

सकून की छावं अभी बाकी हैं

बस एक पल को ठहर जाये यह पल

हसरतों की मंज़िल में कुछ फ़ासले ही बाकी हैं

उतर आनेवाला हैं चाँद धरा पर

उखड़ती साँसों में यह खाब्ब अभी बाकी हैं

दफ़न कई शिकायतों के पन्ने अभी खुलने बाकी हैं

डूबा ले जाने को एक लहर अभी आनी बाकी हैं

एक लहर अभी आनी बाकी हैं 

Monday, December 24, 2018

यादों की अलमारी

कुछ यादें नयी सुहानी

कुछ यादें पुरानी कहानी

सहेज लूँ

किताब बना लूँ

खोलू जब यादों की अलमारी

छलक आये नयना

बिखरने लगे यादें जुबानी

रंगों की बरसात में

महक उठे बगीया सारी

सँजोयी हुई वो यादें

कुछ नादानी कुछ आपबीती

कुछ मधुर गीतों से

कुछ बेसुरे तानों से सजी

खोलू फ़िर वो हृदय राज

गूँज उठे यादों की अलमारी

गूँज उठे यादों की अलमारी 

Wednesday, December 5, 2018

आत्म मंथन

मस्तिष्क शून्य चेतना लुप्त

रूह नदारद ख़ुदा विचारत

जग मिथ्या मृगतृष्णा बिसारत

भटकत मन उद्वेगिन नयन

भाव करत द्वन्द चित करत सुमिरन

बिखरत हर भँवर बरसत लहू रंग

बिमुख होत चलत अशांत तन

काल निशा करत फ़िरत भ्रमर

लगत ग्रहण अस्त होवत जाय दिवाकर

समय प्रहर करत तांडव

विचलित होय तरुण राग फ़िरत जाय

करुण रास गला रुँधत जाय

ठगत जाय छलत जाय

आत्म मंथन जौहर बलि चढ़त जाय

जौहर बलि चढ़त जाय

Tuesday, December 4, 2018

गूँगी

सब कुछ हैं पास फ़िर भी अकेला हूँ

जिंदगी की भीड़ में तन्हा खड़ा हूँ

आँसू भी अब तो लगे पराये से हैं

रूह भी जिस्म से जैसे जुदा जुदा हैं

हाथों की लकीरें अधूरी अधूरी सी हैं

किस्मत मानो जैसे गहरी निंद्रा सोई हैं

साज़िश ना जाने कौन सी छिपी हैं

हर मुक़म्मल प्रार्थना भी मानों अधूरी सी हैं

शायद खुदगर्ज़ बन खुदा भी गूँगी बन सोई हैं

गूँगी बन सोई हैं

दुहाई

खुदगर्ज़ हैं अगर तू ए ख़ुदा

तो मैं भी अधूरे सपनों की ताबीर लिए खड़ा हूँ

जंग छिड़ी हैं आज हम दोनों बीच

क्या फ़र्क पड़ता हैं

किस्मत जो तूने लिखी नहीं

फ़िर भी अधूरी हाथों की लकीरें कर्म से पीछे हटती नहीं

मायूस हूँ मैं ए ख़ुदा

पर लाचार नहीं

जीत आज तू मुझसे सकता नहीं

आगे बढ़ते मेरे कदमों को रोक सकता नहीं

स्वाभिमान की पराकाष्ठा आज तेरे अहंकार से टकराई हैं

देख मेरे बुलंद हौसलों को

खड़ा हो जा तू भी मेरे संग

वक़्त भी आज दे रहा यह दुहाई हैं

दे रहा यह दुहाई हैं