Monday, April 13, 2020

बेईमान यादेँ

कभी पलकें छू जाती हैं

कभी नींदें चुरा ले जाती हैं

यादेँ तेरी बड़ी बेईमान हैं

खुली आँखों में  सपनें संजो जाती हैं

कभी झपकी कभी थपकी

खट्टी मीठी यादों के ऐसे पल बुन जाती हैं

कभी नींदों में मुस्कराता हूँ

कभी करवटों में तकिये से लिपट जाता हूँ

घरौंदे यादों के ऐसे मचल जाते हैं

मैं फिर से बचपन में लौट आता हूँ

कुछ अध लिखे खतों की सोफ़ियाँ

कुछ बिछड़े जमाने की दूरियाँ

चाँद में आज भी तेरा ही अक्स बना

यादों की लोरियाँ गुनगुना जाती हैं

इसी बहाने नींदों में ही सही

मुलाक़ात अपनी मुकम्मल करा जाती हैं

भुला दस्तूर अध खुली पलकों का

यादें तेरी रात महका जाती हैं

छलकती पलकें आज भी तस्वीर

तेरी यादों की ही बुनती जाती हैं

तेरी यादों की ही बुनती जाती हैं

4 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (15-04-2020) को   "मुस्लिम समाज को सकारात्मक सोच की आवश्यकता"   ( चर्चा अंक-3672)    पर भी होगी। -- 
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
    -- 
    कोरोना को घर में लॉकडाउन होकर ही हराया जा सकता है इसलिए आप सब लोग अपने और अपनों के लिए घर में ही रहें।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    --
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 

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    1. आदरणीय शास्त्री जी
      मेरी रचना को अपने मंच पर स्थान देने के लिए शुक्रिया
      आभार
      मनोज

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  2. बहुत बढ़िया

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    1. आदरणीय ओंकार जी
      मेरी रचना को पसंद करने के लिए शुक्रिया
      आभार
      मनोज

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