Thursday, May 7, 2026

आलिंगन

तू ही मेरी वो पाठशाला जिस नदी का मैं ठहरा हुआ किनारा l

संभली नहीं किताब वो कभी अक्स तेरा जिसमें लगे पुराना ll


पेंसिल से नाम मेरा लिख मिटाना दूरियाँ चाँद फासलों समझाना l

लिखावट सी बन गयी वो मेरी साँसों रूह ज़िल्द कागज पन्नों की ll


बेमिसाल नादानियाँ तेरी गिली रेत बनाते महल चित्र आकारों की l

अमिट छाप मोहर बन गयी इस शागिर्द के बचपन मुलाक़ातों की ll


तू ही मेरा आसमाँ तू ही चाँदनी इस बंजर पहेली आरज़ू की l

अनछुआ स्पर्श भीगते बारिश तेरी बनाई कागज कश्ती की ll


रेखा लकीरें छांव सी यादें मुलाकातें तेरे सूखे गुलाब खुशबु की l

मधुशाला कस्तुरी बन गयी वो मेरी आलिंगन अलबेले साँझ की ll

8 comments:

  1. बहुत अच्छा लिखा है मनोज जी आपने

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    1. आदरणीय जितेन्द्र भाई साब
      सुंदर शब्दों से हौशला अफ़ज़ाई के लिए तहे दिल से धन्यवाद

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  2. आदरणीया रेणु दीदी जी
    ह्रदय तल से आपका आभार, आपका प्रोत्साहन ही सही मायने में मेरी लेखनी का ऊर्जा स्त्रोत हैं

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  3. आदरणीय भाई साब
    मेरी रचना को अपना मंच प्रदान करने के लिए तहे दिल से आपका आभार

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  4. बहुत ही सुन्दर और सार्थक हृदय स्पर्शी रचना।

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  5. आदरणीया अभिलाषा दीदी जी
    ह्रदय तल से आपका आभार, आपका प्रोत्साहन ही सही मायने में मेरी लेखनी का ऊर्जा स्त्रोत हैं

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