तू ही मेरी वो पाठशाला जिस नदी का मैं ठहरा हुआ किनारा l
संभली नहीं किताब वो कभी अक्स तेरा जिसमें लगे पुराना ll
पेंसिल से नाम मेरा लिख मिटाना दूरियाँ चाँद फासलों समझाना l
लिखावट सी बन गयी वो मेरी साँसों रूह ज़िल्द कागज पन्नों की ll
बेमिसाल नादानियाँ तेरी गिली रेत बनाते महल चित्र आकारों की l
अमिट छाप मोहर बन गयी इस शागिर्द के बचपन मुलाक़ातों की ll
तू ही मेरा आसमाँ तू ही चाँदनी इस बंजर पहेली आरज़ू की l
अनछुआ स्पर्श भीगते बारिश तेरी बनाई कागज कश्ती की ll
रेखा लकीरें छांव सी यादें मुलाकातें तेरे सूखे गुलाब खुशबु की l
मधुशाला कस्तुरी बन गयी वो मेरी आलिंगन अलबेले साँझ की ll
बहुत अच्छा लिखा है मनोज जी आपने
ReplyDeleteआदरणीय जितेन्द्र भाई साब
Deleteसुंदर शब्दों से हौशला अफ़ज़ाई के लिए तहे दिल से धन्यवाद
आदरणीया रेणु दीदी जी
ReplyDeleteह्रदय तल से आपका आभार, आपका प्रोत्साहन ही सही मायने में मेरी लेखनी का ऊर्जा स्त्रोत हैं
आदरणीय भाई साब
ReplyDeleteमेरी रचना को अपना मंच प्रदान करने के लिए तहे दिल से आपका आभार
बहुत ही सुन्दर और सार्थक हृदय स्पर्शी रचना।
ReplyDeleteआदरणीया अभिलाषा दीदी जी
ReplyDeleteह्रदय तल से आपका आभार, आपका प्रोत्साहन ही सही मायने में मेरी लेखनी का ऊर्जा स्त्रोत हैं
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ReplyDeleteबहुत सुंदर रचना
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