Tuesday, November 3, 2009

भाषा

लगता है भाषा प्यार की समझ नही आती

हर छोटी छोटीबातों पे तलवार निकल आती है

ना जुबान पे कोई लगाम होती है

लड़ने को आतुर भोये तन जाती है

कड़वाहट वो भी नीम चडे करेले सी हो जो

दोस्तों को भी दुश्मन बना देती है

फिर भाषा प्यार की समझ नही आती है

गुलदस्ता

इस सुंदर गुलिस्ता में गुलदस्ता एक सजाया है

प्यार की खुशबू इसे महकाया है

काँटो को निकाल गुलाब से इसे बनाया है

गुलदस्ते की तरह खिलता रहे चमन

पैगाम ये दिलो में महकाया है

Monday, November 2, 2009

पीय की राह

पहन के हाथो में कंगन

पैरो में पायल , कानो में झुमका

लगा के माथे पे बिंदिया

बालो में गजरा ,हाथो में मेहंदी

पिया निहार रही साजन की राह

गाके मधुर मिलन राग बुला रही

साजन जी जल्दी घर आना

संग तेरे है हमको जाना

कर के सोलह श्रृंगार

कर रही हु तेरा ही इन्तजार

अब ना देर लगाओ

चंदा की चाँदनी ढल जावे

इस से पहले तुम आ जाओ

आ जाओ आ जाओ

सजन अब तो आ जाओ

नफरत

कोशिश बहुत की पर तुझ से नफरत ना कर पाया

दिल को बहुत समझाया पर इसे मना ना पाया

फासला ज्यादा था दूर जाना जरुरी था

पर लोट के तेरे पास ही आना होगा ऐ मालूम ना था

Sunday, November 1, 2009

इन्तजार

इन्तजार उनका का किया

रात ढलने को आई

शमा बुझने को आई

पर कोई पैगाम ना लायी

बैठे रहे जिनके इन्तजार में

बेमुरबत वो ना आई

ऐसी भी क्या बेरुखी दिखलाई

की एक पल के लिए उनको

हमारी याद भी ना आई