लगता है भाषा प्यार की समझ नही आती
हर छोटी छोटीबातों पे तलवार निकल आती है
ना जुबान पे कोई लगाम होती है
लड़ने को आतुर भोये तन जाती है
कड़वाहट वो भी नीम चडे करेले सी हो जो
दोस्तों को भी दुश्मन बना देती है
फिर भाषा प्यार की समझ नही आती है
लगता है भाषा प्यार की समझ नही आती
हर छोटी छोटीबातों पे तलवार निकल आती है
ना जुबान पे कोई लगाम होती है
लड़ने को आतुर भोये तन जाती है
कड़वाहट वो भी नीम चडे करेले सी हो जो
दोस्तों को भी दुश्मन बना देती है
फिर भाषा प्यार की समझ नही आती है
इस सुंदर गुलिस्ता में गुलदस्ता एक सजाया है
प्यार की खुशबू इसे महकाया है
काँटो को निकाल गुलाब से इसे बनाया है
गुलदस्ते की तरह खिलता रहे चमन
पैगाम ये दिलो में महकाया है
पहन के हाथो में कंगन
पैरो में पायल , कानो में झुमका
लगा के माथे पे बिंदिया
बालो में गजरा ,हाथो में मेहंदी
पिया निहार रही साजन की राह
गाके मधुर मिलन राग बुला रही
साजन जी जल्दी घर आना
संग तेरे है हमको जाना
कर के सोलह श्रृंगार
कर रही हु तेरा ही इन्तजार
अब ना देर लगाओ
चंदा की चाँदनी ढल जावे
इस से पहले तुम आ जाओ
आ जाओ आ जाओ
सजन अब तो आ जाओ
कोशिश बहुत की पर तुझ से नफरत ना कर पाया
दिल को बहुत समझाया पर इसे मना ना पाया
फासला ज्यादा था दूर जाना जरुरी था
पर लोट के तेरे पास ही आना होगा ऐ मालूम ना था
इन्तजार उनका का किया
रात ढलने को आई
शमा बुझने को आई
पर कोई पैगाम ना लायी
बैठे रहे जिनके इन्तजार में
बेमुरबत वो ना आई
ऐसी भी क्या बेरुखी दिखलाई
की एक पल के लिए उनको
हमारी याद भी ना आई