Wednesday, August 18, 2010

अजान

सुबह की अजान पे

खुली जब आँख

आया तेरा ही ख्याल

रहे सलामत मेरा प्यार

खुदा मेरे मेरी ये दुआ

तुम कुबूल फरमाना

मेरे महबूब को

मेरे दिल के पास ही रखना

हमारा दिल

एक तो हलकी बूंदों की छम छम

उसपे भीगे लब तेरे

देख इस शबनमी काया को

घायल कैसे ना दिल हमारा हो

अल्फाज

बड़ी नफासत से दिल के कोरे कागज़ पर

कुछ अल्फाज आप के सजदे में लिखे

संग दिल सनम ने पैगाम का जबाब लिखा

लिखावट है आप की

पर अल्फाज किसी ओर के

इसलिए आपसे फिर प्यार कैसे हो

दूर

हो जब हाथों में हाथ किसीका

मंजिल फिर कैसे दूर हो

हो जो वो सबसे अजीज

तो फिर कैसे वो दिल से दूर हो

रोना

जब कभी मन हुआ रोने को

बारिस में निकल पड़ा

वर्षा की बूंदों में आंसू घुल गए

किसीको ख़बर भी ना हुई

हम रो के घर अपने चले गए