Thursday, June 2, 2011

वरदहस्त

सर पे प्यार से किसीने रखा जो हाथ

गुमनाम अनजान को

वरदहस्त मिली छत्र छाया

इस परोपकार ने बदल दिया

उस अनजान का जीवन सारा

Saturday, May 21, 2011

वाणी

ओजस्व वाणी बहे जिनके मुखारबिंद से


बन श्रृंगार रस की मुधर धारा


उनके ह्रदय कण कण विराजे


प्रेम अनुराग की धारा


स्वयं सरस्वती विराजे


इन मधुर कंठ की छाया


बहे फिर कैसे नहीं


मीठे रस से भरी


प्रेम रस की भाषा

डर

अंतरमन की व्यथा कहने से डरता हु


गैरों के उपहास से


क्रोधाग्नि में जलने से डरता हु


हां मैं स्वीकार करता हु


मैं डरता हु


आत्मसमान की खातिर


आत्मग्लानी में जलने से डरता हु


जिन्दा रहने की लिए


मरने से डरता हु


हां मैं डरता हु

दोष

पुलिंदा शिकायतों का


गफलत ही गफलत


कसर ही कसर


ध्यान केन्द्रित नहीं


भूल अपनी स्वीकारे नहीं


औरो के सर


दोष मडने से चुके नहीं


लापरवाह बेरुखी से


किसी कार्य का निष्पादन नहीं

अधूरी हसरतें

जुदा हो गयी फिर राहें


अधूरी रह गयी


फिर सब हसरतें


सितम वक़्त ने


फिर ऐसा किया


मिलाके बिछड़ने को


फिर से मिला दिया


सुलगते अरमानों को


फिर से बुझा दिया


ह़र लहमों को फिर से


अनजाना बना दिया