Thursday, December 13, 2012

घटायें

बड़ी ही असमंजस की है ये बात

चलती है घटायें मेरे साथ भी

कुछ पल को ठहर जाऊ जो कहीं

रिम झिम बरस जाती है घटा वही

इसे महज ये इतेफाक कहूँ या संजोग

कुदरत की है पर ये अद्भुत देन

मरुभूमि की प्यासी धरती में भी

घुमड़ आती है घटाओं की छाया

जब पड़ते है चरण वहाँ

बदल जाती है वहाँ की साया

पर सच है यही 

चलती है घटायें मेरे साथ भी





 

युवा चाहत

युवा दिखने की चाह अभी है बाकी

बुड़ापे की है ये निशानी

इस मर्ज की अवधी है बड़ी निराली

बहक जाती बुड़ापे में जवानी है

नकली बाल और दाँतों के संग

युवा दिखने की पूरी है तैयारी

देख हसीन चहरों को

हिलोरें मारे जवानी है

हाथों में लाठी

आँखों में लाली

ललक मटरगस्ती की

पर अभी तलक है बाकी

बुझते चिरागों में

रौशनी की लौ अभी है बाकी

निहारे दर्पण खुद को

कामना ऐसी अभी है बाकी

युवा दिखने की चाहत अभी है बाकी 



 

वरण

हरण किया जिसने इस दिल का

वरण उसे करने की है तारीख आयी

डाल बाहों का हार गले में

कसमे खायी साथ निभाने की

बना चाँद को साक्षी

रस्मे पूरी कर डाली

समर्पित हो एक दूजे को

दो जिस्म पर जान एक बना डाली

न फेरे न बाराती

पर मेघा फूल बन बरस आयी

स्वयंवर से भी हसीन यह पल

यादगार मिलन बेला बन आयी

था इन्तजार जिस पल का

वो शुभ बेला चली आयी 

दिलों के तार

सज गए दिलों के तार

तड़पती रूह हो गयी शान्त

चलने लगी फिर से जैसे साँस

धडकनों में आ गए जैसे प्राण

मिला जो सुर को साज का साथ

सज गए दिलों के तार

छाने लगी मदहोशी की खुमार

सुनायी देने लगी प्रेम राग

बदल गयी रूह की चाल

पूरी हो गयी जैसे कोई तलाश

मिला धडकनों को

जो संगीत का साथ

सज गए दिलों के तार 

Friday, December 7, 2012

निगाहें

निगाहें जाने क्यों शरमा जाती है

देख खूबसूरती को अदब से झुक जाती है

पलके बंद कर तारुफ़ वया कर जाती है

जो लफ्ज लव सहज कह ना पाए

आँखों ही आँखों में वो बात कह जाती है

अंदाज ये निगाहों का दिल में उतर

प्यार के परवान चढ़ जाती है

निगाहें जाने क्यों शरमा जाती है