Tuesday, April 9, 2019

सारांश

संक्षेप में वृत्तांत सुनाऊ

सार का सारांश बतलाऊ

परिदृश्य कोई भी हो

किनारा भूमिका मंडित कर

मूल आलेख जागृत कर पाऊ

आक्षेप कोई लगे ना दामन

रचना सहज वर्णन कर पाऊ

ताम्रपत्रों पर गूँथ शब्दों को

लेखनी अमर कर पाऊ

सृजन कर भाव भंगिमा

पटककथा व्यक्त कर पाऊ

सिद्धांत अभिव्यक्त मंच पटल

प्रेरणा स्त्रोत्र प्रदान कर पाऊ

सुगम सरल परिभाषा में

गुड़ सार पूर्णतः बयां कर पाऊ

ख्वाईश है कोशिश सफल कर

चाँद सितारों में शुमार हो जाऊ   

Sunday, April 7, 2019

तन्हाईयाँ

कभी अपनी तन्हाईयों में

हमें याद करना तुम

गल मिल रोयेंगे दोनों खूब

उदासी के उस आलम में

दिल की किताब खोले रखना तुम

लहू से रंगें अक्षरों में

सूखे गुलाब तलाशेंगे हम तुम

अनमोल हो जायेंगे यादों के हर सबब

मिलेंगे जब दो बिछड़े हमसफ़र

ना तुम कुछ कहना ना मैं कुछ कहूँगा

इस इंतज़ार को सिर्फ आँखों से बयाँ करेंगे हम तुम

टूटे हुए अरमानों को

हर अहसासों में जिन्दा रखेंगे हम तुम

वादा बस इतना करो तुम

अपनी तन्हाईयों में हमसे मिला करोगे तुम

हमसे मिला करोगे तुम   

पाणिग्रह

लिख लाया मैं अपने वो अल्फ़ाज़

मिला ना जिन्हें इन लबों का साथ

अहसास तुम भी कर लो

छू इस ख़त को अपने हाथ

नयनों में तेरे कैद हैं

मेरे दीवाने दिल के हर अरमान

महक़ तेरे यौवन की

मदमाती लहराती जुल्फों की

छेड़ गयी इस दिल के तार

आओं कर ले अब एक दूजे को अंगीकार

और जीवन भर के लिए

जुड़ जाये पाणिग्रह संस्कार

जुड़ जाये पाणिग्रह संस्कार

बग़ावत

धैर्य रख धीरज धर

आँसुओं की बग़ावत में

नयनों को शामिल मत कर

गुजर जायेगा यह पल भी

बस तम में उजाले की प्रार्थना कर

तुम जैसे विरलों की कैसी यह रुन्दन पुकार हैं

अश्क तो कमजोरों की पहचान हैं

चाहें जितने भी चले जुबाँ के बाण

हावी मत होने दो तुम अपने जज़्बात

एक पल के लिए विवेक को बना लो

अपने समर का हथियार

जीत जाओगें रण के हर मैदान

बग़ावत कर विद्रोह कर अपने जज्बातों के ख़िलाफ़

अपने जज्बातों के ख़िलाफ़   

गुमराह

गुमराह हो गयी राहें ख़फ़ा हो मुझसे

बीच चौराहें खड़ा रहा मग्न अपनी धुन में

ठहर गयी मंज़िलें ग़ुम हो गए रास्तें

अम्बर नीला धरा सुनहरी

ख़ोज रहा दिल मरुधर में मोती

भूल गया सागर बीच मिले हैं मोती

मन चिंतन भटक रहा गली गली

कभी चले दो कोश कभी पकड़े पगडंडी

कैसी यह विडम्बना कैसी यह पहेली

सिर्फ़ चाँदनी लग रही सखी सहेली सी

मूँद आँखे खोल दिल के छोर

गणना करने लगे मन चितचोर

किस राह पकड़ूँ मिल जाये क्षितिज का मोड़

छू लूँ अम्बर चूम लूँ पर्वत शिखर

निकाल लूँ मरुधर के सिप्पों से भी मोती

मिल जाये राहें अगर फ़िर वो अनोखी

गुमराह हो गयी थी जो कर मन चोरी