इल्म इसका नहीं
उनकी गुनाहों का मैं सजायाफ्ता हो गया
बस
तारीख़ की तहरीर में इश्क़ बाग़ी हो गया
अमल किया जिस तामील को खुदा मान
निगाहों के क़ातिल का वो तो आफ़ताब निकला
खुली जुल्फों की कैद में
कतरा कतरा लहू कलमा इश्क़ लिखता चला गया
बड़ी नफ़ासत नजाकत से सँवारा था जिसे
क़त्ल ए गुनाहों में वो दिल भी शरीक हो गया
कब ऐ मासूम नूर ए अंदाज़
उनकी क़ातिल निगाहों का शिकार हो गया
खुदा को भी इसका अहसास हो ना पाया
और बिन गुनाह किये ही मैं
उनकी हसीन गुनाहों का सजायाफ्ता हो गया
सजायाफ्ता हो गया
उनकी गुनाहों का मैं सजायाफ्ता हो गया
बस
तारीख़ की तहरीर में इश्क़ बाग़ी हो गया
अमल किया जिस तामील को खुदा मान
निगाहों के क़ातिल का वो तो आफ़ताब निकला
खुली जुल्फों की कैद में
कतरा कतरा लहू कलमा इश्क़ लिखता चला गया
बड़ी नफ़ासत नजाकत से सँवारा था जिसे
क़त्ल ए गुनाहों में वो दिल भी शरीक हो गया
कब ऐ मासूम नूर ए अंदाज़
उनकी क़ातिल निगाहों का शिकार हो गया
खुदा को भी इसका अहसास हो ना पाया
और बिन गुनाह किये ही मैं
उनकी हसीन गुनाहों का सजायाफ्ता हो गया
सजायाफ्ता हो गया