Thursday, August 15, 2019

सजा

इल्म इसका नहीं

उनकी गुनाहों का मैं सजायाफ्ता हो गया

बस

तारीख़ की तहरीर में इश्क़ बाग़ी हो गया

अमल किया जिस तामील को खुदा मान

निगाहों के क़ातिल का वो तो आफ़ताब निकला

खुली जुल्फों की कैद में

कतरा कतरा लहू कलमा इश्क़ लिखता चला गया

बड़ी नफ़ासत नजाकत से सँवारा था जिसे

क़त्ल ए गुनाहों में वो दिल भी शरीक हो गया

कब ऐ मासूम नूर ए अंदाज़

उनकी क़ातिल निगाहों का शिकार हो गया

खुदा को भी इसका अहसास हो ना पाया

और बिन गुनाह किये ही मैं

उनकी हसीन गुनाहों का सजायाफ्ता हो गया

सजायाफ्ता हो गया   

Sunday, August 4, 2019

तलाश

किरदार अपना तलाश रहा हूँ

जमाने की ठोकरों में बचपन अपना तलाश रहा हूँ

धधक रही ज्वाला जो इस दिल में

पूर्णाहुति में उसकी यादें अपनी तलाश रहा हूँ

बरगद की छावं में कागज़ की नाव में

ठिकाने ठहाकों के तलाश रहा हूँ

उड़ा ले गए वक़्त के थपेड़े जिन लम्हों को

आँखों में औरों की सपने वो तलाश रहा हूँ

आवारा बादलों में चाँदनी के नूर में

अक्स चाँद का तलाश रहा हूँ

कुछ और नहीं

उम्र के इस पड़ाव पर

खुदा बन

खुद में खुद को तलाश रहा हूँ

खुद में खुद को तलाश रहा हूँ   

Wednesday, July 10, 2019

पता

ठिकाने को उनकी रजामंदी क्या मिली

पता अपना मैं भूल आया उनके पते पे

अब खत लिखुँ या भेजूँ संदेशा

मशवरा कैसे करूँ इन घरोंदों से

मौसम जो बदला आशियानें का

ख्याल ही ना रहा कब छूट गए पीछे

पते बचपन के संगी यारों के

मदहोश ऐसा किया उनकी शोख अदाओं ने

मानो गुज़ारिश कर रही हो

खत एक तो लिखूँ नए ठिकाने पे

अफ़सोस मगर

मेरी नई रह गुज़र की डगर पर

पता उनका भी अधूरा था मेरी मंज़िल की राहों पर

और ना जाने कब कशिश की इस कशमश में

अपना पता भी मैं भूल आया उनके पते पर

अपना पता भी मैं भूल आया उनके पते पर

Tuesday, July 9, 2019

नज़रअंदाज़

हुनर ना आया उन्हें नज़रअंदाज़ करने का

स्वांग रचा मशरूफ होने का

पर अंदाज़ गुस्ताख़ नयनों का

दिल ए नादान संभाल ना पाया

फिसल गया

देख कायनात में  जन्नत की माया

रूह लिख रही थी जैसे

हर तरफ आयतों का साया

कलमा था वो बड़ा ही पाक ए नबीज़

गुनगुना रही थी जो वो दिल ए अज़ीज़

मशगूल थी वो अपनी ही धुन में

भूल बैठी थी

दिल भी वही कही है करीब में

वही कही है करीब में 

Friday, July 5, 2019

महत्वकांक्षा

बदलती फ़िज़ाओं ने मंज़िल का रुख मोड़ दिया

खुबसूरत पैगाम संदेशा मीठा सा सुना गया

एक नयी सुबह से करुँ एक नया आगाज़

कर लूँ दुनिया मुट्ठी में छू लूँ नीला आकाश

आसमाँ से आगे मंज़िल कर रही मेरा इंतजार 

कामयाबी के हर कदम लिखूँ एक नयी कहानी

उड़ चलू महत्वकांक्षा के उड़न खटोले पे हो सवार

मिल जाए मंज़िल को मन चाहा क्षतिज का आधार

आलिंगन करने धरा उतर आये अम्बर और आकाश

धूप छावं की चाल में फिसल ना जाऊ राह में

अटल मज़बूत इरादें लिए निकल जाऊ राह में

चूमने सफलता के कदम एक रोज

मंज़िल नतमस्तक होगी धूल भरे पाँव में

मनन कर इस बेला को इसी पल

आत्मसात कर जाऊ मंगल मंज़िल बेला को 

मंगल मंज़िल बेला को