Thursday, November 23, 2023

साथ साथ

अलसाई सुबह की अंगड़ाई लेती चुस्की l

नचा रही मन पानी दर्पण अंतराल साथ ll


भींगी ओस नमी ख्यालों की ताबीर खास l

मूंद रही नयनों को जगा रही फूलों साथ ll


ख्वाबों की बेफिक्री सी दिलकशी उड़ान l

परिंदों सी लुभा रही दिखा नये अंदाज ll


लिहाफ़ गर्माहट भरी छुपी छुपी गुदगुदी रात l

ठिठुरती करवट बदलती काया बन बारात ll


बादलों झुरमुट रुबाई तन्हा मंजर बरसात l

आरज़ू ग़ज़ल संवरे अधूरे सहर साथ साथ ll


खिली धूप परछाई शरमाई गुलाब पंखुड़ियां नाल l

खोल गयी कई पोल कपोल कड़ियां एक साथ ll


Monday, November 6, 2023

आत्मबोध

मौन स्तब्ध स्वीकृति लिए स्पर्श जो था एक अजनबी स्पंदन का l

मानो इश्क़ इजहार था माधुर्य मधुरम आत्मबोध अभिनन्दन का ll 


निश्छल कल कल रगों बहती इसकी प्रेरणा थी जीवनदयानी सी l 

तल्लीन मुग्ध तिल्सिम में सुखद फिर भी लगी थी इसकी ये छाँव ll 


पथिक सा इस पगडण्डी चल छूने लगा सप्त सुरों के सरगम साज l 

सम्मोहित इसमें साँसों की आस अभिनय सा था गुलजारों का साथ ll 


वैदेही अभिलाषा आतुर सी संजो रही पल छीन एक नया आकार l 

मिला रंग गयी जैसे अपने रंगों मेरे रूह में अपनी खनक आवाज़ ll  


सिमट गयी सारी खुशियों की दुनिया इस गुलमोहर खुशबू अंदाज़ l 

अपनत्व अहसास सीखा गया गुलज़ार मोहब्बत के हसीन अंदाज़ ll 


अनुभूति सहज सरल इस एकाकी पहेली पहलु उस किरदार की l 

बिन साँसे धड़कना सीखा गयी थी किसी ओर के दिल ओ साज में ll

Monday, October 2, 2023

उन्माद

इश्क में उसके बार बार हर बार उजड़ा हूँ l

दरख्तों के पतझड़ शायद सावन नहीं पास ll



टूट बिखरा इसकी फ़िज़ाओं अनगिनत बार l

दिल फिर भी ना सुने इन कदमों की आवाज ll



रंग वो दूर था कही ना जाने क्यों बादलों पार l

चाँद ने दाग तिल छुपा रखा जैसे कोई राज ll



उन्माद इश्क नचा रहा हर चौबारे की गली गली फांस l

घुँघरू की तरह बजता गया उसके कदमों धूलो आस ll



सब्र इम्तिहान उजड़ उजड़ बिखरता इश्क लहू साथ l

अश्कों प्रीत सागर गहराई समा गयी इसके साथ ll



सूराख आसमाँ इश्क आँचल छू गया दिल के तार l

बहक गया मन एक बार फिर बिखर जाने के बाद ll

Friday, September 8, 2023

प्रफुल्लित निंद्रा

तपती रेगिस्तानी रेत में छाले उभरे नंगे पांव में l

निपजी थी एक जीवट विभाषा इसके साथ में ll


बुलंद कर हौसलों को बढ़ता चल यामिनी राह पे l

विध्वंशी लू थपेड़े पराजित से नतमस्तक साथ में ll


मृगतृष्णा प्यासी इस धरोहर पिपासा रूंदन नाद में l

सुर्ख लहू भी जम गया बबूल की सहमी काली रात में ll


खंजर चुभोती तम काली घनी कोहरी डरावनी छांव में l

रुआँसा उदास अकेला रूह अर्ध चाँद परछाई साथ में ll


कुंठित मन व्याकुल अभिलाषा अधीर असहज वैतरणी नाच में l

धैर्य धर अधरों नाच रही फिर भी निंद्रा प्रफुल्लित अपने साथ में ll

Sunday, September 3, 2023

सगर

गुजारी थी कई रातें ख्वाबों के सिरहाने तले l

सितारों की आगोश में चाँदनी लिहाफ तले ll



फिर भी तवायफ सी थी ख्वाहिशें धड़कनों की l

राहों टूटे घुँघरू पिरो ना पायी माला साँसों की ll



बंदिशें कौन सी क्यों थी जाने चाँद की पर्दानशी में l 

बेपर्दा जो कर ना पायी पलकों तले थे जो राज छुपे ll



दूरियों के अह्सास में भी जैसे कोई आहट साथ थी l

फुसफुसा रही हवा झोंकों में कुछ तो खास बात थी ll



मिली थी जो कल फिर उसी चौराहे बरगद छाँव तले l

परछाई की उस रूमानी रूह में कोई रूहानी साँझ थी ll



आकार निराकार था उस प्रतिबिंब के दर्पण नजर में l

फिर भी हर अल्फाजों में उसकी ही बात सगर थी ll