Thursday, April 2, 2015

नाता

अरमानों को लफ्ज़ दू तो

दिल रोता है

पर मुस्कराके नये सपनें फिर बुनता है

इल्म नहीं मुझे इसके रोने का

इसलिये हर लफ्जों में जज्बात पिरोता हुँ

अरमानों की डोली

दुःखों की सेज पे भी हसीन बने

इसलिये पाने बचपन को फिर से

पल पल मचलता हुँ

हर रंगों की एक नयी कहानी हो

हर लफ्जों की एक नयी जुबानी हो

इसी कशमश में

सपनों से दूर चला जाता हुँ

पर खाब्ब की कशिश से

नाता तोड़ नहीं पाता हुँ

नाता तोड़ नहीं पाता हुँ

Wednesday, March 4, 2015

मेरी बिटिया

खुदा  का नूर है तू

मेरी बगियाँ का फूल है तू

सागर सी चंचल है तू

मेरे आँगन की शोभा है तू

राधा की मूरत है तू

इनसे बढ़कर

मेरा गरूर है तू

और

कभी रंगो में रंगी

कभी रागों में सजी

मेरी राग रागिनी है तू

मेरी बिटिया रागिनी है तू

Monday, March 2, 2015

खबर

खबर ना तेरे आने की थी

ना जाने की थी

हम तो आहटों पे

कान लगाये बैठे थे

पदचाप की पर ना कोई सरसराहट थी

सुनने तेरी आहट को

धड़कनें भी खामोश थी

दस्तक तू दे जाये इस दिल में

दुआ खुदा से बस इतनी थी

जिनकी हर अदाओं में कुदरत बरसे

वो कायनात मेरी आरजू थी

साहिल के करीब मंज़िल थी

पर प्यार की कस्ती अब भी कोशों दूर थी

क्योंकि इस दिल को

अब तलक तेरी कोई ना खबर थी

तेरी कोई ना खबर थी

आरजू

आरजू बस इतनी सी है की

हर पल रंग बदलती आरजूओं की

आरजू बस अब ओर नहीं

सुलगते अरमानों के शोलों से

जलने की आरजू ओर नहीं

चाहत की चाह में लूटने की

आरजू अब ओर नहीं

नयनों से नयनों के मिलन की

आरजू अब ओर नहीं

चंदा की चाँदनी को खोने की

आरजू अब ओर  नहीं

क्योंकि प्यार भरे दिल

के घरौंदे से निकलने की

आरजू कभी नहीं

इसलिए आरजू बस इतनी सी है

हर पल रंग बदलती आरजुओं की

आरजू बस ओर नहीं

Thursday, February 12, 2015

अन्धकार

प्यार की तड़प में नयनों से जब अश्रु धारा बहती है

लहू भी तब सिरहन जाता है

अन्तर्मन से निकली यह वेदना

जब करती है

चितत्कार के पुकार

करुण धारा भी बन जाती है तब प्रलय तूफ़ान

उजड़ जाता है मानो जैसे सारा संसार

ओर पसर जाता है वीरानगी का अन्धकार   

ओर पसर जाता है वीरानगी का अन्धकार