Thursday, November 12, 2015

अकेला

जमघट था यारों का

मगर अकेला खड़ा था तन्हाई में

गुम थी परछाई भी

अकेला खड़ा लड़ रहा था तन्हाई से

खामोश हो चुकी थी जुबाँ भी

पथरा गयी थी आँखें भी

लफ्ज कोई मिल नहीं रहे थे

लव जैसे खुल नहीं रहे थे

इस पल संग किसीका ना था

नजारा कुछ ऐसा था

सब कुछ होते हुए भी

पास अपने कुछ ना था

पास अपने कुछ ना था

चाहत तेरी

जो तू ग़ज़ल ना होती मेरी

शायद मैं भी तब शायर ना होता

अंदाज़ ए शोखियों पे तेरी

कलमा कोई ना पढ़ रहा होता

रूह जो तू ना होती इस शायर की

ख़लिश शायरी मुक़म्मल ना होती

मिली जब से जिंदगानी तेरी

इबादत बन गयी तू मेरी

कबूल हो गयी जैसे फ़रियाद कोई

शायद इसिलये

खुदा बन गयी चाहत तेरी

खुदा बन गयी चाहत तेरी

Sunday, October 11, 2015

दीवार

ये गम तू कुछ इस तरह मुस्करा

बबंडर

ग़मों की आँधियों के

मंजिल अपनी भटक जाए

और खिलखिलाती धूप भी

सौगात में

आँसुओ की ताबीर लिए चली आए

माना मुश्किल बड़ा ही यह इम्तिहान

पर छोड़ दिया जो कफ़न एक बार

बिन जनाजे ही

दफ़न हो जायेंगे सारे गम गुब्बार

ले आयेगा सकून

आँसुओं की फुहार

और बहा ले जायेगा संग अपने

हर रंजो गम की दीवार

Tuesday, September 22, 2015

ख़ौफ़

मैं पानी पे नाम उसका लिखता रहा

वो रेत के महल बनाती रहीं

सपनों की इस डोर को

लहरों का ख़ौफ़ ना था

रिश्तों की इस माला को

बिखरते घरोंदों का रंज ना था

थी बस एक ही लगन

चाहे उजड़ते रहे आशियाँ

मिटते रहे नामोनिशां

मगर सपनें आँखों में

यूँ ही बस पलते रहे

ओर सपनें बस यूँ ही पलते रहे




Sunday, September 20, 2015

अधूरा मिलन

तराशा था जिसे खाब्बों में

तलाशता फिरा उसे फिर ज़माने में

पर मिला ना कोई ऐसा अब तलक इस जमाने में

रंग भर दे जो उस मूर्त में

तराशी थी जिसकी सूरत खाब्बों में

यूँ तो सितारें अनेक मिले राहों में

पर चाँद वो नजर ना आया

तराशा था जिसे खाब्बों में

माना हुस्न की कमी ना थी ज़माने में

मगर वो ना मिली

तस्वीर जिसकी बसी थी आँखों में

गुनाह यह दिल का था या आँखों का

गुमान इसका ना था

पर चाहत का यह कैसा अहसास था

अरमानों से तराशा था जिसे

रंग उसके

आज भी तलाशता फिर रहा हूँ राहों में

आज भी तलाशता फिर रहा हूँ राहों में