Sunday, May 14, 2017

भीड़ में

अक्सर मैं ख्यालों में खोया रहा

पहेली बन ख़ुद को टटोलता रहा

कभी सपनों की उड़ानों में

कभी उलझनों के नजारों में

पहचान ख़ुद की तलाशता फिरा

गुम रहे विचारों की ताबीर में

पर रूबरू खुद से कभी हो ना सका

उधेड़ बुन की इस कशमकश में

मैं भी शायद तन्हा खड़ा था

दुनिया की इस भीड़ में

दुनिया की इस भीड़ में

Wednesday, April 12, 2017

उम्र कैद

गुनाह मेरे ख्बाबों का कहा था

शरारत भी उनकी मासूमियत भरी थी

पेंच लड़े नयनों के थे

पतंग पर वो दिल की काट गए थे

लावण्य उनके रूप का ना था

फ़िज़ा में बहार उनके चिलमन की थी

गुलाब सी खिलती, इत्र सी महकती, हँसी उनकी

अनजाने में जुर्म ए करवा गयी

आजीवन उम्र कैद की बेड़ियाँ इन हाथों को पहना गयी


इन हाथों को पहना गयी

Sunday, March 19, 2017

अंशदान

वो ठहराव ही ना मिला जिसका इंतजार था

माना धाराओं का वेग कही शांत तो कही प्रचंड था

पर लहरों के थपेड़ों से टूटते

किनारों का मंजर ही सिर्फ सामने था

हर गुजरते लहमों का इसे बखूबी अंदाज़ था

पर कहने को भी पास अपने

इस जिंदगानी का हिसाब ना था

कभी दरख़्तों में तो कभी पर्वतों में

खो जाने का जूनून जो साथ था

पास इसके भी मगर

बिखरी मंजिलों का सच साथ था

शायद रूह का

आँधियों से लड़ने का हौसला पस्त था

चमक भी वो विलुप्त सी प्रतीत थी

समर बेंधने की कला में जिसे पारंगत हासिल थी

शून्य भँवर का वेग भी

कुछ ऐसा ही गतिमान प्रतिबिंबित सा था

साधना पल, ध्यान भी मानो

रूह से अपनी विरक्त सा था

ठहराव की इस व्यथा में

मानो सृष्टि की संरचना का भी

अपना कुछ अंशदान सा था

कुछ अंशदान सा था

Wednesday, March 1, 2017

मुरीद

दिल के किसी कोने में यह सुगबुगाहट सी थी

अल्फाजों से अब वो गर्माहट नदारद थी

जिंदगी कभी जिसकी मुरीद हुआ करती थी

धड़कने भी वो अब बेईमानी सी थी

वो शौखियाँ वो चंचलता

लफ्जों से जैसे अब महरूम सी थी

मानो रूठी साँसे कुछ इस तरह ख़फ़ा सी थी

रूह अपनी भी जैसे अब परायी सी थी

चित भी नितांत अकेला सा था

क्योंकि

इस एकांत की ख़ामोशी तोड़ने वाली

धड़कनों का शोर भी अब जैसे मौन था

अल्फ़ाज अब उन लबों से जैसे कोशो दूर थे

अक्सर जिनपे लफ़्ज

इन धड़कनों के ही सजा करते थे

इन धड़कनों के ही सजा करते थे

Wednesday, February 8, 2017

शहर की हवा

मुझको तेरे शहर की हवा लग गयी

गली गली चर्चा यह आम हो गयी

बदनामी इसमें फिर कैसी

बस मेरे इश्क़ कि आगाज़ सरेआम हो गयी

मुझको तेरे शहर की हवा लग गयी

नक़ाब तेरा रुख से उड़ा हवा जो अपने साथ ले गयी

नजरें तेरी दिल मेरा अपने साथ ले गयी

गली गली चर्चा यह आम हो गयी

मुझको तेरे शहर की हवा लग गयी

तेरे मोहल्ले की गालियाँ मेरी पनाहगार बन गयी

फ़ासले तेरे मेरे दरमियाँ कही खो गयी

गली गली चर्चा यह आम हो गयी

मुझको तेरे शहर की हवा लग गयी