Tuesday, December 26, 2017

इत्र सी हसरतें

हसरतें कुछ ऐसी पाल ली मैंने

अंगारों से जैसे दोस्ती करली मैंने

दहकते शोलों की चिंगारियां

लपटों की ज्वाला बन भभक आयी जैसे  

अब ओ आसमां मंज़िल ना थी मेरी जैसे

भरने अधूरेपन को

लगन की कवायद संग थी जैसे मेरे

आतुर थी लालसायें मेरी

छूने विषमताओं की जिज्ञासायें मेरी

बदल गयी थी दुनिया मेरी सारी

फिजाओं की बयार में घुल रही थी

इत्र सी हसरतें जैसे मेरी सारी 

इत्र सी हसरतें जैसे मेरी सारी


Wednesday, December 20, 2017

मेरी कहानी

फुर्सत मिले कभी तो ए ख़ुदा

तुम भी पढ़ना मेरी कहानी की मोड़

छूने सपनों को बेचैन रहती थी

कभी मेरी भी अल्हड़ जिंदगानी की सोच

पर वक़्त ने समय से पहले ही काट दी थी

इनके उड़ते पतंगों की डोर

ढल गया था रक्तरंजित सा सूर्य

छिपाये क्षितिज में गुमनामी की ओट

मक़सद पास फ़िर जीने को रहा नहीं

इसलिए हिसाब तुझसे करने

लिख डाली मैंने अपनी कहानी की छोर

फुर्सत मिले कभी तो ए ख़ुदा

तुम भी पढ़ना मेरी कहानी की मोड़

तुम भी पढ़ना मेरी कहानी की मोड़







 

Thursday, December 14, 2017

गुमनाम हसरतें

गुमनाम हसरतों को यूँ आवाज़ ना दो

ऐ जिंदगी कुछ सब्र करो

फ़कीरी कहीं तमाशा ना बन जाए

चादर मैली समझ किस्मत ठुकरा ना जाए

गुजारिश इसलिए बस इतनी सी हैं

उन गुमनाम हसरतों को यूँ आवाज़ ना दो

ऐ जिंदगी एक पल को तो ठहरो

कहीं बेपनाह अरमानों के गागर से

अश्कों के सागर छलक ना जाए

महफ़ूज हैं अब तलक जो दिलों के अंदर

रोशन कुछ पल उन्हें ओर रहने दो

ऐ जिंदगी जब तलक संभल ना जाऊ

उन गुमनाम हसरतों को यूँ आवाज़ ना दो

उन गुमनाम हसरतों को यूँ आवाज़ ना दो 

Tuesday, November 28, 2017

गुलाब

लाख जतन की हमनें इश्क़ छुपाने की

पर उनके दिए गुलाबों ने

खुश्बू चमन में ऐसी बिखरा दी

बात जो अब तलक जो दिलों की दरम्यां थी

अब वो हर महफ़िल में चर्चें ख़ास हो गयी

यारों क्या अब करे

जिन गुलाबों को बड़ी हिफाज़त से छुपा

नज़राना इश्क़ जो उन्होंने पेश किया

बिन कहे ही

रंगो ने उनके चमन को गुलज़ार कर दिया

गुलाब ने अपनी खुश्बुओं से

हमारी चाहत को भी एक नाम दे दिया

Sunday, November 26, 2017

अकेली नींद

सपनों के आगे नींद मुक़म्मल होती नहीँ

हकीक़त से परे

बारात ख़्वाबों की थमती नहीं

परवाज़ अरमानों की

छूने गगन कम होती नहीं

नींद दर्पण हैं ख्वाइशों का

गल ए गले मिलती नहीं

बिखर ना जाए कही अरमानों के रंग

ऊहापोह के इस द्वन्द से संधि होती नहीं

नींद अकेली भी अब क्या करे

झूटे वजूद के बिना ए भी कटती नहीं

झूटे वजूद के बिना ए भी कटती नहीं