Friday, August 10, 2018

किस्मत

उम्र पीछे छूट गयी

रफ़्तार जिंदगी की

बचपन चुरा ले गयी

वो आसमानी छटा

वो सावन की घटा

बस यादें पुरानी

दिल की किताबों में सिमट रह गयी

सपनों की वो मंज़िल

चाँद सितारों सी हो गयी

कभी पास तो कभी दूर

मानों हाथों की लकीरों से

सपनों की ताबीर दूर हो गयी

नीलाम हो गयी वो मासूमियत भी 

छलकती थी लड़कपन में जिनके

शरारतों भरी छटपटाहट

छोड़ उम्र की उस दहलीज को

विदा हो गयी रूह

बदल किस्मत की लकीरों को


1 comment:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (12-08-2018) को "बता कहीं दिखा कोई उल्लू" (चर्चा अंक-3061) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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