Friday, August 17, 2018

अधूरे अल्फ़ाज़

कुछ अल्फ़ाज़ अधूरे से हैं

कुछ गीत अधूरे से हैं

वो अगर मिल जाये तो भी

कुछ खाब्ब अधूरे से हैं

खुली किताबों सी हैं ए कहानी

दीवारों पे उकेरी हो

जैसे कोई अधूरी सी चित्रकारी

अब तलक अधूरी हैं वो जिंदगानी

देखि थी जिसने कभी

निगाहों की मेहरबानी

कुछ रस्म कुछ रिवाज

चुरा ले गए थे दिल के आफ़ताब

बिछड़ गयी थी चाँदनी

अधूरे रह गए थे अरमान

जैसे ही ली रंगों ने करवट

बदल गए थे सारे अंदाज़

इस बेखुदी में ख़ामोशी से

बस हम तकते रह गए आसमान 

5 comments:

  1. सुंदर कविता

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  2. बिछड़ गयी थी चाँदनी

    अधूरे रह गए थे अरमान

    बहुत खूब

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  3. जय मां हाटेशवरी...
    अनेक रचनाएं पढ़ी...
    पर आप की रचना पसंद आयी...
    हम चाहते हैं इसे अधिक से अधिक लोग पढ़ें...
    इस लिये आप की रचना...
    दिनांक 21/08/2018
    को
    पांच लिंकों का आनंद
    पर लिंक की गयी है...
    इस प्रस्तुति में आप भी सादर आमंत्रित है।

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  4. बहुत कुछ अधूरा सा है ... जो असहज कर जाता है ।।.

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