Friday, August 14, 2020

अजनबी महरबा 

देख मुझे ऑनलाइन तुम ऑफ लाइन हो जाती हो l

डीपी बदलते ही सबसे पहले लाईक कर जाती हो ll


व्हाटस एप स्टेटस हो या फेस बुक l

कमेंट के नाम ठेंगा दिखा जाती हो ll


तुम कहती हो कोई खास रूचि नहीं l

फिर भी मेरी तस्वीरों को डाउनलोड करती जाती हो ll


भूल गयी तुम टेक्नोलॉजी ने युग बदल डाली हैं l

प्रोफाइल विजिट की ईमेल तुरंत मुझको पंहुचा जाती हैं ll


कैसे निहारु तुझे ऐ अजनबी महरबा l

तूने अपनी डीपी में भी तस्वीर मेरी जो लगा डाली हैं ll

Wednesday, August 12, 2020

कहानी

कहानी अपनी कुछ कुछ मिलती जुलती सी है l

इश्तिहारों से सजी जैसे कोई जुगलबंदी सी हैं ll


पर एकबारगी गिरवी क्या रख दिये l 

डैने जैसे फड़फड़ाना ही भूल गये  ll


निशान गहरे सजे थे तन गलियारों में l

निशां लम्बी थी खोये हुए मझधारों में ll


दर्पण भी पहचानना भूल गयी l 

घेर लिया उत्कंठि ज्वालाओं ने ll 


बेदखल हूँ क्षतिज के हर अरमानों से l

मौन स्तब्ध हूँ अपने ही साये से ll


तू भी निःशब्द जकड़ी जंजीरों में l

टिमटिमा रही हो जैसे मज़बूरी में ll


एक सहमी चीत्कार हैं अपनी बंदगानी में l

मिलती जुलती सी फ़रियाद हैं तेरी मेरी कहानी में ll

Tuesday, August 11, 2020

शुन्य

चाहा था एक रोज समेट लूँ दुनिया सारी l

चाहत अब बस हैं इतनी सी समेट लूँ अपनी साँसे सारी ll

 

वेदना सृजन श्राप सी लगने लगी l

कष्ट मृदु वरदान सी लगने लगी ll

 

अल्प हैं राह फरियाद के पड़ाव की l

संख्या तो बस हैं उम्र लिहाज की ll

 

हुनर कमी थी शायद परवान के कुर्बान में l

सजा मेरी थी रजा उसकी ना थी इस दरखास्त में ll

 

ख्वाईश बस एक ही बची हैं l

कह रहा हूँ दिलों अरमान से ll

 

हर बंधन से अब मुक्त हो जाऊ l

शुन्य था शुन्य में मिल जाऊ ll


छोड़ कारवाँ ध्यान मग्न काम में l

गुजर जाऊ दहलीज के इस मुकाम से ll 


शुन्य था शुन्य में मिल जाऊ l

गुजर जाऊ दहलीज के इस मुकाम से ll 

Friday, July 24, 2020

सकून

वो सकून हैं हर शामों की तसब्बुर का l
मंजर गुलज़ार हैं तन्हाई में उसकी यादों का ll

कौन कहता हैं मैं तन्हा अकेला हूँ l
हर रोज गुलफाम की क़ुरबत में उससे मिला करता हूँ ll

खत रोज एक नया उसे लिखा करता हूँ l
खबर उसे मिल जाये पतंग बिन डोर उड़ाया करता हूँ ll

हर फरमान मैं उफान लिए हर घूँट छलक जाता हूँ l
पीऊं कैसे जाम में भी अक्स उसका निहार जाता हूँ ll

कितनी हसीन यह सितमगर मोहब्बत हैं l
वो नहीं फिर भी उनकी रूह से भी मोहब्बत हैं ll

तन नहीं मन लगा जिससे किनारा उससे कैसा हो l
ख्यालों से निकल यादों से समझौता कैसे हो ll

सकून मिल रहा जिसकी फ़िज़ों से l
मौसम तन्हाईयों का गुलज़ार फिर कैसे ना हो ll

Sunday, July 19, 2020

सामंजस्य

क़िस्मत के बबंडर ने कोहराम ऐसा मचा दिया l
हस्तरेखाओं का जन्मकुंडली से मिलान गुनाह बना दिया ll 

अनबुझ पहेली बन गयी लकीरें हाथों की l
जन्मकुंडली बन गयी ग्रह नक्षत्र सरीख़ों सी ll

उलझ गयी जीवन रेखा दो पाटों बीच सी l
सलवटें उभर आयी माथे ललाटों बीच सी ll

कैसे हरे इसके भ्रम मायाजाल से l
कष्ट निवारण सुझाव मिल रहे चारों नाम से ll 

यतीम प्रतीत होने लगे अब नींदों के पीड़ भी l
जल रहे ज्यों ज्यों नीरज रिसने लगे घाव भी ll 

एक थी करनी दूसरी कर्मों की लेख l
उकेर लू कुछ अलग लक़ीरों पर लेखनी लेख ll

थाम लू बबंडर नयी उकेरी लकीरों बीच l 
बदल दूँ जन्मकुंडली इन लकीरों बीच ll   

मिल गयी रौशनी खुल गए चक्षु नीर l
सामंजस्य जम गया कुंडली और लकीरों बीच ll 
 

Saturday, July 18, 2020

तन्हा चाँद

चाँद इश्क़ से तन्हा रह गया l
दुआओं की बस मुराद बन रह गया ll 

मुकाम लाखों ऐसे आये इस अंजुमन की फेहरिस्त में l
इजहार में इकरार मगर अधूरा रह गया तन्हाइयों के आलम में ll 

दाग झलक रहा इश्क़ के दामन पैबंद जैसे l 
कोई तिल चिपक आलिंगन कर गया चाँद को जैसे ll 

चाँदनी के नूर से टपक रही आयतें रोज नयी जैसे l
किनारे बैठ दीदार हसरतें पैगाम दे रही कोई जैसे ll

मुकम्मल जहाँ मिला नहीं इश्क़ बदनाम जैसे l
चाँद भी बदलता रहा रूप जलाने इश्क़ को जैसे ll 

आलम कुछ असहज बन गया करते करते इश्क़ की पैरवी ऐसे l  
सितारों से महफूज चाँद भी तन्हा रहा गया अपने मुस्तकबिल जैसे ll

घरोंदे की दरों दीवार भी परायी नज़र आ रही दिल में l
रुखसत हो इश्क़ छोड़ गया चाँद को तन्हा जब से ll

रुखसत हो इश्क़ छोड़ गया चाँद को तन्हा जब से l
रुखसत हो इश्क़ छोड़ गया चाँद को तन्हा जब से ll

Sunday, July 12, 2020

पल

शीतल पवन ठहरे हुए नदियाँ पल l
जगमगा रही रोशनी सितारों की ग़ज़ल ll

सोई नहीं आँखे मुद्दतों से एक पल l
पहरे लगे थे ख्यालों के चिलमन ll

अद्भुत हैं सुनहरी यादों के रंग l
गुलाब सा प्रफुलित हो रहा मन ll 

बेताब हो रही आरजू लिखने एक नया सबब l 
गुल इंतज़ार में शिथिल हैं पुतलियों के अंग ll

फ़ासले रंजिशों के ना थे कम l
एक धोखा था चाँद में उसकी नज़र ll 

उकेरे थे दरख़्तों पर कभी जो पल l
टटोल रही आँखे वो सोए हुए पल ll

इस पल में शामिल मिल जाए वो पल l 
जिस पल इंतज़ार लिखी यह ग़ज़ल ll

Friday, July 10, 2020

अझबूझ

साँसे गिरवी रखी थी मोहलत कुछ मिल जाए l
महरूम थी पनागाह नसीब वो आसमां मिल जाए ll

छूट गए कदमों की निशां जानें कौन सी अजनबी मंज़िलों पे l
बेरुखी इस कदर छाई मुरझा गयी कपोल अनजानी राहों में ll

दस्तूर रिवाज़ यह कैसा हैं अपना भी सब पराया हैं l 
छूआ जिस साये को वो भी एक टूटी प्रतिछाया हैं ll

समझौता था दर्द का अपने ही दर्द की ख़ामोशी से l 
जलता रहा जिस्म रिसता रहा लहू अपनी ख़ामोशी से ll

पुकार था जिसे एक बार सी लिए लबों ने वो जज्बात l
रुँध गया कंठ थरथरा उठे उजड़े चमन के अरमान ll

पड़ गए पैरों में घुँघरू हाथों में जाम l
नचा रही किस्मत कोठे बन गए धाम ll

मिली ना मुक्ति मिले ना चैन चलते रहे जहर बुझे बाणों के खेल l
गिरवी रखी साँसे भी शिथिल हो गयी देख यह अझबूझ खेल ll

Friday, June 26, 2020

ओस की बूँद

नृत्य कर रही पंखुड़ियाँ भृंग साज 
बूबूल की टहनियों नीम हैं जैसे साज 

जुगनू रौशन रात हो रही निछावर 
सुगंध गंध महका रहा मनचला चितवन

मधुर बेला खोल रही उपवन टोली 
नज़राना दे रही पर्वतों की टोली 

खोल दूँ चुपके से अरमानों की झोली 
भर लूँ फेहरिस्त साँझ ठिठोली

सिलसिला चलता रहे पतंग मांझे की डोरी 
फिरता रहूँ गगन गगन परवाजों की डोरी 

सागर लहरें बहका रही मन चोरी चोरी 
किस करवटें लेटूँ आयतें हो ना जाय चोरी

पदचापों की धुन धुएँ की धुंध 
निकट आ रही सपनों की पुँज    

नृत्य कर रही पंखुड़ियों की धुन 
मदमस्त हो रही ओस की बूँद 

Friday, June 19, 2020

निदान

बार बार टूटा हूँ हर बार टूटा हूँ 
क्यों हर बार मैं ही छला हूँ 

दर्द ने भी रंग अपना बदल लिया 
डसते डसते खुद से तन्हा कर दिया 

प्रायश्चित करने जिस चौखट पे आया 
द्वार उसके भी अपने लिए बंद पाया

खुदा भी बहरा बन किसी कोने छिप गया
पत्थर की मूरत में कोई ना नूर उभर आया  

मंज़िलें फकीरों सी राहों से भटक गयी 
वेदनाएँ रूह में उतर अपनी होती चली गयी

तलाश रहा हूँ निदान जख्मों की ताबीर का 
सकून कही मिला नहीं माँ की आँचल के छावं सा 

Tuesday, June 16, 2020

कहानी

कुछ कहानियाँ हमनें गढ़ी कुछ वक़्त ने लिखी l
तेरी पर जाने इन दोनों से क्यों जुदा जुदा सी थी ll

एक सहमी हुई ठिठकी सी जिंदगानी थी l
एक ठोकर से टूट गयी कोमल क्यारी थी ll

सुनने को तुझे आतुर हो रहा था मन l
इंतज़ार की लौ में पलकों में टहल रहा था मन ll 

बस उस रात सारी रात भींगते रहे हम l
तेरी कहानी सुनने सारी रात जगते रहें हम ll 

बेचैन थे उस रात के वो ठहरे हुए पल l
मुनासिब ना थे तेरे खामोश लफ्ज ll

क्या रह गुजर थी डोर एक बंधी थी l
बिखरते अरमानों को समेटने यह रात काफी ना थी ll

पास सिर्फ खंजर सी चुभती टूटी एक आस थी l
मकसद कोई ना था फिर भी एक जिंदगी की तलाश थी ll

समझ ना पाया मैं उन आँखों के तसब्बुर l
अल्फाजों को वयां करने की इजाजत ना थी ll

सैलाब का तूफ़ान लिया सा मंजर था l
प्रतीक टूटने व्याकुल धैर्य किनारा था ll

कहानी उस रात की यही अधूरी रह गयी l 
साँसे सारांश सब अजनबी बन गयी ll

Saturday, June 13, 2020

दाग

इश्क़ के गुरुर में चूर एक आईना हमनें भी देखा
महताब की अदाओँ सा रंग बदलता इसे देखा

मुनासिब होता दिलों के दरमियाँ फरमाइसे ना होती
शायद खलिस दिलों की तब और जबां होती

हौले हौले फितरत रंगों की बदल गयी
सिलसिलों ने भी गुमनामी की चादर ओढ़ ली

हमने भी फिर मोहब्बत से रंजिश कर ली
कब्र इस दिल की अपने ही हाथों खोद दी

बेफिक्री का आलम अब ऐसा छाया हैं
बिन उसके ज़िक्र कोई ना हो पाया हैं

दूर फ़िर फ़लक पर चाँद नज़र आया हैं 
शायद दीदार ए यार को फिर प्यार याद आया हैं

लहू के हर कतरे कतरे से एक ही फ़रियाद आया हैं
दाग के साथ चाँद और हसीन नज़र आया हैं 

Tuesday, June 9, 2020

मैं

यूँ तो अक्सर खुद से मिला करता हूँ l
सवाल पर वहीं आकर ठहर जाता हैं ll

कौन हूँ मैं प्रतिबिंब हूँ या कोई परछाई हूँ l
या दर्पण में नज़र आये वो सच्चाई हूँ ll

क्यों रातों को कभी जुगनू सा चमकता हूँ l
क्यों कभी अपनी चमक से डरता हूँ मैं ll

मशवरा दिया पल पल के इम्तिहानों ने l
तलाशों उतर मयकदे के द्वारों पे ll

बदल रहमत अँगार शहद से ऐसे महकेंगें l
जाम के हर सुरूर में सिर्फ मैं ही मैं छलकेंगें ll

खुदा नाचीज़ होगा ठहरा हुआ पल होगा l
हर प्यालों के घूँट में गुजरा हुआ पल होगा ll

हो फासलों से रूबरू आवेग जो चला l
खुद की पहचान में खुद से दूर हो चला ll

लूट गया इन राहों पे मैं काफ़िर बन के l
निगल गया मशवरा मुसाफ़िर बन के ll   

Monday, May 25, 2020

ईद

इस ईद बस एक फरियाद हैं मेरी
खुदा नज़रें इनयाते कर दे थोड़ी

चाँद नज़र आ जाए मेरी भी सर जमीं 
नमाज़ ईद की अदा कर दूँ उसकी सर जमीं

अज़ान बन गूँज उठे हर इबादत मेरी
निहारु जब आसमां दुआ कबूल हो मेरी 

रस्म निभाऊ गले मिल उस चाँद की हथेली
दस्तूर रिवाज बन जाए हबीबी की ईदी

सजदा उस आफताब का महकता रहे
सरके जो हिजाब तो महताब निखरता रहे

बस वो छुपा चाँद जो नजर आ जाए
हर रोज़ नमाज़ अदा कर दूँ उस ईद की खुशी 

Saturday, May 16, 2020

प्रेम कहानी

किश्तों में कैसे तुमसे मैं प्यार करूँ 
दिल पे तेरे दस्तखतों का ज़िक्र कैसे सरे आम करूँ 

इजहारे अंदाज़ ने रंग शमा का बदल दिया 
हर मौसम को रुमानियत रिवाज़ बना दिया 

फ़साना तरन्नुम ने भी खूब कहा 
तारुफ़ में दिल आशिकाना मुस्करा गया 

अनबुझ पहेली ज़िक्र रात सयानी 
बन प्रेयसी चाँद उतारे नजर तुम्हारी

ओझल ना हो पलकों से ए प्रेम कहानी 
तितली पंखुरियों सजी रहे ए बात सुहानी 

दीवानी मीरा ह्रदय रचे रास बिहारी 
कुँज गलियों गूँजे अपनी भी प्रेम कहानी 

Friday, May 15, 2020

पतझड़

पतझड़ सा खामोश हैं मन l
पर कटे परिंदो सा विचलित हैं तन ll

स्याह अंधेरों में गुम हो गया वक़्त l
चिनारों के दरख़्तों पर अब नहीं कोई सहर ll

बंजारा हो फिर रहा हूँ दर बदर l
कैसे पिघले पत्थर रहा ना कोई हमसफ़र ll

कड़वाहट घुली मौसम मिजाज ऐसी l  
दूरियाँ थाम ली रिश्तों मिजाज वैसी ll

महज इतेफाक कहूँ या आत्म संजोग l
अपरिचित से लगने लगे हैं खुद के नयन ll

बदल गए हैं अब सपनों के भी पल l
टूट गए साहिल ढह गए रेतों के महल ll

नवयौवन नवरंग फूलों खिला नहीं l
बदरा इस सावन खिलखिला हँसा नहीं ll

बदल गयी तस्वीर चिनारों की पुरानी l  
वसंत दरख्तों पर फिर कभी लौटा नहीं ll

सुहानी शामें ठंडी आहों सी सिसक गयी l
कारवाँ पतझड़ का अब तलक गुजरा नहीं ll 

Sunday, May 10, 2020

दर्द

दर्द आँखों से जब उतरता हैं
अश्कों का दरिया बन छलकता हैं

दर्द से ही धड़कनों की पहचान हैं
वर्ना तो जिंदगी पूरी गुमनाम हैं

उखड़ती साँसे क्यों इतनी बईमान हैं
दर्द की गहराई में छुपा कोई राज हैं

दर्द दिलरुबा आँखों की
पल प्रतिपल भाव बदलती हैं

गुस्ताखियाँ दर्द की कैद आँखों के अंदर
थामे हुए एक गहरा समंदर दिल के भीतर

रूह का कितना हसीं धोखा हैं
दर्द आँखों में चेहरे पे गुलसिताँ हैं

इस गफलत में जी रहा ज़माना हैं 
फिसल गया दर्द मिला जब कोई बेदर्द फ़साना हैं

बिन दर्द के अब चैन नहीं
दर्द नहीं तो यह जीना भी बेस्वादा हैं

दर्द का अब दर्द रहा नहीं
डर नहीं यह जख्म कोई पुराना हैं 

नयना

आँख मिचौली खेल रहे तेरे मेरे नयना l
सपनों में तुम जब आना बंद रखना अपने नयना ll

मिले जो नयन तो छलक पड़ेगें रैना l
पहेली बन फलक पर छाये रहे नयना ll

झुके पलकें जब तेरी शरमा जाए नयना l
सुरमई आँखों में आबाद रहे यह सुन्दर दुनिया ll

उठे तो उठे नजरें तेरे ही नयनों के जाम से l
बस नशा इन नयनों का बेपर्दा होने ना पाय ll

मैं पीता रहूँ तेरे नयनों के ख्यालातों से l
प्यास इन शुष्क लबों की बूझने कभी ना पाय ll

फरियाद करे रहे रोग लगे यह नयना l
मियाद खत्म होने ना पाए लुका छिपी मुलाकातों की ll

मौहलत थोड़ी और दे दे ए नयना l
ताउम्र ताबीर करूँगा उसके सुन्दर नयना की ll

बन गए गुलाम मेरे खोये खोये नयना l
नज़र मिलायी तुमने और बदनाम हो गए मेरे नयना ll

आँख मिचौली खेल रहे तेरे मेरे नयना l
आँख मिचौली खेल रहे तेरे मेरे नयना ll

Thursday, May 7, 2020

मधुशाला बदनाम

कायनात कुदरत की सारी झूठी झूठी सी l
एक बस मधुशाला ही सच्ची सच्ची सी ll

फेहरिस्त थोड़ी लम्बी इसके कद्रदानों की l
खुदा भी झुक गया देख रौनक मधुशाला की ll

क्या पंडित क्या मुल्ला क्या पादरी l
चौखट सभी इसकी चूमे बन इसके जायरीन ll

मधुशाला यारी महफ़िल कुँवारी ll
झूम रहे सभी एक रंग रंगे भूल मजहब तास्कीन ll

मशहूर काफिले मधुशाला नाम के l
नित सजा रहे कारवाँ नए मधुशाला जाम के ll

बह रही उलटी गंगा मधुशाला प्याले अंदर l
इबादत नयी लिख रही प्रेरणा मधुशाला समंदर ll

हर घूँट कह रहा अनसुना सा इतिहास l
बिन मधुशाल शतरंज की भी ना कोई बिसात ll

अमृत से बढ़कर इसका लग रहा अवदान l
मशहूर तभी जग में मधुशाल के कद्रदान ll

यहीं नाजनीन यहीं स्वर्ग का आभास l
तर दे रस फिर भी मधुशाला ही बदनाम ll

Wednesday, May 6, 2020

रिश्तों की चाबी

खट्टास जंग की परत ऐसी जमी जिंदगानी पर l
चाबी रिश्तों की अलग हो गयी गुच्छे की पहरेदारी पर ll

बड़ी सिद्धत से सँवारा सहेजा जिस रिश्ते को l
हिफाज़त ही गुनाह बन गयी उसकी नजाकत को ll

सहज बेबाक पतंगों से उड़ते रहते थे जो रिश्ते l
डोर उसकी ही उलझ कट गयी अपने ही माँझे से ll

लाख जतन की मिट्टी महकती रहे इसकी की कोमल राहों की l
फूलों से सजी रहे पगडण्डी इसकी राहोँ की ll 

खुदा भी ख़ौफ़ज़दा हो गया इसके चिंतन क्रोध के आगे l
तल्खी में चादर नकाब की बैरी बन जब इसने ओढ़ ली ll

गुरुर था जिस रिश्ते को नफ़ासत अंदाज़ से जीने का l
मगरूर बन बिफर गया आसमां उसके कोने कोने का ll

हिसाब अधूरा रह गया कुछ खोने और पाने का l
सवाल अटक गया बेहिसाब जज्बातों का ll

प्रायश्चित करूँ कैसे अनवरत बह रहे अश्कों का l
निरुत्तर वो मौन है सजदा रिश्तों के रखवालों का ll

प्रायश्चित करूँ कैसे अनवरत बह रहे अश्कों का l
निरुत्तर वो मौन है सजदा रिश्तों के रखवालों का ll

Sunday, May 3, 2020

आवाज़

नफरतों के बाजार में मिला ना कोई कद्रदान l
खरीद सके जो इस तन्हा दिल के पैगाम ll

ख्वाईश हैं सौदागर मिले कोई ऐसा नायाब l
मेहताब बन निखर आये दिलों के अरमान ll

हालात ने पहरे लगाये हुए संवादों पर आय l
ताले पड़ जड़ गए जुबाँ के प्यालों पर आय ll

बिन कड़वाहट रिश्तों में दूरियाँ ऐसी बन आयी l
परछाई अपनी भी दस क़दम दूर खड़ी नज़र आयी ll

प्रतिलिपि फिर खोजी आफ़ताब के पास l
रहनुमा बन रूह उतर आये इसकी आवाज़ ll

महरूम ना हो कभी रिश्तें भी दूरियों के दरम्यां l
महफ़िल ओर मुखर आये बेक़रार धड़कनों के पास ll

ढलती साँझ नकाब के पीछे छुपी मुस्कान l
क़त्ल कर दिल का खरीद लिए सारे पैगाम ll

वो काफिर था या रहगुजर बेचैन थे नयनों के तार l
जल गयी चिंगारी बुझ गए जुल्मों सितम के तार ll

आँधियों के मेले में साये को मिल गया आकार l
हमसफ़र बन मिल गया दिल को जैसे कोई परवरदिगार ll

Tuesday, April 21, 2020

अजनबी जिंदगी

ना जाने जिंदगानी को किसकी नज़र लग गयी l
अब तो बस यह किस्तों में सिमट रह गयी ll

ताबीज़ को मानो खुद की नज़र लग गयी l
जैसे धुप खुद अपनी तपिश से जल गयीll

साँझ की कवायदें भी अब बिन सुरूर ही ll
बंद मयखानों की ज़ीनों पे ही ढल गयी ll

मौशकी थी जिसकी तारुफ़ से l
चाँद बन वो भी बादलों में छुप गयी ll

अब क्या नींद क्या नींदों के पैगाम l
बिन पलक झपके ही रात ढल गयी ll

सफ़र अब यह अजनबी सा बन गया l
हमसफ़र साँसों का साथ दूर छूट गया ll

कल तलक जो एहतेराम हबीबी था l
आज संगदिल बेरूह जिस्म बन गया ll

मज़लिस सजी रहती जिसकी धुनों पे l
धुंध पड़ गयी मय्यत की उसके सीने पे ll

करवटें बदल राहें बदल साजिशें ऐसी रची काफ़िर ने l
हाथ छुड़ा जिंदगी दूर हो गयी जिंदगानी से ll

मायूसी का आलम ओढ़ रुखसत हो गयी रूह l
रोती बिलखती रह गयी धड़कनों की रूह ll

किस्तों में बंट गयी जिंदगानी की रूह l
किस्तों में बंट गयी जिंदगानी की रूह ll

Wednesday, April 15, 2020

क्षितिज

प्रचंड प्रबाल हैं इतना वेग

हिल रहा हिमालय का तेज़

अँगार बन बरस रहा

जल प्रपात कोहराम का सेज़

भष्मीभूत हो भभक रहे

अरण्य नगर और खेत

भीभिषका लाली दानव रूप धरे 

तटस्थ खड़ा ज्वालामुखी यमदूत बने

पसरा मातम कायनात रौद्र रूप धरे

अग्रसर सृष्टि इंतकाल मुख खड़े

पटाक्षेप तांडव लहरें

कर अस्त भाग्य कर्म

मरणासन्न शैया क्षितिज ओर चले 

क्षितिज ओर चले

Monday, April 13, 2020

बेईमान यादेँ

कभी पलकें छू जाती हैं

कभी नींदें चुरा ले जाती हैं

यादेँ तेरी बड़ी बेईमान हैं

खुली आँखों में  सपनें संजो जाती हैं

कभी झपकी कभी थपकी

खट्टी मीठी यादों के ऐसे पल बुन जाती हैं

कभी नींदों में मुस्कराता हूँ

कभी करवटों में तकिये से लिपट जाता हूँ

घरौंदे यादों के ऐसे मचल जाते हैं

मैं फिर से बचपन में लौट आता हूँ

कुछ अध लिखे खतों की सोफ़ियाँ

कुछ बिछड़े जमाने की दूरियाँ

चाँद में आज भी तेरा ही अक्स बना

यादों की लोरियाँ गुनगुना जाती हैं

इसी बहाने नींदों में ही सही

मुलाक़ात अपनी मुकम्मल करा जाती हैं

भुला दस्तूर अध खुली पलकों का

यादें तेरी रात महका जाती हैं

छलकती पलकें आज भी तस्वीर

तेरी यादों की ही बुनती जाती हैं

तेरी यादों की ही बुनती जाती हैं

Wednesday, April 8, 2020

ठहराव

निभाने दस्तूर जमाने के

रस्मों रिवाज़ की तिलांजलि दे आया

बन अपनी नज़रों में अपराधी

आवाज़ में ठहराव को हवा दे आया

ठहराव हैं आत्मसात का

घुटनों पे रेंगती सच्चाई का

खोये आत्मसन्मान की अश्रु धारा का

बदल गया प्रहर का रूप

टूट बिखर गए माला के फूल

अँधियारा बदनसीबी का

बुझा गया प्रकाश पुंज

गुमनाम हो गयी नियति

बदल गए जीवन बोल

ढह गयी मिट्टी कुनबे की

लुप्त हो गए लकीरों के छोर 

जकड़ गयी जंजीर अहसानों की

गुलाम हो गए हस्त रेखाओं के मोल

ठहरने लगी दिल की आवाज़

ना कटने वाली बैचैन उम्र दराज़ों के ठोर

बैचैन उम्र दराज़ों के ठोर 

Friday, April 3, 2020

दुल्हन

कोरी रस्म बन ना रह जाए

मधुर मिलन की आस

खनकती चूड़ियों के बोल झाँझर की तान

घोल रही मधुमास में मिश्री की मिठास

बिंदिया लिख रही ग़ज़ल नयन छेड़ रहे साज

प्रियतम के आने की सजनी जोह रही बाट

क्यों देर हो रही प्रियतम को आज

ना कोई संदेश ना कोई पैगाम

क्या पिया छोड़ चले गए लिख अधूरी मनुहार

बढ़ रहा धड़कनों का साज

निहारे कभी दर्पण कभी मेहंदी लगे हाथ

इस बीच गूँज उठी शहनाई

आ पहुँचे साजन तोरण द्वार

सज गयी डोली सजनी हुई विदा को तैयार

भुला दुःस्वप्न विचार 

बन दुल्हन चल दी प्रियतम के द्वार 

माने

धुंध बिखर गयी सपनों पे सारे

पहरे लगा गए तम के अँधियारे

सिफारिश करूँ अब आफताब से कैसे

छिप गए तारे सारे अमावस के घोरे

जज्बात कैद हो रह गए सीने मेरे

जाहिर करूँ अब कैसे अरमानों के पहरे

पर कट गए परिंदों के जैसे

हालात हो गए मुजरिम जैसे

कैद हो गए साँझ सबेरे

पाबंदी लग गयी पलकों के आगे

बदल गए जिंदगी के माने

बदल गए जिंदगी के माने 

Wednesday, April 1, 2020

विचलित पलकें

दरकिनार कर आँखों के पैगाम

नींद भी खो गयी पलकों के साथ

बेचैन हो रही नज़रें

ढूँढने सपनों में अपना किरदार

अर्ध निशा तलक करवटों ने भी छोड़ दिया साथ

सोचा गुजार लूँ कुछ पल चाँद के साथ

निहारा झरोखें से

पाया नदारद हैं चाँद भी सितारों के साथ

रात प्रहर लंबी हो गयी

एकांत सिधारे नींदों के पैगाम

हर घड़ी टटोल रही आँखे

विचलित पलकें नींदों के नाम

विचलित पलकें नींदों के नाम  

अहंकार

देख मानव के नित नये जैविक हथियारों के आविष्कार

कायनात भी स्वतः आ पहुँची नष्ट होने के कगार

बिन चले एक भी तोप , गोली और तलवार

हर ओर लग गये पर्वतों से ऊपर लाशों के अम्बार

रास ना आया प्रकृति को अहंकारी मानव का

चेतना शून्य वर्चस्व का यह अंदाज़

मूक दर्शक बन रह गया बस ख़लीफ़ा

नेस्तनाबूद हो रही सम्पूर्ण सृष्टि आज

सन्नाटा मरघट का ऐसा पसरा चहुँ ओर

जल रही चिताओं की होली बुझा गयी जीवन लौ 

शिथिल पड़ गयी मानवता विनाश लीला वेग को

रो उठी कुदरत देख अपनी ही रचना तांडव आकार

प्रतिघात कर प्रहार कर सभ्यता के सीने को

अपने स्वार्थ को कलंकित दृष्टि विहीन मानव ने

जुदा कर दिया सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की परछाई को

जुदा कर दिया सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की परछाई को 

Thursday, March 26, 2020

पूर्णविराम

ध्वंश हो गयी ध्वनि बेला

कुदरत के नए तांडव गांडीव से आज

अभिलेख ऐसा लिखा मानव ने

कायनात अपनी ही रूह से महरूम होती जाय

प्रलय काल बन गयी सम्पूर्ण सृष्टि

विलुप्त हो रहे सारे नैसगर्गिक भाव

वरदान थी जो प्रकृति अब तलक

दफ़न कर नए उत्थान की बात

अभिशाप नरसंहार बेरहम बनती जाय

अपने अभिमान गुरुर में भूल मर्यादा रेखा को

लहूलुहान छलनी कर सीना सृजन दाता को

लिख दिया मानव कुंठा ने नया विपत्ति अध्याय

रूठ गयी कुदरत अपनी ही बेमिशाल रचना के

बिगड़ते बिखरते अजब गजब पैमानों से आज

नाग बन डस गये मानव को

उसके ही विनाशकारी हथियार आय

लग गया ग्रहण सम्पूर्ण सृष्टि पर

कायनात के इन पूर्णविरामों से आज

कायनात के इन पूर्णविरामों से आज  

Friday, March 20, 2020

बेबस नारी

सहम जाती हूँ परछाई से भी अपनी

नुमाईस लगा रखी हैं अंधकार ने इतनी

शुष्क लबों को डरा रही

आहट पद्चापों की अपनी

कितनी व्यतिथ यह जिंदगानी हैं

हर गली चौराहों नुक्कड़ पे

शाम ढले यही कहानी हैं

वहशी दरिंदों की नजरों ने पहनी

हैवानियत हवस की लाली हैं

चीरती कोई चीख वीरान सन्नाटे को

हृदयगति एक पल को ठहरा जाती हैं

कितनी बेबस बना दिया कुनबे ने

अपने ही साये से सहमी रहती हर नारी हैं 

अपने ही साये से सहमी रहती हर नारी हैं  

Wednesday, February 12, 2020

तेरा शहर

नाता तेरे शहर से पुराना  हैं 

उस बरगद का अफसाना आज का फ़साना सा हैं

दरमियाँ जो समेट ली थी चाहतें

वो तो बस मुलाक़ात का एक बहाना हैं

गुजरू जब कभी तेरे शहर की गलियों से

लगे आज भी चमन खिल आया

मानों पीपल की टहनियों पे

पसरी जहां मेरे शाम की इबादत हैं

तेरे साये में वहा आज भी मेरे रूह की ही हुकूमत हैं

चौखट दहलीज की कभी लाँघ ना पाया

डोली तेरी किसी और किनारे छोड़ आया

फिर भी अपने आँगन से तेरी खनख विदा ना कर पाया

ना ही तेरे वजूद को खुद से रुखसत कर पाया

और उन शबनमी यादों की मिठास में

तेरे शहर से ही रिश्ता निभाता चला आया 

Friday, January 31, 2020

याददाश्त

तेरी यादों के चिलमन को छोड़ 

बाक़ी याददाश्त खाली खाली हैं 

ओ रहगुज़र हमसफ़र 

इन आँखों में नींद कम 

तेरे इश्क़ की ख़ुमारी भारी हैं 

किताबों के पुराने सूखे फूलों में 

तेरी यादों की महक आज भी बाकी हैं 

यादों के झरोखे में बस तेरे नूर की ही चाँदनी हैं 

बाकी याददाश्त तो बस खाली खाली हैं 

समझौते हैं कुछ बदनाम राहों के 

किस्से हैं कुछ इश्क़ की गालियारों के 

अरमान फिर भी सजे हैं तेरी ही यादों के 

फरियाद अब ओर नहीं यादों की 

छोड़ तेरी चिलमन को याद नहीं यादों की  

Wednesday, January 29, 2020

शामें

गीत ग़ज़लों मैं अपनी शामें आबाद करता हूँ

आफ़ताब के सुनहरे नूर को

चाहतों का पैगाम लिखता हूँ

ख्यालों से निकल आँखों में उतर आयी

उस महजबी को सलाम लिखता हूँ

गुले गुलशन एहतराम लिखता हूँ

काफ़िले तारुफ़ के तरानों में

नजरानों की सौगात लिखता हूँ

इन बेजान धड़कनों से

उस पाक ए रूह को फ़रियाद लिखता हूँ

सारी सारी रात करवटों में

खुद से खुद बात करता हूँ

सुरमई छुईमुई उसकी पलकों में

नींदे अपनी तलाश करता हूँ 

गीत ग़ज़लों मैं अपनी शामें आबाद करता हूँ

Thursday, January 9, 2020

मधुमास

बेवफ़ाई की आँधी नजरों के आगे

ढाह गयी गर्द का अंबार

सुबह की सुनहरी धूप को

ग्रहण लगा बना गयी अमावस की रात

ग़म की तन्हाई सिर्फ़ अश्रु मंजरों का साथ

 ना कोई तारे ना ही सितरों का पैगाम

काफ़ूर हो गया नशा इश्क़ का

मदहोश सुरूर आया ना कोई काम

सहेली साँझ की थमा गयी हाथों में जाम

पर पैसों की खनक में खो गयी

दिलबरों के रूह के मिलन की रात

खुदगर्ज बन नीलाम होती वफ़ा चाहते

हरम की गलीयों सा विचलित कर गयी मधुमास

हरम की गलीयों सा विचलित कर गयी मधुमास