Thursday, May 21, 2026

वैतरणी

लाजमी थी गलतफहमियां मधुशाला क़ुरबत आलिंगन हाथ में l

मदहोश थी दहलीजें इसकी नजदीकियां अफ़साने आँगन खास में ll


रंग ज़माने खुदगर्जीयों के थे बहरूपिये मयखाने सरूर रफ्तार में l 

नाजुक थी कड़ियां इसके मजहब तालीम छलकते जामों प्याम में ll


पूरी थी जिन्दगानी इसकी रूह कडियों महफ़िलों सजती शाम में l

शून्य भी शृंगार सा था इसके कायनात पटल चमकते अर्ध चाँद में ll


इन्द्रधनुषी पगडण्डियाँ सी रोशनी मधुशाला छलकते नयनों खोये जाम में l

तर गयी कंठ वैतरणी भूल काफिर पीड़ा सुरा के अस्तित्व खोई दालान में ll


मीमांसा फिर पहरेदारी थी मदिरा की अनकही प्रतिक्रिया समीक्षा राज में l

जीना फिर से सीखा गयी इसकी तवायफ कोठी अपने आँचल अंदाज़ में ll

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